नई दिल्ली: हूती विद्रोहियों के हमले के बीच सऊदी अरब को दशकों में अपनी सबसे बड़ी सैन्य नाकामी का सामना करना पड़ रहा है. इसके साथ ही उसे यह कड़वी हकीकत भी समझ आ रही है कि उसके सोच-समझकर बनाए गए सैन्य गठबंधन मुश्किल वक्त में उसके काम नहीं आए. इस हफ्ते की शुरुआत में उत्तरी यमन के हूती लड़ाकों ने बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य पर कब्जा कर लिया. ये लड़ाके चप्पल पहने और AK-47 लिए हुए थे. ऐसे में सऊदी अरब खुद को अकेला पा रहा है.
अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के हस्तक्षेप करने के अनुरोध को ठुकरा दिया है. वहीं, रॉयटर्स की एक रिपोर्ट में सामने आया कि अमेरिका ने अलग से सप्ताहांत में ओमान में हूती प्रतिनिधियों के साथ पहले से गोपनीय रखी गई बातचीत की थी. इसमें यह सहमति बनी कि ईरान समर्थित यह मिलिशिया अमेरिकी और इजरायली व्यापारिक जहाजों पर हमला नहीं करेगा.
पिछले गुरुवार को मोखा बंदरगाह पर कब्जा करने के एक दिन बाद हूती विद्रोहियों ने पूर्वी रिफाइनरियों से लाल सागर तक सऊदी तेल ले जाने वाली पाइपलाइन के कुछ हिस्सों पर हमला किया, जिसके बाद इसे बंद करना पड़ा.
ईरान के अपनी पूर्वी सीमा के पास होर्मुज जलडमरूमध्य को रोकने के साथ ही अब सऊदी अरब को अपने तेल निर्यात के दोनों प्रमुख समुद्री रास्तों तक पहुंच खोने का खतरा है.
दशकों से सऊदी अरब ने अपनी सुरक्षा रणनीति का बड़ा हिस्सा एक सीधी सोच पर आधारित रखा था. उसके पास बहुत बड़ा आर्थिक संसाधन है और मजबूत अमेरिकी समर्थन है, इसलिए ये दोनों चीजें उसे आसपास की अस्थिरता से बचाएंगी. अब इस सोच पर खतरा मंडरा रहा है.
हूतियों के लगातार हमले, ईरान का दबाव और वॉशिंगटन के साथ लगातार लेन-देन पर आधारित होते जा रहे संबंधों ने रियाद को एक असहज हकीकत का सामना करने पर मजबूर कर दिया है. जिन गठबंधनों पर वह कभी भरोसा करता था, वे जितने भरोसेमंद दिखते थे, अब उतने नहीं रहे हैं.
तुरंत सामने आई कमजोरी को रियाद की अलग-अलग क्षेत्रीय गठबंधनों को संभालने की कोशिश, यमन में घटनाक्रम को लेकर उसके आकलन और बाहरी सुरक्षा गारंटी पर उसकी निर्भरता का नतीजा भी माना जा रहा है.
यमन में गठबंधन के अंदर संघर्ष
आधिकारिक तौर पर अंसार अल्लाह के नाम से जाना जाने वाला हूती संगठन उत्तरी यमन के जैदी शिया समुदाय से उभरा था. उन्होंने 2004 से 2010 के बीच यमन सरकार के खिलाफ कई युद्ध लड़े.
सितंबर 2014 में हूतियों के सना पर कब्जा करने और उत्तरी यमन पर अपना नियंत्रण स्थापित करने के छह महीने बाद सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने तेहरान समर्थित गुट को पीछे धकेलने के लिए एक गठबंधन बनाया.
लेकिन जैसे-जैसे संघर्ष आगे बढ़ा, दोनों खाड़ी देशों की रणनीतिक प्राथमिकताएं अलग होती गईं. रियाद एक ऐसा एकजुट यमन चाहता था, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त प्रेसिडेंशियल लीडरशिप काउंसिल के नियंत्रण में हो. वहीं अबू धाबी ने सदर्न ट्रांजिशनल काउंसिल का समर्थन किया, जो दक्षिणी यमन को अलग देश बनाने के पक्ष में था और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बंदरगाहों पर नियंत्रण चाहता था.
इस बंटवारे ने हूतियों के खिलाफ शुरू हुए एकजुट मोर्चे को धीरे-धीरे गठबंधन के अंदर ही एक जटिल संघर्ष में बदल दिया.
जैसे-जैसे सदर्न ट्रांजिशनल काउंसिल ने दक्षिणी यमन में अपना प्रभाव बढ़ाया, सऊदी अरब ने UAE समर्थित बलों के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू कर दिया. रियाद ने UAE से आने वाली हथियारों की खेपों को भी निशाना बनाया और अबू धाबी से दक्षिणी इलाके से बाहर निकलने की मांग करते हुए अल्टीमेटम जारी किए. इसका उद्देश्य दक्षिणी बलों को कमजोर करना था. लेकिन इसका बड़ा असर यह हुआ कि हूती विरोधी गठबंधन के अंदर दरार और गहरी हो गई.
