‘भारत जोड़ो यात्रा’ की तरह और ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ का भी मकसद भारत की धार्मिक, सांस्कृतिक एवं क्षेत्रीय विविधता में एकता के सूत्रों पर भाजपा के हमलों के खिलाफ जनता में चेतना जगाना है.
अगर 80 प्रतिशत हिंदू गैर-भाजपा मतदाताओं के जीवन में धर्म ज़रूरी है, तो भाजपा द्वारा राजनीति को धर्म के साथ मिलाने के बारे में विपक्ष के तर्क की प्रभावशीलता पर सवाल उठता है.
लगता है कुछ तो बदल गया है - किसी से कोई दुश्मनी का भाव नहीं. छोटी चीज़ों का फिर से अर्थ समझ आ रहा है- अक्षत की छोटी थैली, पांच दीये, लोक गीत और आरती तक.
भारत के लिए असली सवाल यह है कि उसने राजनीति को मणिपुर जैसे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण राज्यों को जातीय संघर्ष में झोंकने की इज़ाज़त क्यों दी है, जिससे एशियाई राजमार्ग 1 को पूरा करने की उसकी उम्मीदों पर पानी फिर गया है.
यहां ज़िक्र उस इस्लाम का नहीं जो एक आस्था है, बल्कि उस सियासी इस्लाम का है जहां आस्था मुल्क का मज़हब है और एक राष्ट्र को परिभाषित करता है और/ या उसके ज्यादातर अनिर्वाचित नेताओं को सत्ता में बनाए रखता है.
एक पसमांदा मुस्लिम होने के नाते मैं अक्सर सोचती थी कि भारतीयों को मुस्लिम समुदाय से कम उम्मीदें क्यों हैं, जो उद्धारकर्ता बनने की इच्छा में समस्याग्रस्त परंपराओं का समर्थन करते हैं.
सदियों तक राम को सर्वोच्च देवता नहीं बल्कि एक अर्ध-अलौकिक नायक और आदर्श राजा माना जाता था. 1200 के दशक से ही प्रमुख राम मंदिरों का निर्माण किया गया था.
वाजपेयी के बारे में कहने के लिए इतना कम क्यों है जो कि मेरी नजर में हमारे सबसे अच्छे प्रधानमंत्रियों में से एक हैं? हिंदुत्व को पूरी तरह से अपनाए जाने से इनकार करने के बावजूद वे उन पर हमला नहीं कर सकते क्योंकि वह उनके अपनों में से एक थे. लेकिन वे उनकी तारीफ भी नहीं करते.
मोदी सरकार अरविंद केजरीवाल के साथ जो कर रही है, वह गलत है. लेकिन क्या मोदी सरकार कभी अस्तित्व में आती, अगर केजरीवाल और उनके 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' आंदोलन ने UPA को तबाह न किया होता?