नई दिल्ली: ब्रिटेन ने मंगलवार को वेस्ट बैंक में अवैध इज़रायली बस्तियों पर बैन लगाने का ऐलान किया. इसके बाद इज़रायल के विदेश मंत्री गिदोन सार ने कहा कि पूर्वी यरुशलम में ब्रिटेन का कॉन्सुलेट बंद कर दिया जाएगा और गाजा के लिए अमेरिका की अगुवाई वाले समन्वय मिशन से ब्रिटेन को बाहर रखा जाएगा. उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “इज़रायल के खिलाफ उठाए गए कदमों का जवाब जरूर दिया जाएगा.”
ब्रिटेन, फ्रांस और कनाडा के बाद इज़रायली बस्तियों पर प्रतिबंध लगाने वाला तीसरा देश है. इज़रायल और उसके कुछ पुराने सहयोगी देशों के बीच बढ़ते राजनयिक तनाव के बीच यह कदम उठाया गया है. तीनों देशों ने एक साझा बयान में कहा कि यह कदम “दो-राष्ट्र समाधान की रक्षा के हमारे तरीके में एक और बड़ा बदलाव है.”
ब्रिटेन के प्रतिबंधों के तहत इज़रायली बस्तियों में बने सामानों पर रोक होगी. इसके अलावा उन कंपनियों और लोगों को भी निशाना बनाया जाएगा, जो इन बस्तियों के विस्तार में मदद करने वाली सेवाएं देते हैं.
ब्रिटेन के विदेश मंत्री एड मिलिबैंड ने इज़रायल की सरकार पर फिलिस्तीनियों की “जातीय सफाई” पर आंखें बंद करने का आरोप भी लगाया. उन्होंने इन कदमों को इज़रायल-गाजा संघर्ष के लिए “नए तरीके की शुरुआत” बताया. उन्होंने कहा कि यह तरीका “न सिर्फ अन्याय और पीड़ा की बात करता है, बल्कि कार्रवाई भी करता है.”
उन्होंने कहा कि ब्रिटिश सरकार का आधिकारिक रुख है कि वेस्ट बैंक पर इज़रायल का कब्ज़ा गैरकानूनी है. इसकी वजह “इज़रायल का अपना नियंत्रण मजबूत करना, स्थायी संप्रभुता बढ़ाने का उसका इरादा और अवैध बस्तियों के जरिए विस्तार करने की नीति” है.
उन्होंने कहा कि यह रुख 2024 में इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस की सलाहकारी राय के मुताबिक है और यह वेस्ट बैंक के साथ ब्रिटेन के “आर्थिक संबंधों” में भी दिखाई देना चाहिए.
इसके चलते उन्होंने कहा कि ब्रिटेन अगले छह से नौ महीनों में “एक नया व्यापक प्रतिबंध सिस्टम” लागू करेगा. मिलिबैंड ने कहा, “यह प्रतिबंध सिस्टम अवैध बस्तियों और उनके विस्तार को निशाना बनाएगा, इजरायल को नहीं.”
बाद में प्रधानमंत्री एंडी बर्नहैम ने भी कहा कि ये लक्षित कदम “इज़रायल के लोगों के खिलाफ नहीं, बल्कि दो-राष्ट्र समाधान के समर्थन में हैं.”
‘बेतुके झूठ’
इज़रायल के विदेश मंत्री गिदोन सार ने मिलिबैंड पर “बेतुका झूठ” फैलाने का आरोप लगाया. उन्होंने ब्रिटेन के खिलाफ कई जवाबी कदमों का ऐलान किया, जिसमें पूर्वी यरुशलम में ब्रिटिश कॉन्सुलेट को बंद करना भी शामिल है.
सार ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “हम जानते हैं कि ब्रिटेन में हमारे कई दोस्त हैं. दुर्भाग्य से, हमारे पास एक ऐसी शत्रुतापूर्ण लेबर सरकार है, जो लगातार इज़रायल के खिलाफ काम कर रही है. इस वजह से हमारे पास उसके शत्रुतापूर्ण कदमों का जवाब देने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है.”
