Wednesday, 25 May, 2022
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आनंद बख्शी : तकदीर से ज्यादा तदबीर पर भरोसा करने वाला गीतकार

बख्शी साहब के गानों में एक दर्शन भी है. जो 'पिया का घर' फिल्म के इस गाने में बखूबी झलकता है- ये जीवन है, इस जीवन का यही है, यही है, यही है रंग-रूप...थोड़े गम हैं, थोड़ी खुशियां, यही है, यही है छांव-धूप .

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संभावनाओं की तलाश इंसान को कई रास्तों पर लेकर जाती है. कई मुहानों से होकर गुजरना पड़ता है. हर घड़ी कुछ छूट रहा होता है और हर आने वाला पल नई उम्मीद लिए आता है. कामयाबी, जीवन में खुशी और स्थिरता और एक अच्छे खासे मुकाम की उम्मीद.

इतना सब कुछ पा लेने की चाह हमें कई चीज़ों से दूर करती चलती है. अपने शहर और गांव से दूर, अपने परिवार से दूर, अपने पिंड से दूर, यहां तक कि खुद से भी एक तरह की दूरी बनती चली जाती है.

उतार-चढ़ाव में जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा गुज़र जाता है. जिंदगी के सफर में गुज़र जाते हैं जो मुकाम वो फिर नहीं आते….ये गीत जीवन में एक मुहावरा बन गया है. ऐसे ही इंसानी जज्बात, खुशी, दर्द, मस्ती, मौसम, रुहानियत के गीत जीवन के अलग-अलग चरणों में हमें आकर्षित करते हैं.

लेकिन क्या कल्पना की जा सकती है कि इन तमाम पहलुओं पर एक ही शख्स ने गीत लिखे हैं. ऐसा शख्स जिसने बंटवारे की त्रासदी देखी, कम उम्र में अपनी मां को खोया, समृद्ध घराने से होते हुए रिफ्यूजी बनकर जीने पर मजबूर होना पड़ा, नेवी में बगावत की, भारतीय सेना को कई साल दिए और जीवन में समय की कीमत और अनुशासन को हर पल बरता और ऐसे संघर्षों से तपते हुए जमाने को ऐसे खूबसूरत गीतों से नवाजा जो पीढ़ी दर पीढ़ी सुने और पसंद किए जा रहे हैं.

उस शख्स का नाम है- आनंद बख्शी.

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इसी साल आनंद बख्शी के बेटे राकेश आनंद बख्शी ने कई सालों की मेहनत के बाद एक किताब लिखी है. किताब का नाम है- नग़मे, किस्से, बातें, यादें. आनंद बख्शी के पूरे जीवन और उनके गीतों के संसार को समझने के लिए ये एक अच्छी किताब है.

गीतकार आनंद बख्शी की 91वीं जयंती पर दिप्रिंट उनके जीवन, उनके गीतों पर एक नज़र डाल रहा है.


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जिंदगी में दूसरा मौका

रावलपिंडी (आज का पाकिस्तान) में 21 जुलाई, 1930 को आनंद बख्शी का जन्म हुआ था. बंटवारे के समय उनका परिवार सुरक्षित दिल्ली आ गया था क्योंकि उनके दादा ब्रिटिश पुलिस में थे लेकिन दिल्ली आने के बाद उन्हें एक रिफ्यूजी की तरह रहना पड़ा.

आजादी से पहले युवा कैडेट के तौर पर आनंद बख्शी रॉयल इंडियन नेवी में काम कर रहे थे. कुछ और लोगों के साथ मिलकर उन्होंने बगावत कर दी और जय हिंद का नारा लगाया. ब्रिटिश कमांडिंग ऑफिसर ने उन्हें जेल में नहीं डाला बल्कि नौकरी से निकाल दिया.

आनंद बख्शी ने बाद के सालों में उस घटना को याद करते हुए कहा था, ‘ये उस ब्रिटिश कमांडिंग ऑफिसर की समझदारी और उनका बड़प्पन था कि उन्होंने जिंदगी में मुझे दूसरा मौका दिया. वरना क्या पता, मैं जेल में ही सड़ता या मर जाता. इतना तो तय था कि जेल जाने के बाद मेरी जिंदगी की दिशा कुछ और ही हो जाती. शायद मैं उसके बाद कभी बंबई नहीं पहुंच सकता था और गीतकार तो कतई नहीं बन सकता था.’

