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Tuesday, 13 October, 2026
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संयुक्त राष्ट्र ने बाल विवाह रोकने, बालिकाओं के अधिकार मजबूत करने में भारत के प्रयासों को सराहा

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(योषिता सिंह)

संयुक्त राष्ट्र, 13 अक्टूबर (भाषा) संयुक्त राष्ट्र ने बाल विवाह रोकने और बालिकाओं के अधिकारों को मजबूत करने के भारत के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि देश ने दिखाया है कि निरंतर प्रोत्साहन और बड़े पैमाने पर सामुदायिक भागीदारी से वास्तविक और सार्थक बदलाव लाया जा सकता है।

संयुक्त राष्ट्र में भारत और सिएरा लियोन के स्थायी मिशन ने बालिका दिवस के उपलक्ष्य में सोमवार को ‘बालिकाओं को प्रोत्साहन-हमारे भविष्य में बदलाव’ विषय पर एक कार्यक्रम आयोजित किया।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए यूनिसेफ की उप कार्यकारी निदेशक हन्नान सुलेमान ने कहा कि इस विषय का संदेश सरल लेकिन प्रभावशाली है कि ‘‘जब बालिकाएं आगे बढ़ती हैं, तो समाज भी आगे बढ़ता है।’’

सुलेमान ने कहा, ‘‘भारत में दुनिया की सबसे बड़ी किशोर आबादी रहती है, जिसमें 25.3 करोड़ किशोर-किशोरियां हैं। इसका मतलब है कि भारत में बालिकाओं की प्रगति का महत्व उसकी सीमाओं से कहीं आगे तक है।’’

उन्होंने कहा, “भारत ने दिखाया है कि निरंतर प्रोत्साहन, बड़े पैमाने पर सामुदायिक भागीदारी और नीतिगत कदमों से वास्तविक और सार्थक बदलाव लाया जा सकता है। पिछले एक दशक में बालिकाओं की शिक्षा में उल्लेखनीय सुधार हुआ है, जो परिवारों में बालिकाओं के महत्व को बढ़ती मान्यता मिलने को दर्शाता है।”

उन्होंने कहा कि भारत में बाल विवाह के मामलों में कमी आई है जिनमें बाल विवाह मुक्त भारत अभियान जैसी पहल हैं।

संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पर्वतनेनी हरीश ने अपने संबोधन में नेतृत्व की प्रतिबद्धता, बड़े पैमाने पर निरंतर सामुदायिक भागीदारी और डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे का लाभ उठाने वाली भारत की पहल का उल्लेख किया। उन्होंने ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ कार्यक्रम का जिक्र करते हुए कहा कि इससे सामाजिक पूर्वाग्रहों को दूर करने, कल्याणकारी सेवाओं की पहुंच बेहतर बनाने और स्कूलों में बालिकाओं के नामांकन में वृद्धि करने में मदद मिली।

सिएरा लियोन की विदेश मामलों एवं अंतरराष्ट्रीय सहयोग की उप मंत्री जेनेबा बंगुरा ने जोर दिया कि जब किसी बालिका को शिक्षा से वंचित किया जाता है, कम उम्र में शादी के लिए मजबूर किया जाता है या लैंगिक भेदभाव के कारण आगे बढ़ने से रोका जाता है, तो उसकी प्रतिभा उभरने का अवसर छिन जाता है।

हरीश ने अपने छात्र जीवन का एक उदाहरण साझा करते हुए बताया कि जब वह कॉलेज में इंजीनियरिंग में स्नातकोत्तर की पढ़ाई कर रहे थे, तब उनकी मैकेनिकल इंजीनियरिंग की कक्षा में एक भी छात्रा नहीं थी।

उन्होंने कहा, ‘‘मैकेनिकल इंजीनियरिंग की कक्षा में केवल लड़के थे, क्योंकि इस विषय को पुरुषों का क्षेत्र माना जाता था। लेकिन आज मेरे विश्वविद्यालय की कक्षा में लगभग 70 प्रतिशत छात्राएं हैं। हमने अपने जीवनकाल में ही वास्तविक प्रगति होते देखी है।’’

भाषा आशीष प्रशांत

प्रशांत

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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