एक लंबा सिलसिला खत्म हो गया, एक ऐतिहासिक और सर्व-समावेशी परंपरा आकर थम गई, बहुआयामी व्यक्तित्व वाली शख्सियत की खूबियां हमारे सामने से गुजरने लगी और न जाने कितनी ही दिल और दिमाग में बिखरी यादों ने सिमटकर एक मूर्त रूप ले लिया- दिलीप कुमार साहब का.
भारतीय सिनेमा के गोल्डन एरा के शानदार अभिनेताओं में से एक दिलीप कुमार थे. उनका बहुआयामी व्यक्तित्व था. हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी भाषाओं पर उनकी जबरदस्त पकड़ थी.
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर निवेदिता मेनन अपनी किताब 'नारीवादी निगाह से' में नारीवादी सिद्धांतों की बेहद जटिल अवधारणाओं को विस्तार से बताती हैं.
'हमारी दलित बस्ती के अनगिनत दलित हजारों दुख-दर्द अपने अंदर लिए मुर्दहिया में दफन हो गए थे. यदि उनमें से किसी की भी आत्मकथा लिखी जाती तो उसका शीर्षक मुर्दहिया ही होता.'
कबीर बेदी के संस्मरण 'स्टोरीज आई मस्ट टेल: द इमोशनल जर्नी ऑफ एन एक्टर’ के विमोचन के मौके पर खान ने कहा कि उनकी जिंदगी में ऐसे कई मौके आए जब उन्हें अपनी गलतियों की जिम्मेदारी लेने में मुश्किल हुई.
नए कानून का यह मसौदा, जिस पर कई फिल्म निर्माताओं ने सवाल उठाये हैं, मोदी सरकार द्वारा फिल्म सर्टिफिकेशन अपीलेट ट्रिब्यूनल को समाप्त करने के कुछ ही हफ्तों बाद आया है.
रणनीतिक तौर पर, बिना शर्ट वाला यह प्रदर्शन आत्मघाती गोल से भी बुरा था. अचानक, AI समिट की सारी गड़बड़ियां भूला दी गईं और यूथ कांग्रेस का विरोध ही मुद्दा बन गया.