नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश पुलिस ने पिछले महीने नोएडा में हुए मजदूर प्रदर्शन के दौरान हिंसा भड़काने के आरोप में दो लोगों पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) लगाया है.
इनमें लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार सत्यम वर्मा और स्टूडेंट एक्टिविस्ट और थिएटर आर्टिस्ट आकृति चौधरी शामिल हैं.
दिप्रिंट को जानकारी मिली है कि पुलिस ने मंगलवार रात करीब 11 बजे दोनों को एनएसए के तहत बुक किए जाने की सूचना दी.
राष्ट्रीय सुरक्षा कानून एक एहतियाती कार्रवाई है, जिसके तहत किसी व्यक्ति को बिना मुकदमे के एक साल तक हिरासत में रखा जा सकता है.
गौतमबुद्ध नगर पुलिस कमिश्नरेट ने शुक्रवार को जारी बयान में कहा कि आरोपी सत्याम के निजी बैंक खाते में 1 करोड़ रुपये से ज्यादा की रकम जमा हुई थी.
पुलिस के मुताबिक यह रकम “डॉलर, पाउंड और यूरो के रूप में अलग-अलग विदेशी देशों से आई” और कथित तौर पर हिंसा भड़काने के लिए दी गई थी.
बयान में कहा गया, “इसके अलावा आरोपी सत्याम वर्मा ने अलग-अलग मौकों पर यह रकम अपने दूसरे निजी बैंक खातों में ट्रांसफर की. सत्यम वर्मा कई संगठनों से जुड़े हैं, जिनकी फिलहाल गहन जांच चल रही है. आरोपी सत्यम वर्मा के बैंक खातों से हुए विभिन्न लेन-देन की गहराई से जांच, विश्लेषण और पड़ताल की जा रही है.”
10 अप्रैल को 65 साल के सत्यम वर्मा लखनऊ में प्रकाशन संस्था जनचेतना के दफ्तर में थे, जब पुलिस अधिकारी उन्हें हसनगंज थाने चलने के लिए कहकर ले गए. यह बात वर्मा की दोस्त कविता कृष्ण पल्लवी ने याद करते हुए बताई.
उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “थाने में पुलिस ने सत्याम से मजदूर संगठन ‘मजदूर बिगुल दस्ता’ पर लिखी गई पोस्ट हटाने को कहा. इस पर सत्याम ने जवाब दिया कि उन्होंने सिर्फ मजदूरों के अधिकारों के समर्थन में लिखा था.”
मजदूर बिगुल मजदूरों के संघर्ष और अधिकारों पर केंद्रित एक अखबार है, जिसका मुख्य दफ्तर उत्तर प्रदेश के लखनऊ में है. यह अखबार 1996 में शुरू हुआ था.
पल्लवी के मुताबिक पुलिस ने वर्मा से कहा, “पोस्ट डिलीट कर दो, नहीं तो लखनऊ में भी ऐसा कुछ हो सकता है.”
वर्मा ने पोस्ट हटा दी, लेकिन तीन दिन बाद, जब नोएडा की फैक्ट्रियों और गलियों में हिंसा फैल गई, तब उत्तर प्रदेश पुलिस फिर जनचेतना दफ्तर पहुंची. इस बार पुलिस ने वर्मा और उनकी सहयोगी कात्यायनी सिन्हा को हिरासत में लिया.
पल्लवी ने कहा, “वरिष्ठ पत्रकार संजय श्रीवास्तव, जो वहां स्वेच्छा से मदद करने पहुंचे थे, समर्थन देने के लिए उनके साथ गए थे. उन्हें भी रात 8 बजे तक पुलिस हिरासत में रखा गया.”
13 से 17 अप्रैल के बीच पुलिस तीन बार जनचेतना दफ्तर पहुंची.
पल्लवी ने बताया, “पुलिस के पास सिर्फ एक मंजिल की तलाशी का वारंट था, लेकिन उन्होंने पूरे परिसर की तलाशी ली. इसके बाद सत्यम को गिरफ्तार कर लिया गया और सारे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण जब्त कर लिए गए. पुलिस ने न तो गिरफ्तारी वारंट दिखाया और न ही जब्ती मेमो.”