नेवी से निकलने के बाद आनंद बख्शी ने रावलपिंडी के एक सिनेमा हॉल में बतौर टिकट बाबू की नौकरी की ताकि मुफ्त में वो फिल्में देख पाएं. शुरुआती दिनों से ही उन्हें गीत गाने और कविताएं लिखने का शौक था.

उन्होंने कहा था, ‘बचपन से ही गीत, गाने और अपनी कविताओं की धुन बनाने से मेरे भीतर कविता और संगीत का झरना फूटा. बचपन में मैंने जो कुछ देखा और झेला, वो सब मेरे साथ रहा और इसका असर आगे चलकर मेरे गानों पर पड़ा. सन 1950 के बाद से मेरा एक मकसद बन गया था कि मैं फौज छोड़ूंगा और एक कलाकार बनूंगा.’

बंटवारे के बाद भारत आने के कुछ महीनों में ही वो भारतीय फौज में शामिल हो गए और 1956 तक लगातार काम करते रहे. इस बीच एक बार नौकरी छोड़कर वो बंबई भी गए लेकिन वहां उन्हें कोई सफलता नहीं मिली और वो फिर से सेना से जुड़ गए लेकिन उन्होंने लिखना नहीं छोड़ा. दिल्ली के जाने-माने शायर बिस्मिल सईदी से उनकी नजदीकी थी. वो अपनी कविताएं उन्हें सुनाने लगे और उसे दुरुस्त किया.

जावेद अख्तर ने एक बार कहा था, ‘हिंदुस्तान को गीतों का मुल्क कहते हैं इसलिए कि यहां की अनगिनत जुबानों में हर मौके के लिए अनगिनत लोकगीत हैं, लेकिन मुझे कभी-कभी लगता है कि अगर ये अनगिनत गीत नहीं भी होते तो हिंदुस्तान को गीतों का मुल्क कहने के लिए अकेले आनंद बख्शी साहब ही काफी थे.’

उन्होंने कहा था, ‘वो जज्बात का कौन-सा मोड़ है, वो अहसास की कौन-सी मंजिल है, वो धड़कनों की कौन-सी रुत है, वो मुहब्बत का कौन-सा मौसम है, वो जिंदगी का कौन-सा मुकाम है, जहां सुरों के बादलों से आनंद बख्शी के गीत के चांद झलकते ना हों.’


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‘कहानी में ही गाना है’

आनंद बख्शी के घर में कोई ये नहीं चाहता था कि वो बंबई जाएं और फिल्मी दुनिया से जुड़ें. बख्शी साहब खुद गायक बनना चाहते थे. उन्होंने कहा था, ‘मेरे खानदान में सारे लोग पुलिस में थे या फौज में या जमींदार थे और मैं खानदान की इस रवायत को तोड़ रहा था.’

उन्होंने कहा था, ‘गानों का ताल्लुक फिल्म के सीन, कहानी और किरदारों से बड़ा गहरा होता है.’

संगीतकार एसडी बर्मन ने भी उनसे कहा था, ‘बख्शी फिल्म की कहानी ठीक से सुनो. कहानी में गाना है.’

फौज और यहां तक कि भारतीय रेल जिससे मैंने अपने फौजी दिनों में देशभर का सफर किया, दोनों ने मुझे समय की कीमत सिखलाई और समर्पण सिखलाया. बख्शी साहब ने भारतीय फौज में 8 साल और रॉयल इंडियन नेवी में तीन साल काम किया था. फौज के लिए उन्होंने तीन कविताएं भी लिखी थीं.

1956 में दूसरी बार बंबई आने के बाद भी उन्हें सफलता नहीं मिल रही थी. उन्होंने कहा था, ‘मैंने दोनों तरह के दौर देखे हैं. ये मेरी खुशनसीबी है कि अपने कैरिअर के शुरुआती आठ सालों में मैंने बेकारी का लंबा दौर देखा है.’


