चुनाव आयुक्तों को पश्चिम बंगाल में उतावलेपन पर काबू पाना चाहिए था, लेकिन उनके पक्षपातपूर्ण रवैये ने सिविल सेवाओं के बारे में नकारात्मक छवि को मजबूत ही किया है.
लंबे अरसे तक बंगाल में दलगत प्रतिद्वन्द्विता अनूठी बनी रही. चुनाव अभियानों में तब राजनीतिक कार्यकर्ता विचारधारा की भाषा बोला करते थे. लेकिन अब ऐसा नहीं रहा.
इस कानून की संवैधानिकता को न्यायालय में चुनौती दी जायेगी और आम आदमी पार्टी तथा दिल्ली की निर्वाचित केजरीवाल सरकार अपने अधिकारों में कटौती के इन प्रयासों के खिलाफ हर तरह की मोर्चांबंदी करेगी.
सिस्टम के बहुत से हिस्सों को दोषी ठहराया जाएगा. केंद्र राज्यों पर दोष मढ़ेगा और तमाम सरकारें निजी क्षेत्र और लोगों की अनुशासनहीनता को ज़िम्मेदार ठहराएंगी.
कुछ ऐसी चीजें हैं जो सशक्त नेता कभी नहीं करते हैं, जैसे यह स्वीकारना कि उनकी तरफ से कोई चूक हुई है. तीन हालिया उदाहरण बताते हैं कि सात साल में पहली बार नरेंद्र मोदी की नजरें नीची हुई हैं.
हर फैशन की तरह बुद्धिजीवी फैशन भी गोल गोल घूमता है, आर्थिक व्यवधान, बढ़ती असमानता, और सरकारी संसाधनों की कमी के चलते, आर्थिक व्यवहार घूम-फिर कर वहीं पहुंच रहा है.
HAL इंजीनियरों को विदेशों में और IITs तथा IIMs जैसे प्रमुख संस्थानों में प्रशिक्षण देने पर भारी निवेश करता है, लेकिन उनका पूरा और सही उपयोग नहीं हो पाता.