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Friday, 24 April, 2026
होमफीचरभारतीय जल्दी स्किल बढ़ाना चाहते हैं: IIMs के लिए एग्जीक्यूटिव कोर्स बने कमाई का बड़ा जरिया

भारतीय जल्दी स्किल बढ़ाना चाहते हैं: IIMs के लिए एग्जीक्यूटिव कोर्स बने कमाई का बड़ा जरिया

आज के जॉब मार्केट में, जहां कर्मचारियों को कुछ ही मिनटों में नौकरी से निकाला जा सकता है और AI-आधारित ऑटोमेशन हर साल भूमिकाओं को नया रूप दे रहा है, करियर के मध्य चरण में मौजूद पेशेवर लगातार सीखते रहने का संकल्प लेकर इसका जवाब दे रहे हैं.

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नई दिल्ली: सुबनेश सिंह तोमर के लिए लक्ष्य उस सिस्टम में आगे बढ़ना है, जिसे वह पहले से अच्छी तरह समझते हैं.

27 साल के अनुभव वाले टेक्सटाइल इंजीनियर सुबनेश सिंह तोमर ने ट्राइडेंट, वेलस्पन और रिलायंस जैसी कंपनियों में काम किया है. अभी वह कर्नाटक के हसन में हिमतसिंका ग्रुप में वाइस प्रेसिडेंट और स्पिनिंग प्लांट हेड के रूप में काम कर रहे हैं. लेकिन कई सालों के ऑपरेशंस काम के बाद उन्हें लगा कि वह एक सीमा तक पहुंच गए हैं.

उन्होंने कहा, “मुझे एहसास हुआ कि सिर्फ मैन्युफैक्चरिंग और ऑपरेशंस संभालना काफी नहीं है.” उन्होंने कहा, “अगर मुझे अगले लेवल पर जाना है, जैसे सीईओ या सीओओ, तो पूरे बिजनेस की समझ जरूरी है.”

इसी सोच ने उन्हें आईआईएम लखनऊ के एग्जीक्यूटिव जनरल मैनेजमेंट प्रोग्राम (EGMP) में पहुंचाया. यह एक साल का कोर्स है, जिसकी फीस करीब 4.5 लाख रुपये प्लस टैक्स है. यह कोर्स कामकाजी लोगों के लिए बनाया गया है और इसमें हर हफ्ते ऑनलाइन क्लास और दो बार पांच-पांच दिन के कैंपस सेशन होते हैं.

तोमर ने कहा कि इस कोर्स से उनका नजरिया बदल गया है. पहले जहां उनका फोकस प्रोडक्शन और एफिशिएंसी पर था, अब वह रणनीति यानी स्ट्रैटेजी के बारे में सोचने लगे हैं. जैसे निवेश क्यों किया जाता है, बिजनेस अपनी पोजिशन कैसे बनाता है और वह आगे कैसे बढ़ेगा.

फाइनेंस और मार्केटिंग की समझ ने खास तौर पर उनकी सोच बदल दी है. जो चीजें पहले अलग-अलग हिस्सों जैसी लगती थीं, अब आपस में जुड़ी हुई लगती हैं. बैलेंस शीट, कैश फ्लो, प्राइसिंग और पोजिशनिंग अब सिर्फ थ्योरी नहीं हैं, बल्कि रोज के फैसलों के टूल बन गए हैं.

For Subnesh Singh Tomar, the goal is to rise within the industry he already knows inside out | special arrangement
सुबनेश सिंह तोमर का लक्ष्य उस इंडस्ट्री में आगे बढ़ना है, जिसके बारे में उन्हें पहले से ही पूरी जानकारी है | विशेष व्यवस्था

इस मैनेजमेंट प्रोग्राम में आईटी, सप्लाई चेन, एनजीओ और पब्लिक सेक्टर इंजीनियरिंग जैसे अलग-अलग सेक्टर के लोग शामिल होते हैं. इनमें कुछ लोग नए होते हैं और कुछ के पास दशकों का अनुभव होता है. तोमर ने कहा, “यही इसकी खासियत है. आप सिर्फ फैकल्टी से नहीं, बल्कि एक-दूसरे से भी सीखते हैं.”

