वाजपेयी के नेतृत्व वाले बीजेपी को डर था कि अगर मुसलमानों को यह महसूस कराया गया कि उनकी धार्मिक मान्यताओं को निशाना बनाया जा रहा है तो भारत के सामाजिक ताने-बाने को नुकसान होगा. मोदी को इस प्रकार की कोई चिंता नहीं है.
भारत के अखबार भारतीय टीवी समाचारों की तरह ‘मुसलमान’ के पीछे नहीं भागते और कहानियां कुछ भी हो सकती हैं जब तक कि मुसलमान शामिल हों और उनका नाम लिया जा सके.
हिंदी फिल्मों में रीमेक क्षेत्रीय गानों को बड़े पैमाने पर दर्शकों तक पहुंचाते हैं, लेकिन इसका क्रेडिट बड़े बॉलीवुड गायक को मिलता है, मूल कलाकार को नहीं.
नरसिम्हा राव की कार्यशैली इतनी शालीन थी कि वे आत्म-निषेध की हद तक जाती थी, जिसे किसी राजनीतिक नेता का गुण नहीं माना जाता, लेकिन उनका तरीका मुकम्मिल और प्रभावी था.
सरकार द्वारा सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों को सक्षम किए बिना, मोदी और बाइडेन के बीच हस्ताक्षरित सौदे भारत की सैन्य शक्ति को मजबूत करने की उनकी क्षमता का अहसास नहीं करा पाएंगे.
यह सुनिश्चित करने के लिए कि राज्य के कानून संविधान के ढांचे के भीतर आते हैं, राज्यपाल को ‘विवेकाधीन शक्तियां’ दी जाती हैं, इसे अक्सर एक राजनीतिक टूल की तरह इस्तेमाल किया जाता है.
मेरा मानना है कि अच्छे माइक्रो आंकड़े और विदेशों में मिली प्रशंसा ही चिंता का कारण है. उससे 2004 में भी जीत नहीं मिली थी, उससे अभी भी जीत नहीं मिल सकती है.
एक औपचारिक संधि के वास्तव में नकारात्मक परिणाम हो सकते हैं. वर्तमान का गले लगना, पीठ थपथपाना और ढेर सारे आर्थिक, वित्तीय और तकनीकी संबंध ठीक काम करते हैं.
यूक्रेन में पुतिन की विफलता युद्ध सामग्री की कमी, कमजोर नेतृत्व और सैनिकों के पलायन के कारण हुई. यह बिल्कुल प्रथम विश्व युद्ध के दौरान tsar की विफलता की तरह है जिसके बाद रूसी क्रांति हुई.
इंडिया आर्ट फेयर में सबसे ज़्यादा चर्चा में रहने वाला आर्टवर्क किसी परिभाषा में नहीं बंधता—गिरजेश कुमार सिंह मलबे से निकाली गई ईंटों से लोगों और उनके बैग की मूर्तियां बनाते हैं. इस प्रदर्शनी का नाम 'हाल मुकाम' है.