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Friday, 15 May, 2026
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सऊदी अरब ने ईरान और पश्चिम एशियाई देशों के बीच ‘नॉन-अग्रेशन पैक्ट’ का प्रस्ताव रखा —FT रिपोर्ट

रिपोर्ट के मुताबिक ईरान युद्ध खत्म होने के बाद तनाव कम करने के लिए रियाद कई प्रस्तावों पर विचार कर रहा है. खाड़ी देशों को युद्ध के बाद सैन्य रूप से मजबूत ईरान को लेकर चिंता बनी हुई है.

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नई दिल्ली: सऊदी अरब ने ईरान और पश्चिम एशियाई देशों के बीच “नॉन-अग्रेशन पैक्ट” यानी गैर-आक्रामकता समझौते का विचार आगे बढ़ाया है.

रियाद क्षेत्र में लंबे समय तक तनाव कम करने का रास्ता तलाश रहा है, जबकि यूएई के साथ उसके मतभेद भी बढ़ रहे हैं.

ब्रिटिश अखबार फाइनेंशियल टाइम्स (एफटी) ने गुरुवार को रिपोर्ट में कहा कि रियाद ने यह प्रस्ताव 1975 के हेलसिंकी समझौते की तर्ज पर रखा है.

यह समझौता यूरोपीय देशों और तत्कालीन सोवियत संघ के बीच हुआ था, जिसका उद्देश्य महाद्वीप में तनाव कम करना था.

रिपोर्ट में कहा गया है कि यह “कई प्रस्तावों में से एक” है, जिन पर ईरान युद्ध खत्म होने के बाद पश्चिम एशिया में तनाव घटाने के लिए विचार किया जा रहा है.

रियाद और अन्य खाड़ी देशों को ईरान के पास मौजूद बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन के जखीरे को लेकर चिंता है क्योंकि तेहरान और वॉशिंगटन के बीच चल रही बातचीत में इन मुद्दों पर चर्चा नहीं हो रही है.

एफटी ने लिखा, “अमेरिका और इज़रायल द्वारा ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू किए जाने के बाद से खाड़ी देशों को चिंता है कि युद्ध खत्म होने पर उनके पड़ोस में एक घायल लेकिन और ज्यादा आक्रामक इस्लामिक शासन रह जाएगा, जबकि क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी भी कम हो सकती है.”

अमेरिका और इज़रायल द्वारा ईरान के खिलाफ शुरू किए गए करीब 40 दिन लंबे युद्ध ने क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति और गठबंधनों को बदल दिया है.

जहां सऊदी अरब और दूसरे खाड़ी देश क्षेत्रीय सुरक्षा बनाए रखने के लिए हर विकल्प पर विचार कर रहे हैं, वहीं यूएई ने पश्चिम एशिया में अमेरिका-इज़रायल सुरक्षा धुरी के साथ अपने संबंध और मजबूत करने की कोशिश की है.

हाल के हफ्तों में रियाद और अबू धाबी के बीच मतभेद खुलकर सामने आए हैं. यूएई ने पेट्रोलियम निर्यातक देशों का संगठन (ओपेक) से बाहर निकलने का फैसला भी किया है.

रिपोर्ट के मुताबिक सऊदी अरब के इस गैर-आक्रामकता समझौते के प्रस्ताव को यूरोपीय देशों का समर्थन मिला है.

युद्ध के दौरान ईरान ने क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों और अन्य संपत्तियों को निशाना बनाया. साथ ही उसने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ को प्रभावी रूप से बंद कर दिया था.

यह अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग दुनिया की करीब पांचवें हिस्से की ऊर्जा आपूर्ति के लिए अहम माना जाता है. युद्ध के दौरान यूएई को ईरान की जवाबी कार्रवाई का सबसे ज्यादा असर झेलना पड़ा.

एमिराती इलाकों पर 2,500 से ज्यादा मिसाइल और ड्रोन दागे गए. संघर्ष के दौरान अबू धाबी को इजरायल से आयरन डोम एयर डिफेंस सिस्टम भी मिला, जिससे दोनों देशों के बीच बढ़ती सुरक्षा साझेदारी का संकेत मिला.

हालांकि, सऊदी अरब समेत कई खाड़ी देश इजरायल को मान्यता नहीं देते और उनके औपचारिक संबंध भी नहीं हैं, लेकिन 2020 में अब्राहम समझौते पर हस्ताक्षर के बाद संबंध सामान्य करने की प्रक्रिया शुरू हुई थी.

यह समझौता तेल अवीव, अबू धाबी और कुछ अन्य देशों के बीच हुआ था. एफटी की रिपोर्ट में कहा गया, “7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के बाद इजरायल की सैन्य कार्रवाई को लेकर कई अरब और मुस्लिम देशों में चिंता बढ़ी है. इनमें से कई देशों के इज़रायल के साथ औपचारिक संबंध भी नहीं हैं.”

यूएई को छोड़कर दूसरे अरब देशों के बीच यह धारणा है कि इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप को तेहरान पर हमलों में शामिल होने के लिए मनाकर पूरे क्षेत्र को युद्ध की ओर धकेल दिया.

रिपोर्ट के मुताबिक सऊदी अरब पाकिस्तान की अगुवाई में चल रही मध्यस्थता कोशिशों का समर्थन कर रहा है, जिससे क्षेत्र में इस्लामाबाद की सुरक्षा प्रदाता के रूप में भूमिका मजबूत हुई है.

सऊदी अरब का पाकिस्तान के साथ पहले से रक्षा समझौता है और अब इस समझौते में कतर और तुर्किये को भी शामिल करने के प्रस्ताव पर चर्चा चल रही है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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