तोमर का अनुभव भारत में एक बड़े बदलाव को दिखाता है, जहां एग्जीक्यूटिव एजुकेशन तेजी से बढ़ता हुआ सेक्टर बन गया है. आईआईएम और अन्य संस्थानों के ऐसे कोर्स कुछ हफ्तों या महीनों में मैनेजमेंट और स्किल डेवलपमेंट सिखाते हैं और अक्सर इनकी फीस काफी ज्यादा होती है.

जैसे-जैसे ये कोर्स बढ़ रहे हैं, वैसे-वैसे इनके मकसद पर सवाल भी उठ रहे हैं. लोगों के लिए ये अपस्किलिंग और करियर आगे बढ़ाने का मौका हैं और संस्थानों के लिए यह हाई-फीस प्रोग्राम हैं.

यह बात लिंक्डइन पर भी दिखती है, जहां लोग कोर्स खत्म करने, कैंपस विजिट और उपलब्धियों की पोस्ट डालते हैं. कई लोग इसे आईआईएम जैसे संस्थानों में पढ़ने के सपने को पूरा होने जैसा मानते हैं, भले ही कुछ समय के लिए ही सही. ये कोर्स एक ऐसे ब्रांड का एक्सेस देते हैं जो लंबे समय से प्रतिष्ठा से जुड़ा है.

आज के नौकरी बाजार में, जहां कंपनियां अचानक हजारों लोगों को निकाल सकती हैं और एआई कई नौकरियों को बदल रहा है, वहां लोग लगातार सीखने पर ध्यान दे रहे हैं. नौकरी की स्थिरता अब पहले जैसी नहीं रही, इसलिए लोग खुद को अपडेट रखकर आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं.

आईआईएम लखनऊ में ऐसे कोर्स की मांग अब एक्सपेरिमेंट नहीं रही, बल्कि लगातार बनी हुई है. संस्थान हर साल 80 से ज्यादा कोर्स चला रहा है. प्रोफेसर क्षितिज अवस्थी, जो इस प्रोग्राम के डायरेक्टर हैं, कहते हैं कि EGMP का मकसद तकनीकी जानकारी और मैनेजमेंट समझ के बीच की कमी को पूरा करना है. इसमें मार्केटिंग, फाइनेंस, एचआर और स्ट्रैटेजी का एक्सपोजर दिया जाता है.

उन्होंने कहा कि अब छोटे और ट्रेंड आधारित कोर्स की मांग बढ़ रही है, खासकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन के क्षेत्र में. उन्होंने कहा कि इन कोर्स में फोमो यानी कुछ छूट जाने का डर भी लोगों को आकर्षित करता है. उनका मानना है कि कुछ साल में ये कोर्स बदल जाएंगे क्योंकि स्किल्स जल्दी सीख ली जाएंगी.

लेकिन जनरल मैनेजमेंट प्रोग्राम अभी भी स्थिर रूप से चल रहे हैं, खासकर उन लोगों के लिए जो अपने ही सेक्टर में बेहतर लीडर बनना चाहते हैं, न कि पूरी तरह बदलना चाहते हैं.

तोमर की काम करने की शैली भी बदल गई है. अब वह पहले से ज्यादा सहयोगात्मक तरीके से काम करते हैं, खासकर युवा टीम के साथ.

50 साल की उम्र में यह कोर्स उनके लिए निवेश और खुद को फिर से तैयार करने जैसा है. उन्होंने कहा, “मैं इस समय खुद पर निवेश कर रहा हूं, इसलिए मुझे इसका फायदा उठाना होगा. चाहे अपनी कंपनी में या कहीं और. इस कोर्स से मैं खुद को ब्रांड कर रहा हूं.”

उन्होंने कहा कि आज के समय में अपडेट रहना सिर्फ काम के लिए नहीं, बल्कि सम्मान और प्रासंगिकता के लिए भी जरूरी है.

