Thursday, 8 December, 2022
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लखनऊ में पढ़े चीनी मौलाना ने कैसे सुलगाई शिनजियांग में जिहाद की चिनगारी

हई वेलियांग नामक चीनी मुस्लिम यात्री 1920 के दशक में कोलकाता का चक्कर लगाकर ही नहीं गया बल्कि दुनियाभर में जिहाद के लिए जमीन भी तैयार कर गया.

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किशोरवय की दहलीज पर पहुंचा हई वेलीयांग उस दिन चीन के अपने गांव से ढाई हजार किलोमीटर दूर कोलकाता के बंदरगाह पर खड़ा था. वह हज करके अपने गांव लौट रहा था लेकिन आस्था की रोशनी उसे वहां खींच कर ले आई थी. अब वह समझ नहीं पा रहा था कि किधर जाए. खैर, एक दयालु मौलाना ने उसे एक मस्जिद के पास की सराय में सस्ते में एक कमरा दिलवा दिया. यात्रियों के लिए प्रकाशित, चीनी से अंग्रेजी बातचीत की एक किताब की मदद से हई ने स्थानीय मदरसे के लड़कों से बातचीत शुरू की.

आगे चलकर, उसकी बेबाक तहरीरें मध्य एशिया में आग लगाने लगीं.

पिछले महीने, चीन के हिरासत केंद्रों में कैद शिनजियांग के हजारों लोगों के साथ किए गए अत्याचारों के नये सबूत सामने आए. ये केंद्र मजहबी अलगाववाद पर लगाम कसने के लिए बनाए गए हैं. ताजिकिस्तान और किर्गिस्तान को आंदोलनकारी इस्लामी गुटों के दमन का कदम उठाना पड़ा. इन गुटों की घातक पहुंच फ़र्घाना घाटी से लेकर यूरोप के केंद्रीय स्थानों तक है.

कोलकाता पहुंचे उस चीनी मुस्लिम लड़के की असामान्य-सी कहानी बताती है कि एक सदी पहले भारत ने वैश्विक जिहादी मुहिम के विस्तार के लिए किस तरह जमीन मुहैया की थी.

हई ने 1934 में एक लेख में लिखा था कि स्थानीय तुर्क मुसलमानों का इस्लामी राज्य केवल काशगर और उसके आसपास ही सीमित नहीं होगा बल्कि अफगानिस्तान की पूर्वी सीमा से लेकर चीन की विशाल दीवार तक फैला होगा.’ उन्होंने निर्देश दिया कि इस्लामी मुल्क उनकी मदद करें और ‘वहां रह रहे चीनी बुतपरस्तों को काट डालें, चाहे वे व्यापारी हों या कामगार, और चीनी दूतावासों में अगर चीनी मुसलमान काम न कर रहे हों तो उन्हें खारिज कर दें.’
यह घोषणापत्र जिस माहौल में तैयार हुआ वह हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिक टकराव का था.

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हुनान का विद्यार्थी

हई के जीवन के बारे में छिटपुट जानकारियां ही बची हैं. अंग्रेजी में विद्वान जॉन चेन की लिखी उसकी एक जीवनी जैसी उपलब्ध है. हई का जन्म 1912 में हुनान के जिमुशन गांव में हुआ था. उल्लेखनीय बात यह है कि यह गांव माओ जेदोंग के गांव के पास हई और हई का जन्म भी लगभग माओ के जन्म के आसपास हुआ था. उनकी गरीब मां ने उन्हें पढ़ाई करने के लिए स्थानीय मदरसे में भेजा. भाषा में उनकी प्रतिभा के कारण उन्हें शंघाई के पीच ऑर्चार्ड सेमीनरी में दाखिला मिल गया. 1920 के दशक के मध्य में, हई को हज पर जाने के लिए चुन लिया गया, और वे इस यात्रा के बीच बिना पूर्व योजना के कोलकाता में रुके.

हई की बाल प्रतिभा से प्रभावित होकर नयी दिल्ली की जामिया मिल्लिया इस्लामिया के संस्थापक ज़ाकिर हुसैन ने उन्हें आज प्रसिद्ध इस शिक्षण संस्था में क्लास करने की अनुमति दे दी. बाद में वे अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी गये और वहां चीनी राष्ट्रवादी नेता सन यात-सेन पर शोधग्रंथ लिखा. अरबी, फारसी, उर्दू, और अंग्रेजी में एमए करने के बाद वे लखनऊ के दारुल-उल-उलूम नादवात-उल-उलेमा में आ गए.

