यह कहानी इंदिरा गांधी और उनके विरोधियों की है मगर इसमें पात्रों की भूमिकाएं उलट गई हैं, कॉंग्रेस पुरानी गलतियां कर रही है लेकिन अब उसमें बदलाव के कुछ संकेत दिख रहे हैं
यह बात तो आईने की तरह साफ है कि इस दौरान दलितों के मानवाधिकारों की रक्षा के समुचित प्रयास किये गये होते तो उन्हें अपमानित करना और अत्याचारों का शिकार बनाना इतना आसान कतई नहीं होता.
मोदी सरकार ने संविधान का उल्लंघन करने का एक अनौपचारिक तरीका खोज लिया है. इस तरीके में आपको संविधान में लिखे शब्दों को बदलने की जरुरत नहीं होती- बस संविधान से छुटकारा पा लेना होता है
वाकई में जो बातें बहुत महत्वपूर्ण होतीं हैं, उनके बारे में फोन पर चर्चा नहीं की जाती है. भारत को संस्थागत सुधारों की शुरुआत करनी चाहिए जो उसकी खुफिया सेवाओं की सबसे बड़ी जरूरत है.
भारत की सभी राजनैतिक पार्टियों और सरकार को यह बात साफ साफ समझ लेनी चाहिए कि भारत में मुसलमान का मतलब देशज पसमांदा होता है, अशराफ नहीं, जब तक वो इस गलतफहमी में रहेगें तब तक वो अशराफ का भला करके इस मुगालते में रहेंगे कि वो पसमांदा का भला कर रहें हैं.
कांग्रेस अगर 2024 में भाजपा को हराने का सपना देख रही है तो चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर की योजना के मुताबिक उसे अपना संदेश और संदेशवाहक चुनना होगा और गांधी कुनबे को दूसरों के लिए जगह बनानी पड़ेगी.
सड़क-छाप गैंग आम तौर पर छोटी-मोटी और निम्न स्तर की हिंसक घटनाओं के साथ एक राष्ट्रवादी हिंदू राष्ट्र के निर्माण की कोशिश में जुटे हैं. सांप्रदायिक हिंसा पहले भी होती रही है, लेकिन तब कम से कम संस्थाओं की सर्वोच्चता को चुनौती नहीं मिलती थी.