Subnesh Singh Tomar and his class at IIM Lucknow | special arrangement
सुबनेश सिंह तोमर और IIM लखनऊ में उनकी क्लास | विशेष व्यवस्था

एक पुराना विचार, नए तरीके से पेश किया गया

आम तौर पर ये कोर्स तीन तरह के होते हैं. पहले हैं एक साल के एग्जीक्यूटिव एमबीए जैसे पीजीपीएक्स या ईपीजीपी, जो कामकाजी लोगों के लिए फुल टाइम एमबीए का विकल्प होते हैं. दूसरे हैं लंबे एग्जीक्यूटिव डिप्लोमा और जनरल मैनेजमेंट प्रोग्राम, जो कई महीनों से एक साल तक चलते हैं. तीसरे हैं मैनेजमेंट डेवलपमेंट प्रोग्राम, जो कुछ दिनों से लेकर दो महीने तक के छोटे कोर्स होते हैं और किसी खास स्किल पर फोकस करते हैं.

एजुकेशन एक्सपर्ट महेश्वर पेरी, जो Careers360 के संस्थापक हैं, कहते हैं कि यह कोई नया ट्रेंड नहीं है, बल्कि पुराने अपस्किलिंग का नया रूप है. उन्होंने कहा कि पहले यह ट्रेनिंग नौकरी के अंदर ही होती थी, अब इसे अलग कोर्स के रूप में बेचा जा रहा है.

आईआईएम अहमदाबाद के प्रोफेसर अमित कर्णा ने कहा कि एग्जीक्यूटिव एजुकेशन आईआईएम के एमबीए से भी पहले से चल रही है. 1961 में जब आईआईएम अहमदाबाद शुरू हुआ था, तो पहले तीन साल सिर्फ एग्जीक्यूटिव एजुकेशन ही होती थी. एमबीए कोर्स 1964 में शुरू हुआ था.

अब जरूरत और तेज हो गई है क्योंकि काम की दुनिया तेजी से बदल रही है. नई टेक्नोलॉजी सीखना जरूरी हो गया है. टेक्नोलॉजी ने इसे आसान बना दिया है और ज्यादा लोग इसमें शामिल हो रहे हैं.

उन्होंने कहा कि यह ट्रेंड अब सिर्फ सीनियर लोगों तक सीमित नहीं है, बल्कि मिड और जूनियर लेवल के कर्मचारी भी इसमें शामिल हो रहे हैं.

लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि एग्जीक्यूटिव कोर्स से पूरा करियर नहीं बदलता, बल्कि मौजूदा करियर को बेहतर बनाया जाता है.

करियर बदलना

समृद्धि सिंह ने 23 साल की उम्र में पत्रकारिता छोड़ने का फैसला किया. वह इंडियन एक्सप्रेस में ट्रेनी सबएडिटर थीं और एक आर्टिसनल साड़ियों का ब्रांड शुरू करना चाहती थीं.

इसी दौरान उन्हें इंस्टाग्राम पर आईआईएम अहमदाबाद के एक एग्जीक्यूटिव प्रोग्राम का विज्ञापन मिला.

कुछ महीनों बाद वह लगभग 30 लोगों के समूह में शामिल हुईं, जिसमें आर्किटेक्ट, फैशन डिजाइनर, ग्राफिक डिजाइनर और बिजनेस करने वाले लोग थे. यह क्रिएटिव और कल्चरल बिजनेस प्रोग्राम था, जो क्रिएटिव एंटरप्रेन्योरशिप पर आधारित था.

उन्होंने कहा कि आईआईएम ने उन्हें उस जगह तक पहुंचाया, जहां वह पहले नहीं पहुंच सकती थीं.

उनका ब्रांड “Soz” अभी बन रहा है, लेकिन इस कोर्स ने उन्हें दिशा दी और क्रिएटिव आइडिया को बिजनेस में बदलने की सोच दी. यह 15 दिन का कोर्स है, जो 6 महीने में पूरा होता है, जिसमें तीन कैंपस मॉड्यूल और असाइनमेंट होते हैं. इसकी फीस 5.6 लाख रुपये है.

इस कोर्स में कम लेकिन अलग-अलग अनुभव वाले लोग होते हैं, जिनमें कई पहले से बिजनेस चला रहे होते हैं. पत्रकारिता छोड़ने के बाद यह अनुभव उनके लिए रोमांचक भी था और चुनौतीपूर्ण भी.

Samridhi Singh with her showcase of her brand Soz, the idea that led her to shift careers | Special arrangement
समृद्धि सिंह अपने ब्रांड ‘सोज़’ के प्रदर्शन के साथ—वही विचार जिसने उन्हें अपना करियर बदलने के लिए प्रेरित किया | विशेष व्यवस्था

उन्होंने कहा कि यह असहजता भी सीखने का हिस्सा थी.