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‘मेरे गीत जन-भाषा में होते हैं’

फिल्म भला आदमी (1958) में आनंद बख्शी ने पहली बार गाना लिखा. बख्शी साहब इसे अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी फिल्म मानते थे. लेकिन जब जब फूल खिले और मिलन फिल्म के लिए लिखे गानों ने उन्हें कामयाबी दिलाई.

1965 में आई फिल्म जब जब फूल खिले के सारे गाने हिट हुए. एक था गुल और एक थी बुलबुल, ना ना करते प्यार तुम्हीं से कर बैठे, परदेसियों से न अंखियां मिलाना, यहां मैं अजनबी हूं.…गीतों ने उन्हें करोड़ों हिंदुस्तानियों के बीच पहुंचा दिया.

इसके बाद 1967 में आई फिल्म मिलन का गीत सावन का महीना पवन करे सोर… भी काफी पसंद किया गया. इस गाने के बारे में राकेश आनंद बख्शी ने आनंद बख्शी पर लिखी किताब में उनके हवाले से लिखा है कि एक बार जब वो ट्रेन से सफर कर रहे थे तब एक जंगल में जाकर ट्रेन रुकी. वहां उन्होंने एक फकीर को ये गाना गाते हुए सुना और तब उन्हें महसूस हुआ कि उनके गीत लोगों तक पहुंचने लगे हैं.

आनंद बख्शी ने ज्यादातर गाने अपने बेडरूम में लिखे हैं. वो कहते थे कि गाने लिखने के लिए उन्हें कोई माहौल या किसी हिल स्टेशन पर नहीं जाना पड़ता बल्कि वो निर्देशक और प्रोड्यूसर की जरूरत के अनुसार कभी भी गाने लिख सकते हैं.

लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के साथ उन्होंने करीब 300 से भी ज्यादा फिल्मों के लिए गीत लिखे. बख्शी साहब के अनुशासन और समय की पाबंदी की वो लोग काफी तारीफ करते थे. बख्शी साहब ने अपने पूरे कैरिअर में तकरीबन 95 संगीतकारों और 250 से भी ज्यादा निर्देशकों के साथ काम किया. न सिर्फ पुराने लोग बल्कि नई पीढ़ी के लोगों के साथ भी उन्होंने काफी काम किया.

राकेश आनंद बख्शी ने किताब में कई ऐसे वाकयों का जिक्र किया है जिससे ये पता चलता है कि आनंद बख्शी ने कई गाने तो कुछ मिनटों में ही लिख डाले थे.

आनंद बख्शी के गीतों की खूबसूरती उनके इस्तेमाल किए शब्दों में है. जहां साहिर लुधियानवी, कैफी आज़मी सरीखे लोग उर्दू का काफी इस्तेमाल करते थे वहीं शैलेंद्र की परंपरा को आगे ले जाने वाले आनंद बख्शी ने हिन्दी गानों में सरल शब्दों का इस्तेमाल कर उसे जनप्रिय बना दिया.

बख्शी साहब खुद भी कहते थे, ‘मेरी एक ही कमज़ोरी है कि मेरे गीत जन-भाषा में होते हैं.’

आनंद बख्शी ने सिर्फ आठवीं कक्षा तक ही पढ़ाई की थी और हिन्दी में भी उनकी ज्यादा शिक्षा नहीं थी इसलिए उनके पास कोई ज्यादा शब्द भी नहीं थे. उन्होंने कहा था, ‘जो शब्द मेरी बोल-चाल के थे उन्हीं के जरिए मुझे अपनी बात कहनी पड़ी. शायद हिन्दी को लेकर मेरी जो सीमित जानकारी थी, उसी का मुझे एक गीतकार के रूप में बड़ा फायदा मिला और यही मेरी कामयाबी का आधार बन गया, क्योंकि देश के कोने-कोने के लोगों को मेरे गाने समझ में आये और वो उन्हें गुनगुना सके.’

