चीनी के नेताओं ने ऐसे वक्त में घरेलू मांग और खपत को बढ़ाने की रणनीति पर जोर दिया है, जब ग्लोबल अर्थव्यवस्था चरमराई हुई है और ग्लोबलाइजेशन का जलवा खत्म हो रहा है. यह बिल्कुल सही टाइमिंग है. सही वक्त पर सही जगह चोट करना ही चीनी नेतृत्व को कामयाब बना रहा है.
एनडीए ने तो पहले 10 लाख सरकारी नौकरियों के मुद्दे को हवा में उड़ान की कोशिश की, और सफलता न मिलने पर, निर्मला सीतारमण से बिहारियों को फ्री वैक्सीन का लालच दिखाया और तब भी बात नहीं बनी तो फिर उसे खुद ही 19 लाख नौकरियां देने का वादा करना पड़ा.
भाजपा अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी जब 1990 में रथ यात्रा के दौरान अपने घोड़े को सरपट भगा रहे थे, तो मुख्यमंत्री के रूप में लालू ने ही उन्हें बिहार में प्रवेश के खिलाफ ललकारने का साहस दिखाया था.
भारत में मुख्यधारा का मीडिया आरएसएस की आलोचना और मखौल बनाने का आदी रहा है. लेकिन अब यह संघ प्रमुख मोहन भागवत के बयानों को पहले पेज की खबर के तौर पर प्रकाशित कर रहा है.
वैक्सीन संबंधी किसी भी नीति का राजनीतिकरण होना ही है, क्योंकि सार्वजनिक स्वास्थ्य एक राजनीतिक मसला है. लेकिन जब तक वैज्ञानिक प्रक्रिया की उपेक्षा नहीं होती, तब तक टीकाकरण का राजनीतिकरण बुरी बात भी नहीं है.
रणनीतिक तौर पर, बिना शर्ट वाला यह प्रदर्शन आत्मघाती गोल से भी बुरा था. अचानक, AI समिट की सारी गड़बड़ियां भूला दी गईं और यूथ कांग्रेस का विरोध ही मुद्दा बन गया.