नई दिल्ली: छुट्टी पर अपनी पत्नी और तीन साल के बेटे के साथ जाने से कुछ दिन पहले, भारत भूषण की बुजुर्ग मां घबराई हुई थीं. उन्हें बेचैनी हो रही थी. उन्होंने उसे बैठाकर भारी मन से पूछा, “तुम कहीं और क्यों नहीं जा सकते? कहीं, जहां सुरक्षित हो.”
भारत ने हंसकर बात टाल दी. “भारत बदल गया है. कश्मीर भारत का स्विट्जरलैंड है. चिंता मत करो.”
उस बातचीत को एक साल बीत चुका है. उस बुजुर्ग मां ने तब से अपने बेटे से बात नहीं की. अब कभी नहीं कर पाएंगी.
“प्रीतम, भारत को माथे पर तीन बार गोली मारी गई… मैंने अपनी आंखों से देखा. वो आतंकवादी थे,” भारत के बड़े भाई को सुजाता, भारत की पत्नी, ने 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम से घबराकर फोन पर बताया.
“जब आतंकवादियों ने उसके सिर पर बंदूक रखी, तो भारत बस इतना कह सका—कृपया हमें छोड़ दो, यह छोटा बच्चा है,” बाद में सुजाता ने प्रीतम को बताया. बाइसारन घाटी में 25-30 मिनट की इस हिंसा के खत्म होने तक 26 जिंदगियाँ खत्म हो चुकी थीं.
आतंकवादियों ने 25 भारतीयों—24 पर्यटकों और एक कश्मीरी स्थानीय—और एक नेपाली पर्यटक को मार दिया, और फिर आसपास के जंगलों में भाग गए. प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, लोगों को उनके धर्म के आधार पर चुना गया और उनके परिवारों के सामने करीब से गोली मारी गई.

लश्कर-ए-तैयबा (LeT) के एक गुट द रेजिस्टेंस फ्रंट (TRF) ने इस हमले की जिम्मेदारी ली, लेकिन बाद में इसे वापस ले लिया. प्रधानमंत्री मोदी की अध्यक्षता में कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी ने अगले दिन बैठक की और बयान में कहा कि हमले के “सीमा पार संबंध” सामने आए हैं. भारत ने इसके जवाब में ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया, जिसमें सीमा पार आतंकियों और उनके ठिकानों पर सटीक सैन्य हमले किए गए.
प्रीतम के लिए, उस दिन आया फोन उनकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल गया. घबराहट के बाद सच्चाई सामने आई, और पहलगाम में जो हुआ उसके टुकड़े सामने आने लगे. एक साल बाद भी वो पल परिवार के लिए वहीं रुके हुए हैं. वे भारत को याद करते हैं और उसके बिना “नकली सामान्य जिंदगी” जी रहे हैं.
आखिरी छुट्टी
कश्मीर भारत का सपना था. “वह हमेशा कश्मीर जाना चाहता था,” प्रीतम ने बताया.
भारत 18 अप्रैल 2025 को कश्मीर के लिए निकला. उसने फ्लाइट से मुस्कुराते हुए अपनी सेल्फी परिवार को भेजी. “यहां बहुत खूबसूरत है. अगली बार तुम भी अपने परिवार को लेकर आना…” प्रीतम ने 20 अप्रैल की उनकी फोन पर हुई बात याद की.
पहलगाम उनका आखिरी ठिकाना था. वे घोड़े पर बैठकर बाइसारन घाटी पहुंचे. दिन बहुत सुंदर था. धूप खिली हुई थी. उन्होंने कश्मीरी कपड़े पहने, फोटो खिंचवाई और अपने बेटे के साथ खेले.
फिर अचानक उन्होंने गोलियों की आवाज सुनी.
हमला दोपहर 2:30 बजे के बाद शुरू हुआ. बंदूकधारी लोग जंगल से निकलकर मैदान में आए और लोगों पर गोली चलाने लगे. पर्यटक और स्थानीय लोग भागे, लेकिन छिपने की कोई जगह नहीं थी. वे खुले मैदान में फंस गए थे.
कुछ लोग टेंट के पीछे छिपे. भारत भी अपनी पत्नी और बेटे के साथ एक टेंट के पीछे छिपा. वे सब कुछ देख रहे थे. पुरुषों को अलग किया गया, उनसे धर्म पूछा गया, और पास से गोली मार दी गई.

भारत और उसकी पत्नी प्रार्थना कर रहे थे कि वे बच जाएँ. लेकिन उस खुले मैदान में कहीं छिपने की जगह नहीं थी. न कोई प्रार्थना सुनी गई, न कोई गुहार.
“मेरे पास छोटा बच्चा है, हमें छोड़ दो,” उसने आतंकवादियों से कहा. कुछ ही सेकंड में भारत अपनी पत्नी और बेटे के पास जमीन पर गिर चुका था.
उस दिन को बारह महीने हो गए हैं. पहलगाम की घाटी में सब शांत है, लेकिन 26 लोगों के परिवारों के लिए यह दर्द कभी खत्म नहीं होता. जब भी पुलिस या सरकार कोई बयान देती है, सोशल मीडिया पर वीडियो आते हैं, या ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र होता है, उनका दर्द फिर जाग उठता है.
भारत के परिवार के लिए, वे धीरे-धीरे “नकली सामान्य जिंदगी” जी रहे हैं. सुजाता उम्मीद करती है कि वह उस क्लिनिक को फिर शुरू करेगी, जिसे वह अपने पति के साथ खोलना चाहती थी.
उनका बेटा अब स्कूल जाता है.
‘स्विट्ज़रलैंड क्यों जाएं, जब हमारे पास अपना है?’
उनकी उम्र में सिर्फ चार साल का फर्क था, लेकिन प्रीतम (39) और भारत (35) स्वभाव में बहुत अलग थे.
प्रीतम मिलनसार और खुला था. भारत शांत, सरल और अपने फैसलों को लेकर स्पष्ट था.
उनके पिता कर्नाटक सरकार में अधिकारी थे और परिवार बेंगलुरु के आसपास रहता था. प्रीतम ने बताया कि भारत ने इंफोसिस में 15 साल की नौकरी छोड़ दी थी ताकि वह अपनी पत्नी के क्लिनिक में मदद कर सके.
नया काम शुरू करने से पहले वह ब्रेक लेना चाहता था.
“जब भारत ने मां को कश्मीर यात्रा के बारे में बताया, तो उन्होंने पूछा कि क्या यह सुरक्षित होगा. भारत हंसकर बोला—जब अपना कश्मीर है तो स्विट्जरलैंड क्यों जाएं,” प्रीतम ने बताया.

“हममें से कोई रोता नहीं है. हम टूट नहीं सकते. हमें पता है कि हम कमजोर हैं, इसलिए हम सामान्य जिंदगी का दिखावा करते हैं. जिंदगी नकली लगती है,” प्रीतम ने कहा. “हमने एक-एक दिन जीना सीख लिया है. जिंदगी आगे बढ़ानी है. हमें एक-दूसरे का ख्याल रखना है.”
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