वर्मा को पहली बार 17 अप्रैल को गिरफ्तार किया गया. हालांकि उनके वकील अली ज़िया कबीर चौधरी ने दिप्रिंट से कहा कि पुलिस रिकॉर्ड में गिरफ्तारी की तारीख 19 अप्रैल दिखाई गई है.
उनकी दोस्त ने कहा, “गिरफ्तारी के बाद 48 घंटे तक हमें सत्यम के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. वह 65 साल के हैं और डायबिटीज, थायरॉइड, हाई ब्लड प्रेशर समेत कई स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं. इस दौरान उन्हें कोई दवा नहीं दी गई.”
चौधरी ने दिप्रिंट से कहा कि वर्मा के परिवार को पहली बार उनकी जानकारी तब मिली जब पुलिस उन्हें 19 अप्रैल को सूरजपुर जिला एवं सत्र न्यायालय में पेश करने ले गई.
उन्होंने कहा, “परिवार को पता चला कि नोएडा में 9 अप्रैल से शुरू हुए और 13 अप्रैल को हिंसक हुए मजदूर प्रदर्शन में हिंसा भड़काने के आरोप में उन पर भारतीय न्याय संहिता (बीएनएसएस) की कई धाराएं लगाई गई हैं.”
12 मई को, करीब एक महीने बाद, उत्तर प्रदेश पुलिस ने “ठोस वीडियो और इलेक्ट्रॉनिक सबूतों” का हवाला देते हुए वर्मा पर एनएसए लगा दिया.
गौतम बुद्ध नगर की पुलिस कमिश्नर लक्ष्मी सिंह ने कहा कि जिन लोगों पर एनएसए लगाया गया है, वे “बाहरी लोग” थे जो हिंसा भड़काने की कोशिश कर रहे थे.
उन्होंने कहा, “ये लोग मजदूर नहीं हैं और न ही नोएडा में रहते हैं. ये बाहरी लोग हैं जिन्होंने हिंसा भड़काने की कोशिश की.”
इस कार्रवाई को “मनमाना” बताते हुए वर्मा के वकील चौधरी ने कहा कि अदालत में पेश किए गए व्हाट्सऐप चैट सिर्फ “बिगुल के मीडिया ग्रुप में भेजे गए मैसेज” थे, जिसमें उसी प्रकाशन से जुड़े कुछ पत्रकार शामिल थे.
चौधरी ने कहा, “सरकार की तरफ से पेश वकील ने अदालत में वर्मा और उनके सहयोगियों के बीच नोएडा मजदूर प्रदर्शन को लेकर हुई बातचीत के व्हाट्सऐप चैट दिखाए. क्या पत्रकार आपस में बात नहीं कर सकते? क्या इसका मतलब यह है कि वह हिंसा भड़का रहे थे?”
उन्होंने आगे कहा कि वर्मा किसी दूसरे सार्वजनिक समूह का हिस्सा नहीं हैं और यह भी स्पष्ट किया कि एनएसए जो एक एहतियाती कानून है—तब लगाया गया जब वर्मा पहले से ही पुलिस हिरासत में थे.
पल्लवी ने कहा, “यह एहतियाती कदम कम और एक साल की सजा ज्यादा लगता है.”
अपनी गिरफ्तारी और लगातार हिरासत को चुनौती देते हुए वर्मा की पत्नी शाकंभरी वर्मा ने 8 मई को इलाहाबाद हाई कोर्ट में हेबियस कॉर्पस याचिका दायर की. चौधरी ने कहा, “इलाहाबाद हाई कोर्ट की वेबसाइट के अनुसार वर्मा की ओर से दायर हेबियस कॉर्पस याचिका फिलहाल सुनवाई और विचार के इंतजार में है.”
एनएसए लगाए जाने पर उन्होंने कहा, “इस कदम से एहतियाती हिरासत, नागरिक स्वतंत्रता और प्रेस की आज़ादी को लेकर तीखी बहस शुरू हो सकती है, खासकर इसलिए क्योंकि वर्मा की गिरफ्तारी और हिरासत की वैधता पहले से ही हाई कोर्ट में चुनौती के दायरे में है.”