19वीं सदी के अंत में चीन में उभरे विचारकों ने हज यात्राओं के जरिए इस्लामी पवित्रता के विचारों को अपनाना शुरू कर दिया था. इमाम मा वानफू ने, जिनका उल्लेख इतिहासकार जोनाथन लिपमैन ने किया है, उत्तर-पश्चिमी चीन की स्थानीय संस्कृति की जगह नये, निर्देशात्मक इस्लाम को स्थापित करने की कोशिश की. लेकिन हई की पीढ़ी के लिए सवाल आस्था, सत्ता और मुस्लिम राजनीतिक आकांक्षा के बीच संबंध का था.

संभव है कि हई का पहला सामना लखनऊ में मुहम्मद इक़बाल के विचारों से हुआ. विद्वान मशल सैफ ने लिखा है कि नदवत-उल-उलेमा के प्रारंभिक धर्मशास्त्री इस्लाम की शान के बारे में इक़बाल के विचारों और खुद इक़बाल के प्रति सम्मोहित थे. हई ने इक़बाल के उस मशहूर भाषण का अनुवाद किया, जो उन्होंने 1930 में इलाहाबाद में दिया था और जिसने पाकिस्तान के लिए आंदोलन को जन्म दिया था. हई ने उनके विचारों को व्यापक प्रासंगिकता देने की वकालत की. अपने श्रोताओं-पाठकों को हई ने अपनी यह योजना बताई— ‘मुस्लिम मुल्कों पर जो बंदिशें हैं उनको तोड़ने के लिए सभी मुसलमानों का नेतृत्व करना और खिलाफत की पुनःस्थापना की वकालत करना.’

भारत की तरह चीन में भी मुसलमान मजबूत अल्पसंख्यक हैं और उनकी आबादी के बड़े एन्क्लेव भी हैं लेकिन वे पूरे देश में बिखरे हुए हैं. हई का कहना था कि भारत के मुसलमानों की तरह उन्हें भी धार्मिक बहुसंख्यकों के नियंत्रण में केंद्रीकृत सत्ता तंत्र से खौफ खाने की वजहें मौजूद हैं.

1934 में हई काहिरा के महान अल-अज़हर मदरसे में अध्ययन करने चले गए, और राशिद रीदा सरीखे उपनिवेशवाद विरोधी दक्षिणपंथी धर्मशास्त्री की नज़रों में आ गए. अपने समकालीनों के साथ मिलकर हई ने चीन को विश्वव्यापी इस्लामी तहरीक के केंद्र में ला दिया.

फ़र्घाना में आग

पिछली सदी के शुरू में, भारत के मदरसों में हई ही अकेले तुर्क छात्र नहीं थे जो नये विचारों से उलझ रहे थे. कोकंद में जन्मे मौलाना मुहम्मद रुस्तमोव 1925 के आसपास देवबंद के दारुल-उलूम मदरसे में आए. इससे पहले वे बुखारा और अजमेर के धार्मिक संस्थानों में पढ़ाई कर चुके थे. इतिहासकार माइकल फ्रेडहोम ने लिखा है कि उन्हें शायद देवबंद के उन मिशनरियों ने दाखिल किया था जो 1925 से मध्य एशिया की यात्राएं कर रहे थे.

रुस्तमोव देवबंद से जो धार्मिक संदेश लेकर आए उसे रूस की ‘केजीबी’ ने पसंद नहीं किया. उन्हें कई बार गिरफ्तार किया गया और अंत में साइबेरिया के कैदी शिविर में भेज दिया गया. 1943 में, रूसी सेना के सैनिक के रूप में सामने आए रुस्तमोव ताजिकिस्तान में बस गए. उन्होंने सरकारी क्लर्क की, और फिर ताजिक एकेडमी ऑफ साइंसेज में नौकरी की.

लेकिन 1970 के दशक के मध्य से रुस्तमोव ने गुप्त प्रवचन समूह बनाने शुरू किए. उनके चेले मध्य एशिया में जिहादी आंदोलन के अगुआ बने. विटली नॉमकिन ने लिखा है कि मिस्र के सईद कुत्ब और पाकिस्तान के अबुल अला मौदूदि जैसे विचारकों से प्रेरित ये लोग इस्लामी क्रांति लाना चाहते थे. पत्रकार अहमद रशीद ने लिखा है कि अफगानिस्तान में तालिबान के उभार ने इन विचारों को फौजी ताकत दे दी, जिसके कारण मध्य एशिया में बर्बर बगावतें शुरू हो गईं.

शिनजियांग के जिहादी भी अफगानिस्तान में अपनी फौजी ताकत हासिल करते हैं. 1980 के दशक के मध्य से, शिनजियांग में आर्थिक विकास के कारण प्रवासियों की भीड़ बढ़ी है. विद्वान ग्राहम फुलर कहते हैं कि जनसंख्या के दबाव के कारण कई उइगर इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि प्रगति ने ‘जनता के रूप में उनके वजूद को ही खतरे में डाल दिया है.’ 1990 के दशक के मध्य से सांप्रदायिक हिंसा शुरू हो गई जिसके बाद चीन ने पुनरुत्थानवादी मौलानाओं पर हमला बोल दिया. इसके कारण जिहाद में शामिल होने वालों की संख्या बढ़ने लगी.