उन्होंने यह भी कहा कि 11 ब्रिटिश सांसदों को इज़रायल में आने से रोक दिया जाएगा. इनमें जेरेमी कॉर्बिन और डायने एबॉट भी शामिल हैं. इसके अलावा ग्रीन पार्टी के सभी पांच मौजूदा सांसदों को भी इज़रायल में प्रवेश नहीं दिया जाएगा. उन्होंने इन लोगों पर “यहूदी विरोधी और इज़रायल विरोधी गतिविधियों” का आरोप लगाया.
सार ने कहा, “ब्रिटेन का यह कदम नैतिक रूप से गलत है और एक संप्रभु देश के मामलों और उसकी चुनावी प्रक्रिया में खुले तौर पर दखल है.”
उन्होंने आगे कहा, “ब्रिटेन की लेबर सरकार की ओर से ‘व्हाइट पेपर’ की शैली में कदम उठाने की कोशिश ब्रिटिश लेफ्टिनेंट-जनरल बार्कर के यहूदी विरोधी शब्दों की याद दिलाती है. बार्कर ने ब्रिटिश शासन के दौरान इज़रायल की धरती में ब्रिटिश सेना की कमान संभाली थी और कहा था: ‘यहूदियों की जेब पर चोट करके उन्हें सजा दो.’”
विदेश मंत्री के मुताबिक, “ब्रिटेन की लेबर सरकार का यह कदम खास तौर पर बेतुका है, क्योंकि एक सदी से भी पहले ब्रिटिश सरकार की बालफोर घोषणा ने आधिकारिक तौर पर यहूदियों के उस ऐतिहासिक अधिकार को मान्यता दी थी कि वे इज़रायल की धरती, जिसमें यहूदिया और सामरिया भी शामिल हैं, में अपना राष्ट्रीय घर फिर से बना सकें.”
उन्होंने कहा, “यह घोषणा ब्रिटिश शासन की नींव बनी, इसे लीग ऑफ नेशंस ने मान्यता दी और बाद में संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 80 में भी शामिल किया गया.”
E1 इलाके में निर्माण का मुद्दा
ब्रिटेन का यह ऐलान इज़रायल की ओर से यरुशलम के पूर्व में रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण E1 इलाके में करीब 1,200 बस्ती वाले घर बनाने के लिए टेंडर जारी करने के बाद आया. इन योजनाओं की दुनिया भर में काफी आलोचना हुई है. अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण इजरायल ने कई दशकों तक इस इलाके में निर्माण नहीं किया था.
मिलिबैंड ने संसद में कहा कि ब्रिटिश सरकार का “नया तरीका” जरूरी था, क्योंकि E1 में निर्माण से “फिलिस्तीन के बीचों-बीच रास्ता काटकर” दो-राष्ट्र समाधान “असंभव” हो जाएगा.
इज़रायल इस बात से सहमत नहीं है. हालांकि, सार ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि E1 में विकास को लेकर कोई नया फैसला नहीं लिया गया है. उन्होंने कहा कि यह फैसला एक साल से भी ज्यादा पहले लिया गया था और टेंडर की प्रक्रिया कई महीनों से चल रही है.”
उन्होंने कहा कि इज़रायली सरकार पहले ही तय कर चुकी है कि दो सड़कें बनाई जाएंगी. इनमें से एक, रोड 80, बेथलेहम और रामल्लाह इलाकों के बीच आने-जाने के लिए एक बड़ा रास्ता देगी. दूसरी सड़क, जिसे “फैब्रिक ऑफ लाइफ” रोड कहा जाता है, अ-ज़ईम और अल-एज़रियाह के बीच बनाई जाएगी.
सार ने कहा, “फिलिस्तीनी इलाकों के बीच संपर्क टूटने के दावे भी बेबुनियाद हैं. इज़रायल-फिलिस्तीन संघर्ष बहुत पुराना है. यह संघर्ष लंदन या पेरिस से जारी किए गए बयानों से खत्म नहीं होगा. एकतरफा और इज़रायल विरोधी रवैया समाधान की संभावना को करीब लाने के बजाय और दूर करता है.”
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