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Friday, 24 April, 2026
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आसान इंस्टॉलेशन और ISI कनेक्शन: चीन के सोलर CCTV कैमरे कैसे बनें पुलिस के लिए बड़ी चुनौती

उत्तरी भारत में जासूसी के दो कथित मॉड्यूल में पाकिस्तान स्थित हैंडलरों और चीनी सोलर CCTV कैमरों के बीच एक साझा कड़ी सामने आने के बाद, पुलिस को क्लोज्ड-सर्किट सुरक्षा से जुड़ी एक बिल्कुल नई और भयानक चुनौती का सामना करना पड़ रहा है.

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नई दिल्ली: पुलिस के सामने एक बड़ी समस्या है, और यह चीन से जुड़ी है. सोलर से चलने वाले चीनी सीसीटीवी कैमरों का हाल के समय में पाकिस्तान की आईएसआई द्वारा कथित जासूसी में इस्तेमाल किया गया है.

ये चीनी सोलर सीसीटीवी कैमरे सामान्य तार वाले या बिजली से चलने वाले कैमरों से अलग होते हैं. इनका फर्क इनके पावर सोर्स, लगाने के तरीके और 4जी कनेक्टिविटी में होता है, जिससे ये दूर-दराज या बिना बिजली वाले इलाकों में निगरानी के लिए आसान हो जाते हैं.

जहां पारंपरिक कैमरों को लगातार बिजली की जरूरत होती है, वहीं ये सोलर कैमरे सोलर पैनल और बैटरी से चलते हैं. इनमें 4जी सिम कार्ड का इस्तेमाल होता है, जिससे ये वाई-फाई या ईथरनेट के बिना इंटरनेट से जुड़ जाते हैं.

ऐसे चीनी सीसीटीवी कैमरों का इस्तेमाल कथित तौर पर दो मॉड्यूल में किया गया, जिन्हें आईएसआई का समर्थन बताया जा रहा है, और एक में प्रतिबंधित आतंकी संगठन बब्बर खालसा इंटरनेशनल का नाम सामने आया. गाजियाबाद और दिल्ली पुलिस ने जांच में 32 लोगों को पकड़ा, जिनमें नाबालिग भी शामिल हैं.

A solar-based China-made CCTV camera seized by Delhi Police after they busted a module | By special arrangement
दिल्ली पुलिस द्वारा एक मॉड्यूल का भंडाफोड़ करने के बाद ज़ब्त किया गया चीन निर्मित सौर-ऊर्जा संचालित CCTV कैमरा | विशेष व्यवस्था

लेकिन समस्या अभी भी बनी हुई है, क्योंकि ये कैमरे ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों जगह आसानी से मिल रहे हैं.

इन कैमरों को अब पुलिस के लिए बड़ा सुरक्षा खतरा माना जा रहा है, क्योंकि इनमें बिना अनुमति दूर से एक्सेस किया जा सकता है और कई मामलों में लाइव वीडियो जैसे डेटा चीन के सर्वर तक भेजा जाता है. इसी वजह से दिल्ली जैसे राज्य भी इन पर कार्रवाई कर रहे हैं.

यह कथित जासूसी मामला पहली बार 14 मार्च को गाजियाबाद पुलिस के सामने आया, जब कौशांबी थाने में तैनात एक बीट अधिकारी को भोवापुर के कुछ लोगों के संदिग्ध गतिविधियों की जानकारी मिली.

जांच कर रहे एक अधिकारी ने बताया कि ये लोग रेलवे स्टेशनों और सुरक्षा बलों से जुड़े स्थानों के वीडियो बना रहे थे और उन्हें कुछ खास लोगों को भेज रहे थे. साथ ही वे पैसों का लालच देकर युवाओं को इसमें शामिल कर रहे थे.

खर्च और सुविधा

ये चीनी सीसीटीवी कैमरे आमतौर पर 5 मेगापिक्सल के होते हैं और करीब आधा किलो वजन के होते हैं. ई-कॉमर्स वेबसाइट पर इनके फीचर्स में वेदरप्रूफ, नाइट विजन, मोशन डिटेक्शन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और फेस रिकग्निशन जैसी सुविधाएं बताई जाती हैं. पुलिस के अनुसार इनकी क्वालिटी सस्ती होती है और ये ज्यादातर असेंबल किए जाते हैं.

इसके मुकाबले भारतीय ब्रांड के कैमरे ज्यादा सुरक्षित होते हैं. इनमें साइबर सुरक्षा मानक, बेहतर प्राइवेसी, वारंटी और मजबूत निर्माण होता है. भारतीय कैमरों में वीडियो डेटा एन्क्रिप्टेड रहता है और सुरक्षित रहता है. साथ ही इन्हें एसटीक्यूसी मानकों का पालन करना होता है, जिससे इनकी सुरक्षा जांच होती है.

