भारत के लिए मोदी का करिश्मा और दूरदर्शिता ही चुनाव के लिए एकमात्र जनादेश है. स्थानीय नेता सुविधाप्रदाता से ज्यादा कुछ बन नहीं पाते. उनके नाम पर वोट जीतने की उम्मीद नहीं की जाती है.
कई एंकर और जाने-माने टीवी समाचार रिपोर्टर अब वहां नहीं हैं जहां उन्हें होना चाहिए था — उन्होंने नई ज़िम्मेदारियां ले ली हैं और हमें अपना सिर खुजलाने के लिए छोड़ दिया है.
व्यवसायी वर्ग चाहता है कि नरेंद्र मोदी की सरकार वापस आए लेकिन वह अल्पमत सरकार हो और गठबंधन के सहयोगियों की बैसाखी के सहारे हो, जो उसकी किसी ज्यादती पर लगाम कसे रहें.
यह कहना एक आलसी सरलीकरण होगा कि भारतीय राजनीति भाजपा-प्रेमी उत्तर भारत, और भाजपा- विरोधी दक्षिण में बंट चुकी है. 2024 का मुक़ाबला भाजपाई ‘हार्टलैंड’ बनाम परिधि वाले राज्यों का होगा.
आज बुद्धिजीवी लगातार हिंदू प्रधान भारत में हाशिये पर पड़े मुसलमानों की मार्मिक कहानियों की खोज में लगे हुए हैं. एक पसमांदा मुस्लिम के रूप में मेरा नज़रिया प्रमुख कहानी से काफी अलग है.