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Sunday, 22 March, 2026
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समाज-संस्कृति

राजस्थान के आदिवासियों की सदियों पुरानी ‘मौताणा’ प्रथा अब उन्हीं के लिए नासूर कैसे बन गई है

मौताणा का मक़सद आरोपी को आर्थिक दंड और पीड़ित को सहायता देना था, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से यह प्रथा साजिश और शोषण का ज़रिया बन गई है.

‘आधुनिक डोगरी की जननी’ कवयित्री-संगीतकार पद्मा सचदेव ने 81 साल की उम्र में मुंबई में ली अंतिम सांस

1940 में जम्मू के पुरमंडल में जन्मी पद्मा एक संस्कृत विद्वान जय देव बडू की तीन संतानों में सबसे बड़ी थी. पिता की भारत के विभाजन के दौरान मृत्यु हो गयी थी.

‘मेरी शायरी मेरी जिंदगी से जुदा नहीं’: प्रेम से लबरेज़ गीत लिखने वाले रोमांटिक शायर शकील बदायुनी

मजरूह सुल्तानपुरी, कैफ़ी आज़मी, साहिर लुधियानवी उस समय राष्ट्रवाद और फासीवाद विरोधी गीत लिख रहे थे, वहीं इसी प्रगतिशील ब्रिगेड के बीच अपनी कलम से एक अलग पहचान बनाने में बदायुनी सफल रहे.

प्रेमचंद का साहित्य और सत्यजीत रे का सिनेमा: शब्दों से उभरी सांकेतिकता का फिल्मांकन

साहित्य और सिनेमा का जो रिश्ता जुड़ा, उस पर गहराई से नज़र डाली जाए तो ये चर्चा फिल्मकार सत्यजीत रे और साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद के बिना अधूरी जान पड़ती है.

‘मैं बंबई का बाबू, नाम मेरा अंजाना’- भारतीय सिनेमा में कॉमेडी को शक्लो-सूरत देने वाले जॉनी वॉकर

जॉनी वॉकर जिस अंदाज में अपने चेहरे को घुमाते, नज़रें तिरछी करते, भौंहे सिकुड़ाते, नाक से निकली आवाज के दम पर डॉयलग डिलीवरी करते- कॉमेडी की दुनिया में ये अनोखी बात थी.

आनंद बख्शी : तकदीर से ज्यादा तदबीर पर भरोसा करने वाला गीतकार

बख्शी साहब के गानों में एक दर्शन भी है. जो 'पिया का घर' फिल्म के इस गाने में बखूबी झलकता है- ये जीवन है, इस जीवन का यही है, यही है, यही है रंग-रूप...थोड़े गम हैं, थोड़ी खुशियां, यही है, यही है छांव-धूप .

मौसिकी की दुनिया की सबसे मखमली आवाज़ थीं गीता दत्त

हिन्दी गीतों के क्रॉफ्ट में जो मधुरता, दर्द, चुलबुलेपन का पुट गीता दत्त लाईं, अगर वो न होतीं तो अच्छे गानों से हम महदूद हो जाते. लेकिन तकदीर ने गीता दत्त का साथ नहीं दिया और उनकी तदबीरें भी काम नहीं आईं.

‘होरी की धनिया चली गई’- कैरेक्टर एक्टिंग को एक अलग मुकाम देने वाली सुरेखा सीकरी

तमस, मम्मो और बधाई हो के लिए सुरेखा सीकरी को तीन बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला. 1989 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी अवॉर्ड भी मिला.

बालिका वधू की ‘दादी सा’ सुरेखा सीकरी का दिल का दौरा पड़ने से निधन, 3 बार जीत चुकी थीं नेशनल अवार्ड

सीकरी ने ‘तमस’, ‘मम्मो’, ‘सलीम लंगड़े पे मत रो’, ‘ज़ुबेदा’, ‘बधाई हो’ जैसी फिल्में की हैं और धारावाहिक ‘बालिका वधू’ में निभाए उनके ‘दादी सा’ के किरदार को भी काफी लोक्रपियता मिली थी.

‘सब कुछ है, पर कुछ भी नहीं रहा’- सिनेमाई पर्दे पर जीवन की पूरी ट्रेजेडी उतार देने वाले गुरु दत्त

अभिनेता और फिल्मकार गुरु दत्त का सफर अलग रास्तों से गुजरता है, बावजूद इसके रे और दत्त का सिनेमा कई मायनों में एक सी धरातल पर जान पड़ता है.

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जोधपुर: कानूनी जंग जीतकर बाल विवाह की बेड़ियां तोड़ीं, दूसरों को भी उम्मीद की राह दिखाई

जोधपुर, 22 मार्च (भाषा) बारह बरस की उम्र-जब हाथों में किताबें होनी चाहिए थीं, तब उसकी कलाई पर शादी का धागा बांध बचपन की...

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सुप्रीम कोर्ट का सही फैसला और बिलकिस बानो की जीत

दिप्रिंट के संपादकों द्वारा चुने गए दिन के सर्वश्रेष्ठ कार्टून.