केस डिस्कशन और फैकल्टी के साथ बातचीत ने उन्हें क्रिएटिव काम के बिजनेस पहलू को समझने में मदद की.

यह कोर्स ग्रेड आधारित नहीं है, बल्कि लोग अपने आइडिया को धीरे-धीरे विकसित करते हैं और अंत में एक प्रेजेंटेशन देते हैं.

तोमर जहां अपने ही फील्ड में आगे बढ़ना चाहते हैं, वहीं समृद्धि सिंह ने नया काम शुरू करने के लिए यह कोर्स किया.

उन्होंने माना कि आईआईएम का नाम आकर्षक है, लेकिन सिर्फ नाम के लिए कोर्स नहीं करना चाहिए. उन्होंने कहा कि यह बहुत महंगा कोर्स है और इससे क्या मिलेगा, यह पहले समझना जरूरी है.

समृद्धि के लिए यह कोर्स तुरंत प्रोडक्ट नहीं बना पाया, लेकिन इसने उनके आइडिया को आकार जरूर दिया.

Class of Creative and Cultural Businesses Programme at IIM Ahmedabad | special arrangement
आईआईएम अहमदाबाद में क्रिएटिव और कल्चरल बिज़नेस प्रोग्राम की क्लास | विशेष व्यवस्था

ये प्रोग्राम कैसे काम करते हैं

पारंपरिक डिग्रियों के मुकाबले ये एग्जीक्यूटिव प्रोग्राम तेज और ज्यादा फ्लेक्सिबल होते हैं. प्रोफेसर कर्णा ने कहा कि ये “एक्सप्रेस फॉर्मेट” जैसे होते हैं, जो कुछ दिनों से लेकर कई महीनों तक चलते हैं. इनमें ब्लेंडेड फॉर्मेट होता है, जिसमें पार्टिसिपेंट्स कुछ छोटे-छोटे इमर्सिव मॉड्यूल के लिए कैंपस आते हैं और बाकी पढ़ाई ऑनलाइन करते हैं. इसका फायदा यह है कि प्रोफेशनल लोग नौकरी छोड़े बिना अपने ऊपर निवेश कर सकते हैं.

इन क्लासरूम में अलग-अलग अनुभव और बैकग्राउंड के लोग होते हैं. पहले आईआईएम ज्यादातर सीनियर एग्जीक्यूटिव्स के लिए थे, लेकिन अब इसमें मिड लेवल मैनेजर और शुरुआती करियर वाले लोग भी शामिल होते हैं, जो अपने स्किल्स बढ़ाना चाहते हैं. कई लोग जनरल मैनेजमेंट या लीडरशिप रोल की तरफ जा रहे होते हैं.

कई मामलों में यह कोर्स खुद व्यक्ति नहीं बल्कि उनकी कंपनी स्पॉन्सर करती है. कंपनियां इसे अपने अंदरूनी ट्रेनिंग और लीडरशिप डेवलपमेंट के लिए इस्तेमाल कर रही हैं. कुछ लोग इसे खुद के पैसे से करते हैं, अपने करियर में ग्रोथ के लिए.

आईआईएम के अलावा भी बड़ा बाजार

सिर्फ आईआईएम ही नहीं, बल्कि कई प्राइवेट संस्थान भी इस मांग को पूरा कर रहे हैं. मुंबई का नरसी मोनजी इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज यानी NMIMS, एसपी जैन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड रिसर्च और हैदराबाद और मोहाली का इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस भी एग्जीक्यूटिव एजुकेशन और एग्जीक्यूटिव एमबीए कोर्स चला रहे हैं.

33 साल के सुबंकर चंदा, जो एलियांज पार्टनर्स में असिस्टेंट जनरल मैनेजर हैं, ने 2021 में NMIMS का 15 महीने का एग्जीक्यूटिव एमबीए किया. उन्होंने यह इसलिए किया क्योंकि महामारी के दौरान फुल टाइम एमबीए की वैल्यू को लेकर अनिश्चितता थी.

