क्या दोनों मुल्कों को टिड्डी में एक आम दुश्मन मिल गया है? क्या टिड्डियां बड़े पैमाने पर तबाही के वो हथियार हैं जिन्हें अब तक छिपाकर रखा गया था? शायद अर्णब गोस्वामी को पता होगा.
अब समय आ गया है कि क्विट इंडिया पार्ट टू अपनाया जाए और मेड इन इंडिया की कोशिश की जाये. कोविड ने देश की जनता को स्वावलंबन का एक और मौका दिया है- क्या हम इसके लिए तैयार हैं?
प्रधानमंत्री को आरोपों की सूली पर टांगना ठीक नहीं, चाहे वे ऐसे नरम बरताव के हकदार हों या नहीं क्योंकि अगर ऐसा ना किया गया तो दरअसल चोट हम सब पर साझे में पड़ेगी.
अमेरिका में जॉर्ज फ्लॉयड की हत्या के बाद ऊंची जाति के भारतीय जाग गए. लेकिन क्या हम उनकी भारत में जाति वर्चस्व खत्म करने की लड़ाई में दलितों के साथ शामिल होने की कल्पना कर सकते हैं?
अर्थव्यवस्था से लेकर स्वास्थ्य और कल्याणकारी योजनाएं जब सब कुछ विफल हो जाएंगी, तब कट्टर हिंदुत्व चेहरे की तुलना में भाजपा के लिए बचने के लिए बड़ा मुद्दा क्या होगा?
आर्थिक गिरावट में विकासशील देशों पर ज़्यादा बुरा असर हो सकता है. लेकिन पीएम मोदी की अगुवाई की स्थिरता और लचीलापन, यक़ीनन हमें इस तूफान से निकालकर शांत पानी की ओर ले जाएगा.
ऑनलाइन कक्षाएं माध्यमिक स्तर के लिए अच्छी साबित हो सकती हैं. छोटे बच्चों को शिक्षक के मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है और बड़ों को लैब और प्रोजेक्ट स्पेस की जरूरत होती है.
कोरोना काल ने जनसंख्या की वास्तविक भौगोलिक स्थिति की सटीक और केंद्रीकृत जानकारी नहीं होने से उपजी खामियों को उजागर किया है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सही जनसांख्यिकी स्थिति को जाने बिना आकस्मिक विपदाओं से निपटना संभव हो पायेगा?
इमरजेंसी की तारीफ में कहा जाता था कि इसमें रेलगाड़ियां वक़्त पर चलने-पहुंचने लगी थीं, लेकिन आज लॉकडाउन के दौर में तो रेलगाड़ियां गायब हो रही हैं और यात्री शवों के रूप में अपने ठिकानों पर पहुंच रहे हैं .