भारतीय मुस्लिमों के लिए कुछ आरक्षण और योजनाएं हैं, लेकिन असली सवाल है—क्या इनका फायदा वाकई ज़रूरतमंदों को मिल रहा है? समाज में सबसे पीछे पसमांदा मुस्लिम ही हैं.
गांवों में निवेश को वैकल्पिक या दया की निगाह से देखना अनुचित होगा. भारत के गांवों को जलवायु नीति का ज़रूरी हिस्सा समझा जाना चाहिए ताकि देश के ज़्यादातर ग्रामीण लोगों के लिए जलवायु योजनाएं न्यायसंगत, सबको साथ लेकर चलने वाली और टिकाऊ बन सकें.
अफ़ग़ान किसानों को अफ़ीम की खेती से छुटकारा दिलाने में दुनिया की साझा रुचि है. लेकिन बार-बार, दुनिया उन्हें और ज़हरीली फ़सल से मारे गए युवा अफ़ग़ानों को उनके हाल पर छोड़ देती है.
अब देखना यह है कि यह युद्धविराम घरेलू मजबूरियों और दोनों पक्ष की थकान के मद्देनजर किया गया एक सुविधाजनक उपाय है या स्थायी शांति की ओर बढ़ाया गया एक कदम.
जैसा कि बनू मुश्ताक की इंटरनेशनल बुकर जीतने वाली किताब 'हार्ट लैम्प' दिखाती है, न्याय की मांग करने वाली मुस्लिम महिलाएं न तो किसी कल्पना का हिस्सा हैं और न ही किसी राजनीतिक साज़िश का.
टीएमसी ने यूनिवर्सिटी की राजनीति को जिस तरह अपने कब्ज़े में ले लिया है, वह पश्चिम बंगाल की महिलाओं के लिए बड़ा खतरा है. मोनोजित मिश्रा जैसे लोगों को कैंपस से दूर रखना बेहद ज़रूरी है.
सेक्युलर पार्टियों को लगता है कि ओवैसी का मोदी सरकार का साथ देना—चाहे आतंकवाद के मुद्दे पर ही क्यों न हो—उन्हें मुस्लिम वोटरों से दूर कर सकता है. अब बिहार चुनाव में ओवैसी को यह धारणा गलत साबित करनी होगी.
भारी बारिश से क्या-क्या धुलेगा, क्या-क्या बहेगा, कहा नहीं जा सकता, लेकिन चुनाव आयोग के इस बरसाती अभियान कईओं की नागरिकता और वोट देने के अधिकार को ज़रूर बहा ले जाएगा!
कोहिमा, एक फरवरी (भाषा) नगालैंड प्रदेश महिला कांग्रेस समिति ने मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) की रक्षा के लिए राज्यव्यापी आंदोलन...