एग्जीक्यूटिव कोर्स ने उन्हें नौकरी जारी रखते हुए पढ़ाई करने का मौका दिया और लागत भी कम रही. जहां फुल टाइम एमबीए की फीस 30 से 35 लाख रुपये तक होती है, वहीं एग्जीक्यूटिव कोर्स आमतौर पर 7 से 14 लाख रुपये के बीच होते हैं.

उन्होंने बड़ा लोन लेने के बजाय भविष्य में बिजनेस के लिए पैसे बचाए. उनके अनुसार इसमें कैंपस एक्सपीरियंस की जगह फ्लेक्सिबिलिटी और अफोर्डेबिलिटी थी.

यह प्रोग्राम ज्यादातर ऑनलाइन था, लेकिन लाइव सेशन और एलुमनी नेटवर्क के जरिए पीयर इंटरैक्शन भी मिला. उन्होंने कहा कि सबसे बड़ी ताकत यही नेटवर्क था.

उन्होंने कहा कि उनके बैच में स्टार्टअप लोग, सीनियर एग्जीक्यूटिव्स और यहां तक कि डायरेक्टर लेवल के लोग भी थे. इस तरह की पीयर लर्निंग बहुत मदद करती है.

लेकिन इसमें यह गारंटी नहीं होती कि कोर्स के बाद नौकरी मिल ही जाएगी. उदाहरण के लिए NMIMS प्लेसमेंट नहीं देता, जो कुछ आईआईएम कोर्स से अलग है.

फिर भी डिग्री का ब्रांड वैल्यू फायदा देता है. चंदा को कोर्स के बाद 20 से 25 प्रतिशत सैलरी बढ़ोतरी मिली और बाद में नौकरी बदलने पर लगभग 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई. उनके कुछ साथियों को 70 से 80 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी भी मिली.

लेकिन उन्होंने कहा कि फुल टाइम एमबीए जैसा गहरा कैंपस एक्सपीरियंस इसमें नहीं मिलता. अगर मौका मिले तो वह फुल टाइम एमबीए ही चुनेंगे क्योंकि उसमें ज्यादा गहराई और नेटवर्क मिलता है.

इसलिए एग्जीक्यूटिव प्रोग्राम एक बीच का रास्ता हैं. यह उन लोगों के लिए अच्छा विकल्प है जो नौकरी नहीं छोड़ सकते या जिनके पास समय और पैसे की कमी है, लेकिन यह फुल टाइम एमबीए का पूरा विकल्प नहीं है.

क्या ये सच में करियर बदलते हैं

महेश्वर पेरी के अनुसार एग्जीक्यूटिव एजुकेशन हमेशा फायदेमंद होती है क्योंकि यह दिखाती है कि उम्मीदवार गंभीर है.

उन्होंने कहा कि यह दिखाता है कि आप अपने करियर को लेकर गंभीर हैं, खुद को अपस्किल कर रहे हैं और आगे बढ़ने के लिए मेहनत कर रहे हैं. यह सिग्नल एम्प्लॉयर और साथियों दोनों के लिए महत्वपूर्ण होता है.

लेकिन ऐसे प्रोग्राम आमतौर पर अनुभव की जगह नहीं लेते और करियर को पूरी तरह बदलते नहीं हैं.

पेरी ने कहा कि जब लोग दूसरी इंडस्ट्री में जाते हैं, तो कंपनियां डिग्री नहीं बल्कि काम और पोर्टफोलियो देखती हैं.

जो लोग बड़ा करियर बदलाव चाहते हैं, उनके लिए फुल टाइम एमबीए बेहतर होता है. एग्जीक्यूटिव एजुकेशन धीरे-धीरे स्किल सुधारने और मौजूदा करियर में बेहतर बनने में मदद करती है.

इसके रिटर्न हमेशा समान नहीं होते. हर महंगा कोर्स फायदा नहीं देता. लेकिन कुछ खास क्षेत्रों जैसे एल्गोरिदमिक ट्रेडिंग या नई टेक्नोलॉजी में अपडेट रहना बहुत जरूरी है, वरना लोग पीछे रह जाते हैं.

