असम को एक ऐसा नेतृत्व मिला है, जो इस बात में विश्वास रखता है कि अस्थिरता पैदा करना, सामाजिक सदभाव को भंग करना, बहुसंख्यकवादी मुद्दे उठाना और उत्तरपूर्व के दूसरे राज्यों के लिए ‘बिग ब्रदर’ की धौंस दिखाना ही ‘मजबूत’ सरकार की निशानी है.
धारा 66ए निरस्त किये जाने के बावजूद इसके तहत मामले दर्ज होने की जानकारी मिलने पर देश की शीर्ष अदालत भी हतप्रभ है. न्यायालय भी जानना चाहता है कि आखिर ऐसा कैसे हो रहा है.
भारत, अमेरिका के इस विश्वास के साथ खड़ा दिखता है कि यदि ज़्यादा-से-ज़्यादा देश तालिबान को स्वीकार करने से इनकार करते हैं, तो इस आंतकी समूह के लिए काबुल पर कब्जा करना मुश्किल होगा.
टैक्स, राजस्व, और व्यापक अर्थव्यवस्था की दिशाएं उत्सावर्द्धक हैं लेकिन निजीकरण के मोर्चे पर बहुत कुछ करने की जरूरत है, बैंकिंग क्षेत्र को दुरुस्त करना, संरक्षणवाद से पल्ला झाड़ना, सरकारी संस्थाओं को राजनीति के चंगुल से मुक्त करना बाकी है .
अपनी अलग-अलग पहचान रखने वाले उत्तर-पूर्वी राज्यों के ‘एकीकरण’ की जो पुरजोर कोशिश भाजपा कर रही है उसने असम और मिज़ोरम के बीच हिंसा को जन्म दिया है और अब तक दबे रहे क्षेत्रीयतावाद को भी उभार दिया है.
आम बोलचाल की भाषा में हम अक्सर 'दान' और 'परोपकार' जैसे शब्दों का उपयोग परस्पर समान रूप से करते हैं. परंतु वास्तव में, इतिहासकारों, विद्वानों और विकासविदों की कल्पना में 'दान' हमेशा 'परोपकार' की तुलना में अपेक्षाकृत हीन स्थिति में पाया गया है.
कोरोना महामारी के दौरान अभिभावकों के बेरोजगार होने से परिवार का गुजारा चलाने के लिए बच्चों को जबरिया बाल मजदूरी, ट्रैफिकिंग, बाल वैश्यावृत्ति, डिजिटल पोर्नोग्राफी के दलदल में धकेला जा रहा है.
अगर राहुल गांधी इतने ही बेकार हैं कि वे इस सरकार के लिए एक 'एसेट' और विपक्ष के लिए एक 'लायबिलिटी' की तरह काम करते हैं, तो फिर सरकार उन्हें ख़बरों में बनाए रखने के लिए इतनी ज़ोर-शोर से कोशिश क्यों कर रही है?