छात्रा भी पुलिस के घेरे में
दूसरी व्यक्ति जिन पर एनएसए लगाया गया है, वह हैं आकृति चौधरी, जो 25 साल की हैं और दिल्ली यूनिवर्सिटी (डीयू) से इतिहास में ग्रेजुएट हैं.
11 अप्रैल को आकृति घर लौट रही थीं, तभी उत्तर प्रदेश पुलिस के सादे कपड़ों में मौजूद कर्मियों ने उन्हें नोएडा के बॉटनिकल गार्डन मेट्रो स्टेशन से फैक्ट्री कर्मचारी मनीषा और सॉफ्टवेयर इंजीनियर आदित आनंद के साथ हिरासत में ले लिया.
उनके पिता अरुण चौधरी ने कहा, “रविवार (12 अप्रैल) से आकृति की मां उन्हें लगातार फोन कर रही थीं. जब सोमवार (13 अप्रैल) सुबह तक फोन बंद मिला, तो हम परेशान हो गए. हमने उनकी फ्लैटमेट को फोन किया, तब पता चला कि उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया है.”
उन्होंने कहा कि फ्लैटमेट ने उन्हें बताया कि मजदूरों का प्रदर्शन चल रहा था, जिसमें 25-वर्षीय आकृति ने सिर्फ एक गीत गाया था.
चौधरी ने कहा, “मेरी बेटी छात्र राजनीति में सक्रिय रही है. वह बहुत अच्छी वक्ता और गायिका है और डीयू के लॉ फैकल्टी में दाखिला लेने वाली थी.”
पश्चिम बंगाल के गणशक्ति प्रकाशन में काम करने वाले चौधरी ने दिप्रिंट को बताया कि उनकी बेटी ने दौलत राम कॉलेज से इतिहास में ग्रेजुएशन किया था और डीयू के आर्ट्स फैकल्टी से पोस्ट-ग्रेजुएशन भी पूरा किया था.
उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा, “उसका भविष्य बहुत उज्ज्वल है.” आकृति के परिवार के मुताबिक पुलिस ने उनके पास से एक किताब जब्त की, जिसके बारे में पुलिस ने कहा कि वह “वामपंथी विचारधारा से प्रेरित” थी.
उन्होंने आरोप लगाया कि मजिस्ट्रेट ने आकृति को जमानत दे दी थी, लेकिन 15 अप्रैल को पुलिस अधिकारियों ने अदालत को बताया कि उनके खिलाफ दो और धाराएं—धारा 191 (1) और (2) (दंगा)—जोड़ी गई हैं. इसके बाद उनकी ज़मानत याचिका खारिज कर दी गई.
मंगलवार रात 11 बजकर 2 मिनट पर पुलिस ने चौधरी को बताया कि आकृति पर एनएसए लगा दिया गया है.
आकृति के वकील रजनीश यादव ने कहा, “आकृति 11 अप्रैल से ही पुलिस हिरासत में थीं, तो फिर वह 13 अप्रैल को दंगा और हिंसा कैसे भड़का सकती थीं?”
उन्होंने दिप्रिंट को यह भी बताया कि पुलिस ने अदालत में उस किताब का जिक्र किया जो कथित तौर पर “वामपंथी विचारधारा को बढ़ावा देती थी.” हालांकि, पुलिस ने अब तक आरोपी के परिवार और वकीलों को जब्ती मेमो नहीं दिया है.
आकृति चौधरी, सत्यम वर्मा और कम से कम 60 अन्य लोग 9 अप्रैल से शुरू हुए नोएडा मजदूर प्रदर्शन से जुड़ी हिंसा भड़काने के आरोप में अब भी जेल में हैं.
उन पर भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की उन धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है जो दंगा, हिंसा भड़काने, हत्या की कोशिश और अन्य अपराधों से जुड़ी हैं.
दिप्रिंट ने उत्तर प्रदेश पुलिस से संपर्क किया है. उनकी ओर से जवाब मिलने पर इस रिपोर्ट को अपडेट कर दिया जाएगा.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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