जाति आधारित पहचान की राजनीति ने हिंदू राजनीतिक गोलबंदी को जरूर कुछ दिनों तक रोक कर रखा परंतु इसका एक दूरगामी परिणाम यह रहा कि जातीय पहचान की राजनीति ने हिंदू धार्मिक पहचान को सहर्ष स्वीकार किया.
सैन्य जेल में मौत की सजा का इंतजार कर रहे उसी प्रवक्ता-जिहादी कमांडर मुस्लिम खान को पिछले महीने गोपनीय तरीके बाहर लाकर काबुल में अफगान तालिबान की हिरासत में सौंप दिया गया.
भारतीय मुसलमानों की भावनाओं की इतनी ही कद्र होती तो नूपुर शर्मा और नवीन जिंदल को नफरत भड़काने वाला बयान देते ही तुरंत बर्खास्त कर दिया जाता, दुनियाभर के विरोध के बाद नहीं.
केंद्र सरकार वहां पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को फिर से बहाल करना चाहती है, उसका लक्ष्य है कि राज्य में जल्द से जल्द से विधानसभा चुनाव करा दिये जायें जिससे जनभागीदारी की अवधारणा को जमीनी हकीकत में बदला जाय.
ज्ञानवापी मस्जिद पर कानूनी फैसला आने में कुछ साल और लगेंगे इसलिए फिलहाल ऐसा लगता है कि मोदी सरकार और भाजपा इस मसले को ठंडे बस्ते में डालने का मन बना रही है.
ओडिशा से लेकर कर्नाटक तक भाजपा 2019 के बाद से ही अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए संघर्ष कर रही है और इसके सहयोगी इसके विस्तारवादी मंसूबों के प्रति लगातार सावधान होते जा रहे हैं.
सरकार कड़वा सच क्यों नहीं बोल सकती, इसे समझना बहुत आसान है. तमाम युद्धों की तरह यह युद्ध भी जब रुक जाएगा तब भी भारत के हित विजेता के साथ भी जुड़े होंगे और हारने वालों के साथ भी.