Infographic by Deepakshi Sharma | ThePrint
इन्फ़ोग्राफ़िक: दीपाक्षी शर्मा | दिप्रिंट

अमेजन जैसी वेबसाइटों पर ये कैमरे ड्यूल लेंस, ड्यूल स्क्रीन और 180 डिग्री कवरेज का दावा करते हैं. कंपनियां कहती हैं कि ये वाटरप्रूफ और डस्टप्रूफ हैं और बारिश, गर्मी और धूल में भी काम करते हैं. कुछ कैमरों में 10 मीटर तक कलर नाइट विजन भी बताया जाता है.

इनमें स्मार्ट ह्यूमन डिटेक्शन होता है, जो मोबाइल पर तुरंत नोटिफिकेशन भेजता है. साथ ही इनमें माइक्रोफोन और स्पीकर भी होता है, जिससे ऐप के जरिए बात भी की जा सकती है.

लेकिन ये कैमरे आमतौर पर दो या तीन महीने में काम करना बंद कर देते हैं.

दिल्ली पुलिस के अनुसार, इस तरह के सोलर चीनी कैमरों का इस्तेमाल पिछले तीन-चार महीनों में ज्यादा बढ़ा है.

गाजियाबाद के एक अधिकारी ने बताया कि सीमा पार बैठे आईएसआई से जुड़े लोग इन कैमरों के इस्तेमाल का निर्देश देते थे, क्योंकि ये आसानी से मिल जाते हैं, सस्ते हैं, बिजली की जरूरत नहीं होती, सिम कार्ड और सोलर पैनल के साथ आते हैं और पहचान करना मुश्किल होता है.

उन्होंने कहा कि इससे वे मोबाइल ऐप के जरिए रियल टाइम निगरानी कर सकते थे, जो गूगल प्ले स्टोर से डाउनलोड किए जा सकते हैं.

दिल्ली मामले की जांच कर रहे एक अधिकारी ने बताया कि हैंडलर गूगल मैप्स का इस्तेमाल करते थे और अपने लोगों को बताते थे कि कैमरा कहां लगाना है. अगर कोई पूछे तो उन्हें नगर निगम या राजस्व विभाग का कर्मचारी बताने को कहा जाता था. इस तरह वे बच निकलते थे.

पुलिस के अनुसार आरोपियों ने उस कमी का फायदा उठाया, जहां सरकारी एजेंसियां, रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन और पुलिस खुद सीसीटीवी लगाने पर ध्यान दे रहे थे. इससे बाजार में सस्ते चीनी कैमरों की बिक्री बढ़ गई.

4जी वाले सोलर कैमरे अमेजन पर 2,000 से 9,000 रुपये तक में मिल रहे हैं. ये वायरलेस होते हैं, इनमें दो-तरफा ऑडियो होता है और 8000 एमएएच की बैटरी होती है.

ये कैमरे दिल्ली के नेहरू प्लेस और भागीरथ पैलेस जैसे बाजारों में भी आसानी से मिल जाते हैं.

सिस्टम बनाना जरूरी

साइबर सिक्योरिटी एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष प्रोफेसर एन.के. गोयल, जिन्होंने टेलीकॉम सेक्टर में 55 साल काम किया है, ने कहा कि चीन के सोलर पावर वाले कैमरे, जो आमतौर पर वायरलेस या 4जी कैमरे होते हैं और सोलर पैनल के साथ आते हैं, दुनिया और भारत में तेजी से इस्तेमाल हो रहे हैं.

इनकी वजह है आसान इंस्टॉलेशन, कम मेंटेनेंस, वायरिंग की जरूरत नहीं और दूर-दराज के इलाकों जैसे खेत, निर्माण स्थल, बॉर्डर या गांव के घरों में इस्तेमाल के लिए सही होना.

इनका इस्तेमाल घर, खेती और छोटे बिजनेस की निगरानी के लिए किया जाता है. उन्होंने कहा कि गाजियाबाद मामले में पहली बार ऐसे सोलर और सिम वाले कैमरे संवेदनशील जगहों पर लगाए गए हैं.

उन्होंने कहा कि एक सिस्टम होना चाहिए, जिसमें सार्वजनिक जगहों पर लगे सीसीटीवी को किसी एजेंसी के साथ रजिस्टर किया जाए, जिसमें मालिक का नाम, जानकारी और इस्तेमाल का उद्देश्य दर्ज हो.

उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि सरकार को देशभर में बिना पहचान वाले सीसीटीवी खोजकर हटाने का आदेश देना चाहिए. संवेदनशील जगहों पर लगे कैमरों का तुरंत सुरक्षा ऑडिट होना चाहिए और जरूरत पड़े तो उन्हें बदला जाए. साथ ही यह सुनिश्चित किया जाए कि इस्तेमाल हो रहे कैमरे एसटीक्यूसी, बीआईएस या इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय द्वारा प्रमाणित हों.

गाजियाबाद पुलिस की स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम के एक अधिकारी ने कहा कि आरोपियों ने सोलर और सिम वाले कैमरे इस्तेमाल किए. सिम के जरिए इनका वीडियो कहीं भी देखा जा सकता है.

उन्होंने कहा कि ये कैमरे पहले से बाजार में थे, लेकिन जासूसी के लिए इस्तेमाल नहीं हो रहे थे. आमतौर पर लोग तार वाले और नेटवर्क से जुड़े कैमरे लगाते हैं, जो डिजिटल रिकॉर्डर से जुड़े होते हैं.

पुलिस ने कहा कि इन कैमरों के डेटा सर्वर चीन में हैं और वहां से भी वीडियो देखा जा सकता है. मोबाइल ऐप के जरिए पाकिस्तान में बैठे लोग आसानी से संवेदनशील जगहों का फुटेज देख रहे थे. यह जानकारी बाद में व्हाट्सएप पर शेयर की जाती थी.

दिल्ली और गाजियाबाद पुलिस ने कहा कि अब सीसीटीवी का ऑडिट किया जा रहा है.

Solar-based cameras using 4G are readily available on e-commerce websites for Rs 2,000-9,000 | By special arrangement
4G पर आधारित सोलर कैमरे ई-कॉमर्स वेबसाइटों पर 2,000 से 9,000 रुपये की कीमत में आसानी से उपलब्ध हैं | विशेष व्यवस्था

संवेदनशील जगहों की रिकॉर्डिंग

जांच में पता चला कि पकड़े गए लोगों को करीब 16,000 से 17,000 रुपये दिए गए. आमतौर पर एक कैमरा लगाने के लिए 6,000 से 7,000 रुपये मिलते हैं. इस पूरे नेटवर्क में भारत में भी कुछ लोग जुड़े थे.

सेना के ठिकानों, भारतीय वायुसेना स्टेशन, बीएसएफ कैंप और रेलवे स्टेशनों जैसी संवेदनशील जगहों के वीडियो व्हाट्सएप पर भेजे जा रहे थे.

यह नेटवर्क जल्दी पैसे कमाने की चाह रखने वाले लोगों पर आधारित था. जांच अधिकारी राज करण नैयर ने बताया कि आरोपी इंस्टाग्राम पर ऐसे युवाओं को ढूंढते थे, जिनके पास मोबाइल रिपेयर, कंप्यूटर या सीसीटीवी से जुड़ी तकनीकी जानकारी हो और जिन्हें पैसों की जरूरत हो.

इन लोगों को ऐसे ऐप इस्तेमाल करना सिखाया जाता था, जो फोटो पर जीपीएस लोकेशन और समय अपने आप जोड़ देते हैं.

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल को भी सूचना मिली थी कि कुछ लोग सोलर सीसीटीवी कैमरे लगा रहे हैं. कपूरथला, जालंधर, पठानकोट, पटियाला, मोगा, अंबाला, कठुआ, बीकानेर और अलवर में कुल 9 कैमरे लगाए गए थे.

इन कैमरों का वीडियो मोबाइल ऐप के जरिए पाकिस्तान में बैठे लोगों तक भेजा जा रहा था, यह जानकारी स्पेशल सेल के अधिकारी पी.एस. कुशवाह ने दी.

कुशवाह ने कहा कि पुख्ता जानकारी मिली थी कि प्रतिबंधित संगठन बब्बर खालसा इंटरनेशनल के विदेशी हैंडलर, पाकिस्तान के गैंगस्टर और आईएसआई के साथ मिलकर दिल्ली और पंजाब में आतंकी गतिविधियों की साजिश कर रहे हैं.

उन्होंने कहा कि यह नेटवर्क युवाओं को कट्टर बना रहा है, उन्हें भर्ती कर रहा है और हथियारों की तस्करी भी कर रहा है.