अपने विरोधियों के बंटने और UAE के सीधे लड़ाई में शामिल होने को कम करने के बाद हूतियों ने उत्तरी यमन पर अपना नियंत्रण मजबूत कर लिया और लाल सागर के तट पर अपनी स्थिति मजबूत कर ली.
हूतियों को रोकने की कोशिश में सऊदी अरब धीरे-धीरे खुद को और ज्यादा अलग-थलग पाता गया. वहीं हूती मुख्य रूप से रक्षात्मक स्थिति से आगे बढ़कर उत्तरी यमन में अपने क्षेत्रीय नियंत्रण और बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य पर अपने प्रभाव को बढ़ाने लगे.
यमन में हूतियों के क्षेत्र पर नियंत्रण मजबूत होने से अब उन्हें उस समुद्री रास्ते का फायदा उठाने की स्थिति मिल गई है, जो स्वेज नहर के रास्ते हिंद महासागर और यूरोपीय बाजारों के बीच जाने वाले तेल टैंकरों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है.
इस महीने की शुरुआत में पेरिम द्वीप और मोका बंदरगाह पर कब्जा करके हूतियों ने लाल सागर के सबसे संकरे हिस्सों पर नजर रखने वाली अपनी स्थिति मजबूत कर ली है.
वहीं, वॉशिंगटन ने एक और विदेशी संघर्ष में शामिल होने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई. इसके बजाय उसने अमेरिकी जहाजों की सुरक्षा के लिए हूतियों के साथ बातचीत की, जिससे सऊदी जहाजों की सुरक्षा खतरे में रह गई.
बाहरी सुरक्षा गारंटी, लेकिन कोई गारंटी नहीं
पश्चिम एशिया युद्ध के बीच अमेरिकी सुरक्षा गारंटी पर भरोसा कम होने के बाद रियाद ने अपने पूर्वी पड़ोसी पाकिस्तान की ओर रुख किया.
नए बनाए गए मक्का म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट के तहत, जो कुछ हद तक NATO के सामूहिक रक्षा सिद्धांत पर आधारित एक बहु-रक्षा ढांचा है, रियाद ने पाकिस्तान और तुर्की समेत क्षेत्रीय शक्तियों से सुरक्षा गारंटी मांगी.
लेकिन अब ऐसा लगता है कि यह व्यवस्था शुरू होने से पहले ही खत्म हो गई.
परमाणु शक्ति वाले पाकिस्तान ने हूतियों के खिलाफ सक्रिय संघर्ष में सैनिक भेजने या अपनी सेना लगाने से इनकार कर दिया. इसके बजाय उसने तटस्थ कूटनीतिक रुख बनाए रखा. तुर्की ने मौखिक समर्थन दिया, लेकिन सीधे सैन्य मदद देने से पीछे रहा.
वॉशिंगटन, अबू धाबी, इस्लामाबाद या अंकारा से सक्रिय समर्थन नहीं मिलने के कारण रियाद के रणनीतिक विकल्प लगातार सीमित होते जा रहे हैं. यह सब ऐसे समय में हो रहा है जब सऊदी अरब दुनिया में सबसे ज्यादा सैन्य खर्च करने वाले देशों में से एक है. स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) ने अपने 2025 और 2026 के रक्षा बजट के आंकड़ों में बताया कि रियाद हर साल 64 अरब डॉलर से 78 अरब डॉलर से ज्यादा खर्च करता है. यह उसके कुल सरकारी खर्च का 20 प्रतिशत से अधिक है.
इस महीने अमेरिका ने रियाद के लिए संभावित 5 अरब डॉलर के हथियारों के पैकेज को मंजूरी दी है. इसमें 10,000 से ज्यादा प्रिसिजन-गाइडेंस किट और हजारों बम शामिल हैं. हालांकि, संकरी समुद्री गलियों में असममित युद्ध से निपटने के लिए ये पारंपरिक सैन्य क्षमताएं उतनी उपयोगी साबित नहीं हुई हैं.
जब क्षेत्रीय संघर्ष घर तक पहुंच जाता है
सऊदी अरब और UAE के बीच विवाद सिर्फ यमन तक सीमित नहीं है. इसके पीछे पश्चिम एशिया में प्रभाव को लेकर बढ़ती आर्थिक प्रतिस्पर्धा भी है.
सऊदी अरब के विज़न 2030 कार्यक्रम का उद्देश्य देश की अर्थव्यवस्था को अलग-अलग क्षेत्रों में फैलाना और रियाद को क्षेत्रीय कारोबारी केंद्र बनाना है. इसी कोशिश के तहत सऊदी अरब ने 2021 में एक नियम लागू किया था कि केवल वे बहुराष्ट्रीय कंपनियां ही सरकारी ठेके हासिल कर सकेंगी, जिनका क्षेत्रीय मुख्यालय रियाद में होगा. इस कदम से दुबई की लंबे समय से चली आ रही मध्य पूर्व के प्रमुख कारोबारी केंद्र की स्थिति को सीधे चुनौती मिली.