शिनजियांग के मूल उइगर, और मध्य एशिया में उनके समकक्ष सीरिया के अलावा पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिम में जिहादी युद्ध स्थलों में सक्रिय हैं. हई ने मध्य एशिया में अफगानिस्तान से लेकर चीन की विशाल दीवार तक जिस इस्लामी राज्य की कल्पना की थी वह उन जिहादियों के दिमाग में अभी भी बसी हुई है, चाहे उन्होंने हई को कभी पढ़ा न हो.

विचारधारा और राजनीति

सभी क्रांतिकारी विचारों की तरह जिहाद की भी अपनी बौद्धिक परंपरा है. इतिहासकार आयशा जलाल की किताबें बताती हैं कि उपनिवेश बनने से पहले के भारत में जिहाद की जड़ें गहरी थीं. राय बरेली के सैयद अहमद ने सिख साम्राज्य से लड़ाई लड़ी, जो अभी भी जिहादी सोच को सम्मोहित करती है. जैश-ए-मुहम्मद का मुखिया मसूद अज़हर अलवी कुरान की गवेषणा के लिए प्रेरणा लेने के लिए अपने अंतिम युद्ध मोर्चे बालाकोट चला गया. स्टीफन डेल ने लिखा है कि 18वीं सदी के जिहादियों ने दक्षिण भारत में उपनिवेशवादी ताकतों पर फिदायीन हमले किए थे.

लेकिन वास्तविक दुनिया के संपर्क में आने के बाद कम विचारधारा ही अछूती बच पाती है.

लंबे समय तक हान मूल के लड़ाकों के शासन में रहे शिनजियांग के नेताओं ने— जिनमें कई तो विशव्यापी इस्लामवाद से प्रेरित थे—1933 में आज़ाद पूर्वी तुर्किस्तान गणतंत्र की स्थापना की. बगावत को मा ज़्होंग्यिंग ने कुचल डाला था, जो चीनी मा लड़ाका परिवार और नेशनलिस्ट गुओमिनदांग के कमांडर का रिश्तेदार था. अनुमान है कि गुओमिनदांग की सेना ने हजारों लोगों को मार डाला था. हई का दिल टूट गया था.

हिंदू-मुस्लिम टकराव से शायर इक़बाल का सामना हुआ तो वे कहने लगे कि भारत को ‘एक से ज्यादा देशों में बांट दिया जाए वरना शरीअत को लागू करना नामुमकिन होगा’. उन्होंने निराश होकर लिखा, ‘एकमात्र विकल्प है सिविल वार.’ शिनजियांग ने ऐसी लड़ाई देखी थी, लेकिन दोनों पक्ष मुस्लिम ही थे. यूफेंग माओ का कहना है कि चीन के कुलीन मुसलमान इक़बाल के विचार के उलट निष्कर्ष पर पहुंचे कि सुरक्षा की सबसे बड़ी उम्मीद ताकतवर केंद्रीय सत्ता के साथ जुड़ने में ही है.

हई ने काहिरा में ही रहने और अतिरिक्त धर्मशास्त्रीय योग्यताएं हासिल करने के बाद ही लौटने की योजना बनाई थी. लेकिन 1940 में गुओमिनदांग से जुड़े मुसलमानो ने उन्हें भर्ती कर लिया, जो जापान के खिलाफ युद्ध में अपने समुदाय के योगदान का प्रदर्शन करने को इच्छुक थे. 1942 में, हई को तेहरान में चीन के मिशन में तैनात कर दिया गया और पांच साल बाद नयी दिल्ली भेज दिया गया. चीनी क्रांति के बाद वे गुओमिनदांग के शासन में रहे ताइवान में तीन दशक तक तैनात रहे.

हई की अंतिम कृति ‘अ बाउ टु द वारलॉर्ड मा बुफेंग, द बौछार ऑफ शिनजियांग’ जिसे समर्पित की गई है उसके लिए लिखा है—’परम सम्मानित अमीर को!’ क्रांतिकारी चीन से निष्कासित मा की हई से दोस्ती हो गई; हई उनके बच्चों को अरबी पढ़ाते थे. अपने अंतिम दिन तक हई यही उम्मीद लगाए रहे कि पूर्वी तुर्किस्तान गणतंत्र की स्थापना करने वाले सेनापति और बागी एक होकर इस्लामी राज्य की स्थापना करेंगे.

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

(लेखक दिप्रिंट के नेशनल सिक्योरिटी एडिटर हैं. वह @praveenswami पर ट्वीट करते हैं. व्यक्त विचार निजी हैं.)


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