मोदी सरकार के कृषि सुधारों में वे सारी विशेषताएं और भावनाएं निहित हैं, जो मध्यवर्गीय आकांक्षाओं पर आधारित मोदी मार्का राजनीति से जुड़ी हैं लेकिन ऐसा लगता है कि वे जनता का मूड भांपने में चूक गए हैं.
अमेरिका को पुनर्विचार करने की ज़रूरत है. चीनी पैसे पर मौज करती पाकिस्तानी सेना हर तरह से बुरी खबर है, चाहे मैंडरिन में कही जाए या पंजाबी या अंग्रेजी में.
कोई भी पक्ष संविधान का अक्षरश: पालन नहीं कर रहा है और भारत तेज़ी के साथ एक ऐसे नियम विहीन ज़ोन में दाखिल हो रहा है जहां कानून का नियम किसी भी चीज़ का मापदंड नहीं रह गया है.
कांग्रेस के 23 नेताओं के समूह ‘जी-23’ की बगावत और अहमद पटेल के निधन के बाद राहुल गांधी निक्कोलो मैकियावेली के 16वीं सदी के ग्रंथ ‘द प्रिंस’ से राजनीति के कुछ सबक ले सकते हैं.
समाधान खेतों में नहीं मिलेगा, कारखानों में मिलेगा. अगर कृषि में कम लोग लगे होते तो उसमें लगे लोगों की प्रति व्यक्ति आय बढ़ जाती और किसानों को अपनी पैदावार की कीमत को लेकर चिंता कम हो जाती.
भविष्य के लिए, राजनीतिक दलों को इस केंद्रीय प्रश्न को संबोधित करने की आवश्यकता है कि किसानों के साथ एकजुटता का दावा करते वक्त वे किसका प्रतिनिधित्व कर रहे होते हैं, और वे इन किसानों के लिए क्या कुछ करने को तैयार हैं?
मोदी चाहें तो आर्थिक सुधारों से अपने कदम उसी तरह वापस खींच सकते है जिस तरह मनमोहन सिंह ने अन्ना आंदोलन के दबाव में खींचे थे, या फिर कृषि सुधारों को मारग्रेट थैचर जैसे साहस के साथ आगे बढ़ा सकते हैं; उनके फैसले पर ही देश की राजनीति की आगे की दिशा तय होगी.
किसानों का आंदोलन पंजाब भर तक सीमित नहीं, इसे सिर्फ एमएसपी से जोड़कर देखना या बिचौलियों का आंदोलन कहकर खारिज करना ठीक नहीं. किसानों की तकलीफ ज्यादा बड़ी और गहरी है
शायद भारतीय पुरुषों के व्यवहार पर सही तरह से नज़र रखने का एकमात्र तरीका यह है कि हर ट्रिप पर उनकी मां उनके साथ हों. अगर वे किसी अजनबी से मिलना चाहते हैं, तो उन्हें पहले मम्मी से पूछना चाहिए.