इस अप्रत्याशित समय में सवाल ये नहीं है कि सुविधा-संपन्न तबका अपनी सुविधाएं बाकी लोगों में क्यों बांटे बल्कि सवाल ये है कि आखिर वो ऐसा क्यों नहीं करे भला !
भारत में भुखमरी कोई नई बात नहीं है. देश के पिछड़े इलाकों से अक्सर भूख से मौतों की खबरें आती रहती हैं. करोड़ों लोग ऐसे हैं, जिन्हें रोजमर्रा की जिंदगी में दो वक्त का खाना नसीब नहीं होता है.
जिस युद्ध ने इंदिरा गांधी को शिखर पर पहुंचाया था उसी ने उनके पतन का बीज भी बोया था, मगर आज विपक्ष के लिए बेहतर तो यही होगा की वह चुप न बैठे और इस महामारी में मोदी सरकार को अपनी जवाबदेही से कतरा कर निकलने का मौका न दे.
रिपब्लिक टीवी के एंकर अर्णब गोस्वामी ने सोनिया गांधी की पालघर मामले में चुप्पी पर सवाल उठाया था. इसके बाद जो हुआ वो कांग्रेस ने वर्षों तक जो किया है, उसकी याद दिलाता है.
इस महामारी के कारण उभरे अवसरों का लाभ उठाने के लिए भारत को जैविक विज्ञान के क्षेत्र में काम करने वालों की संख्या बढ़ाने के साथ ही उद्योग जगत और सरकार के बीच और करीबी सहयोग को बढ़ावा देना होगा.
22 अप्रैल को पांच जजों की पीठ ने टिप्पणी की कि जो दलित क्रीमी लेयर में आ गये हैं, उन्हें सूची से बाहर करने पर सरकार विचार करे. इन परिस्थितियों को देखते हुए क्या न्यायपालिका से निष्पक्षता की उम्मीद की जा सकती है.
आरएसएस के प्रचारक कई वर्षों से ऐसा दावा करते आए हैं कि आंबेडकर उनके संगठन के कार्यक्रम में शामिल हुए थे और उनका रुख इस संगठन के प्रति सकारात्मक था. लेकिन अपने दावे को साबित करने के लिए आरएसएस विचारकों ने कभी कोई भी तथ्य उपलब्ध नहीं कराए.
नागरिकता संशोधन कानून का विरोध, दिल्ली में हिंसा, कोरोनावायरस के दौरान मरकज में तब्लीगी जमात का आयोजन और पालघर में साधुओं की हत्या कुछ ऐसा ही संकेत देती हैं.