दिल्ली की कार्रवाई

दिल्ली सरकार इस समस्या से निपटने की योजना बना रही है, जो पहले गाजियाबाद में सामने आई थी. 1 अप्रैल को पीडब्ल्यूडी मंत्री प्रवेश वर्मा ने कहा कि शहर में लगे चीनी सीसीटीवी कैमरों को चरणबद्ध तरीके से हटाया जाएगा.

पीडब्ल्यूडी के अनुसार दिल्ली में कुल 2,74,389 कैमरे लगाए गए हैं. इनमें पहले चरण में 1,40,000 कैमरे सितंबर 2020 से नवंबर 2022 के बीच लगे और दूसरे चरण में 1,34,388 कैमरे जून 2025 से मार्च 2026 के बीच लगाए गए.

वर्मा ने कहा कि पहले चरण के सभी 1,40,000 कैमरे चीनी कंपनी हिकविजन के हैं, जिन पर सुरक्षा को लेकर वैश्विक चिंता जताई गई है.

उन्होंने कहा कि निगरानी सिस्टम सिर्फ दिखावे की चीज नहीं है, बल्कि संवेदनशील डेटा की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मामला है.

उन्होंने कहा कि पूरे शहर में ऐसी तकनीक लगाना राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा फैसला है. इसलिए ऐसे कैमरों को हटाकर उनकी जगह सुरक्षित और आधुनिक सिस्टम लगाए जाएंगे, जिनमें बेहतर डेटा सुरक्षा होगी.

उन्होंने बताया कि यह प्रक्रिया चरणों में होगी, ताकि निगरानी सिस्टम पर कोई असर न पड़े. पहले चरण में 50,000 कैमरे बदलने की मंजूरी दी गई है.

उन्होंने कहा कि यह काम धीरे-धीरे होगा, ताकि सिस्टम चलता रहे और साथ ही ज्यादा सुरक्षित भी बने.

फरवरी में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सेफ सिटी प्रोजेक्ट के पहले चरण का उद्घाटन किया था, जिसकी लागत करीब 857 करोड़ रुपये है. इसमें दिल्ली को 10,000 कैमरों से जोड़ने की योजना का पहला चरण शामिल है.

करीब 2,000 कैमरे चालू हो चुके हैं और 15,000 से ज्यादा पुराने कैमरों को सिस्टम से जोड़ने का काम पूरा हो गया है.

दिल्ली पुलिस के पास सेफ सिटी प्रोजेक्ट के तहत करीब 2,100 हाई-टेक कैमरे हैं. कुल मिलाकर दिल्ली पुलिस करीब 19,000 एआई आधारित कैमरे चला रही है.

इसके अलावा दिल्ली सरकार ने 2.5 लाख से ज्यादा कैमरे लगाए हैं और कई कैमरे रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन और मार्केट एसोसिएशन ने लगाए हैं.

MeitY की एंट्री

इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी राज्य मंत्री जितिन प्रसाद ने मार्च में लोकसभा में कहा कि सरकार डिजिटल तकनीक से जुड़े साइबर सुरक्षा खतरों को लेकर सतर्क है.

सरकार ने सीसीटीवी सिस्टम की सुरक्षा बढ़ाने के लिए कई सुधार किए हैं और बाजार में बिकने वाले कैमरों के लिए जरूरी सुरक्षा नियम तय किए हैं.

उन्होंने कहा कि हार्डवेयर सुरक्षा के लिए अब जरूरी है कि सिस्टम में इस्तेमाल होने वाले अहम पार्ट्स जैसे चिप का स्रोत साफ बताया जाए.

डिवाइस की जांच की जाएगी कि कहीं उसमें ऐसी कमजोरी तो नहीं जिससे कोई दूर से एक्सेस कर सके. अब सभी डिवाइस को मान्यता प्राप्त लैब में टेस्ट करना जरूरी है.

उन्होंने बताया कि अभी तक 507 मॉडल के सीसीटीवी कैमरे प्रमाणित किए जा चुके हैं. सरकारी विभागों को ऐसे कैमरे खरीदने से रोका गया है जो इन नियमों पर खरे नहीं उतरते.

सरकार ने आईटी एक्ट की धारा 69ए के तहत डेटा सुरक्षा से जुड़े मामलों में 652 मोबाइल ऐप भी ब्लॉक किए हैं.

साथ ही नेशनल साइबर कोऑर्डिनेशन सेंटर, जिसे सीईआरटी-इन चलाता है, ने संबंधित एजेंसियों और राज्य सरकारों को जानकारी देकर कार्रवाई करने को कहा है.

सीईआरटी-इन ने 237 सुरक्षा ऑडिट करने वाली संस्थाओं को भी शामिल किया है, जो इस काम में मदद करेंगी.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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