जैसे-जैसे यह बाजार बढ़ रहा है, वैसे-वैसे “क्रेडेंशियल कलेक्शन” यानी बहुत सारे सर्टिफिकेट इकट्ठा करने की प्रवृत्ति भी बढ़ रही है. लेकिन पेरी के अनुसार कंपनियां आसानी से धोखा नहीं खातीं. अंत में सर्टिफिकेट दरवाजा खोल सकता है, लेकिन असली काम यह तय करता है कि आप कितनी दूर जाएंगे.

बड़ा और बढ़ता हुआ रेवेन्यू स्ट्रीम

पढ़ाने के अलावा, एग्जीक्यूटिव एजुकेशन आईआईएम जैसे संस्थानों के लिए बड़ा आर्थिक स्रोत बन गया है. प्रोफेसर कर्णा ने कहा कि आईआईएम अहमदाबाद में हर साल लगभग 100 से 120 ओपन प्रोग्राम चलते हैं. इसके अलावा लगभग 200 कस्टमाइज्ड प्रोग्राम कंपनियों के लिए बनाए जाते हैं.

हर साल लगभग 5,000 से 7,000 लोग इनमें हिस्सा लेते हैं. ब्लेंडेड कोर्स, जिसमें ऑनलाइन और क्लासरूम दोनों होते हैं, अकेले 1,200 से ज्यादा लोगों तक पहुंचते हैं.

कस्टमाइज्ड प्रोग्राम तेजी से बढ़ रहे हैं क्योंकि कंपनियां अपने कर्मचारियों को ट्रेनिंग देना चाहती हैं. इसमें लीडरशिप, स्ट्रैटेजी और लॉन्ग टर्म लर्निंग प्रोग्राम शामिल होते हैं.

इससे आईआईएम जैसे संस्थानों को लगातार और बड़ा रेवेन्यू मिलता है, जो कई बार उनके मुख्य डिग्री कोर्स के बराबर या उससे ज्यादा होता है. कुछ कोर्स की फीस 9 लाख रुपये तक होती है.

आईआईएम अहमदाबाद में 2019-20 में एग्जीक्यूटिव एजुकेशन से 10,257.71 लाख रुपये की आय हुई, जो कुल अकादमिक आय का 39.97 प्रतिशत थी.

अगले पांच साल में यह हिस्सेदारी बढ़ी और 2023-24 में यह बढ़कर 49.20 प्रतिशत हो गई. यह सिर्फ पांच साल में 9.23 प्रतिशत की बढ़ोतरी है.

यह सिर्फ एक संस्थान की बात नहीं है. महेश्वर पेरी के अनुसार टॉप आईआईएम में सिर्फ 35 प्रतिशत रेवेन्यू एमबीए फीस से आता है. बाकी एग्जीक्यूटिव प्रोग्राम से आता है.

क्या पढ़ाया जाता है और आगे क्या होता है

जैसे-जैसे यह क्षेत्र बढ़ रहा है, क्वालिटी बनाए रखना जरूरी हो गया है. आईआईएम अहमदाबाद में प्रोफेसर कर्णा ने कहा कि इसके लिए लगातार रिव्यू और इंडस्ट्री से बातचीत होती रहती है. कोर्स अपडेट किए जाते हैं और फैकल्टी भी कंसल्टिंग करती है ताकि पढ़ाई प्रैक्टिकल बनी रहे.

फैकल्टी लगातार मार्केट, एलुमनी और इंडस्ट्री से जुड़ी रहती है, जिससे कोर्स अपडेट रहते हैं.

अब कोर्स नई टेक्नोलॉजी जैसे एआई, डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन, एंटरप्रेन्योरशिप और नए बिजनेस मॉडल पर ज्यादा फोकस कर रहे हैं.

साथ ही अब अलग-अलग तरह के स्पेशल कोर्स भी बन रहे हैं, जैसे क्रिएटिव इंडस्ट्री, डिजाइन थिंकिंग और फैमिली बिजनेस के लिए खास प्रोग्राम.

आखिर में चुनौती यह है कि ये कोर्स कितने प्रासंगिक रहते हैं. जैसे-जैसे इंडस्ट्री बदलती है, वैसे-वैसे नए स्किल्स की जरूरत बढ़ती है.

और कई मिड-करियर प्रोफेशनल्स के लिए ये प्रोग्राम खुद को अपडेट रखने और आगे बने रहने का तरीका बनते जा रहे हैं.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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