UAE ने इस प्रतिस्पर्धा में शुरुआत से ही बड़ी बढ़त हासिल कर रखी थी. उसने पहले ही बड़े लॉजिस्टिक्स और वित्तीय केंद्र स्थापित कर लिए थे और अब्राहम समझौते के जरिए इजरायल के साथ संबंध सामान्य कर लिए थे.
हूती बढ़त के जवाब पर विचार करते समय सऊदी अरब को अब दो मोर्चों पर संघर्ष की संभावना का सामना करना पड़ रहा है. हूती लाल सागर के तट से नीचे की ओर बढ़े हैं और बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य के पास मौजूद द्वीपों पर कब्जा कर लिया है. इसी समय, ईरान समर्थित इराकी मिलिशिया ने सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन पर हमला किया.
इसके बाद हूतियों ने सऊदी अरब पर हमले शुरू किए और मंगलवार को कथित तौर पर मक्का पर ड्रोन हमला करने की कोशिश की.
रियाद के लिए इसका नतीजा बढ़ते अलगाव के रूप में सामने आ रहा है. खाड़ी के दूसरे देश ओमान में ईरानी प्रतिनिधियों के साथ बैठक करने पर विचार कर रहे हैं. अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने ओमान की तारीफ की है, यह बात राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा कुछ महीने पहले ओमान को धमकी दिए जाने के बाद सामने आई है. सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान इस हफ्ते काहिरा गए हैं, जिससे यह संभावना बनी है कि मिस्र सऊदी सैन्य जवाब का समर्थन कर सकता है.
इसके बाद कतर है. 2017 में सऊदी अरब, UAE, बहरीन और मिस्र ने कतर से राजनयिक संबंध तोड़ लिए थे और उस पर जमीन, हवाई और समुद्री नाकाबंदी लगा दी थी. इन देशों ने कतर पर मुस्लिम ब्रदरहुड, अल-कायदा और ISIS समेत चरमपंथी समूहों का समर्थन करने का आरोप लगाया था.
असामान्य सहयोगियों की ओर रुख
इस बीच, इजरायल और सऊदी अरब के बीच अमेरिका की सेंट्रल कमांड की मध्यस्थता में बातचीत हुई है. द जेरूसलम पोस्ट ने मंगलवार को बताया कि बातचीत का उद्देश्य बढ़ते हूती हमले से रियाद की रक्षा करने में मदद करना था.
इजरायल ने पहले ही होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास समुद्री क्षेत्र में खुफिया और ऑपरेशनल क्षमताओं का प्रदर्शन किया है. यहां उसने ईरानी बलों के ठिकानों और गतिविधियों के बारे में खुफिया जानकारी की कई परतें तैयार करने में अमेरिका की मदद की है.
इसी समय, एक और मुद्दे ने इजरायल के सुरक्षा प्रतिष्ठान में चिंता पैदा कर दी है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सऊदी अरब को नागरिक परमाणु कार्यक्रम विकसित करने की अनुमति देने का फैसला किया है. यह मुद्दा ट्रंप के सामने उठाया गया था. उन्होंने जल्द ही सऊदी नागरिक परमाणु कार्यक्रम में प्रगति को सऊदी अरब और इजरायल के बीच संबंध सामान्य करने की संभावना से जोड़ दिया.
हालांकि, रियाद ने कहा है कि वह इजरायल के साथ कूटनीतिक प्रक्रिया को तभी आगे बढ़ाना चाहता है, जब इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष का समाधान हो जाए. औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं होने के बावजूद इजरायल और सऊदी अरब के कुछ साझा सुरक्षा हित हैं, खासकर ईरान और उसके क्षेत्रीय सहयोगियों से मिलने वाले खतरों को लेकर.
सऊदी अरब ने हूतियों को बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य से पीछे हटाने और अपने तेल के बुनियादी ढांचे की सुरक्षा के लिए ब्रिटेन से भी मदद मांगी है. ब्लूमबर्ग ने यह जानकारी दी. रिपोर्ट के मुताबिक, ब्रिटिश प्रधानमंत्री एंडी बर्नहैम ने फिलहाल सऊदी अरब में सैन्य सलाहकार भेजने पर सहमति जताई है.
भारत ने भी मंगलवार को सऊदी बुनियादी ढांचे पर हूती हमलों को लेकर चिंता जताई. भारत ने चेतावनी दी कि ऐसे हमले क्षेत्रीय स्थिरता को कमजोर करते हैं और बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य के जरिए जहाजों की आवाजाही की स्वतंत्रता के लिए खतरा पैदा करते हैं.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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