बॉबी, अमर प्रेम, मुहब्बतें, ताल, दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे, आराधना, कटी पतंग, नमक हराम, शोले, कर्ज, खलनायक, परदेस, गदर-एक प्रेम कथा फिल्मों के लिए आनंद बख्शी ने जो गाने लिखें वो आज भी लोग पसंद करते हैं.

राजेश खन्ना की फिल्मों को बिना गानों के कल्पना करके देखिए. आनंद बख्शी ने जो बेहतरीन गाने लिखे… राजेश खन्ना की कामयाबी में उसकी भी एक बड़ी भूमिका थी, जिसे वो खुद भी मानते थे.

आज भी पुराने गानों के सबसे ज्यादा रीमिक्स किसी के बनते हैं तो वो गीतकार आनंद बख्शी के गाने ही हैं. बख्शी साहब के गीतों में जहां मां-बेटे का प्रेम, बिछड़ने का दर्द, प्यार, खुशी मौजूद है तो उनके गानों में एक दर्शन भी है. जो पिया का घर फिल्म के इस गाने में बखूबी झलकता है- ये जीवन है, इस जीवन का यही है, यही है, यही है रंग-रूप…थोड़े गम हैं, थोड़ी खुशियां, यही है, यही है छांव-धूप .

दुनिया में रहना है तो काम कर प्यारे और दुनिया में कितना गम है /मेरा गम कितना कम है...ये गीत भी जीवन के फलसफे को ही बयां करता है.

बख्शी साहब को लेकर कई लोगों ने कहा कि वो तुकबंदी करते हैं और कोई शायर नहीं है. इसका जवाब भी उन्होंने अपने गीतों के माध्यम से दिया और वो कहते भी थे, ‘मैंने कभी शायर होने का दावा नहीं किया बल्कि मैं तो फिल्मी गीतकार हूं.’ मैं शायर बदनाम और मैं शायर तो नहीं  जैसे गीत ऐसी ही आलोचनाओं का जवाब माना जा सकता है.


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‘एक दिन शो खत्म हो जाएगा’

हजारों बेमिसाल गाने लिखने वाले आनंद बख्शी के गीत जनप्रिय हैं, लोग उसे मुहावरे की तरह इस्तेमाल करते हैं. ऐसे बड़े गीतकार ने अपने आने वाली पीढ़ी के लिए जो कहा, वो भी एक मिसाल है. उन्होंने कहा था, ‘एक दिन शो खत्म हो जाएगा. मेरी कहानी खत्म हो जाएगी. ये कड़वा सच है कि दुनिया में सब चीज़ें एक दिन खत्म होती हैं. जैसे मैंने दूसरे गीतकारों के बीच अपनी जगह बनाई वैसे ही नए गीतकार आकर अपनी जगह बनाएंगे. वो अपनी नई और बेहतर शैली से, अपने अल्फ़ाज़ से लोगों पर अपना जादू चलाएंगे.’

नौजवानों को बख्शी साहब ने सलाह देते हुए कहा था, ‘मैं नौजवानों को सलाह दूंगा कि वो बहुत पढ़ें. रोज पढ़ें. साहित्य पढ़ें, चुटकुल पढ़ें, महान शायरों की शायरी पढ़ें. अगर आप गीतकार बनना चाहते हैं तो संगीत सीखिए. हिंदी और उर्दू सीखिए.’

30 मार्च 2002 को हमारे बीच से आनंद बख्शी की बेमिसाल कहानी खत्म हो गई. उनका शो खत्म हो गया लेकिन हमारे बीच उनके गीतों का जादू आज भी है, जो कभी खत्म नहीं होगा. उन्होंने माकूल ही लिखा था-

मैं कोई बर्फ नहीं हूं जो पिघल जाऊंगा
मैं कोई हर्फ नहीं हूं जो बदल जाऊंगा
मैं सहारों पे नहीं, खुद पे यकीं रखता हूं
गिर पड़ूंगा तो क्या, मैं संभल जाऊंगा

रोक सकती है मुझे तो रोक ले दुनिया ‘बख्शी ‘
मैं तो जादूं हूं, जादू हूं चला जाऊंगा…


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