scorecardresearch
Thursday, 17 September, 2026
होमविदेशगंगा जल संधि पर बांग्लादेशी जल संसाधन मंत्री की मांग, कहा—नए समझौते में गारंटी क्लॉज शामिल करे भारत

गंगा जल संधि पर बांग्लादेशी जल संसाधन मंत्री की मांग, कहा—नए समझौते में गारंटी क्लॉज शामिल करे भारत

EXCLUSIVE INTERVIEW: अनी का कहना है कि यह क्लॉज़ 1977 में दोनों देशों के बीच हुए समझौते का हिस्सा था, लेकिन 1996 में इसे हटा दिया गया. 'बातचीत से बनी संधि में दोनों देशों के हितों का ध्यान रखा जाना चाहिए.'

Text Size:

नई दिल्ली: बांग्लादेश के जल संसाधन मंत्री शाहिद उद्दीन चौधरी अनी ने दिप्रिंट को दिए एक खास इंटरव्यू में कहा है कि भारत को नए गंगा जल समझौते में 1977 की “गारंटी क्लॉज” को शामिल करना चाहिए. इससे नदी के निचले हिस्से में पानी का न्यूनतम प्रवाह सुनिश्चित होगा.

1996 की गंगा जल संधि इस दिसंबर में खत्म होने वाली है और दोनों देश इसे फिर से लागू करने को लेकर बातचीत की तैयारी कर रहे हैं. गारंटी क्लॉज के तहत सूखे मौसम के सबसे कम पानी वाले समय में नीचे की ओर वाले देश, यानी बांग्लादेश, के लिए पानी का एक तय न्यूनतम प्रवाह सुनिश्चित किया गया था. यह अवधि 21 अप्रैल से 31 मई तक थी.

अनी ने कहा कि यह क्लॉज 1977 के उस समझौते का हिस्सा था, जिस पर उनके देश ने भारत के साथ हस्ताक्षर किए थे, लेकिन 1996 की संधि में इसे हटा दिया गया. अनी ने कहा, “संधि के नवीनीकरण के समय हम जिन चीजों को चाहते हैं, उनमें गारंटी क्लॉज शामिल है. यह हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है. दोबारा बातचीत के बाद होने वाले समझौते में दोनों देशों के हितों को ध्यान में रखा जाना चाहिए.”

मंत्री ने कहा कि बांग्लादेश और भारत के बीच अब भी अच्छी समझ है और गारंटी क्लॉज के साथ गंगा संधि का नवीनीकरण दोनों देशों के बीच “दोस्ती को और मजबूत करेगा”.

अनी ने कहा, “हम बहुत सकारात्मक हैं.” उन्होंने बताया कि संयुक्त नदी आयोग (JRC) जल्द ही बैठक करेगा और संधि की बारीकियों पर चर्चा करेगा.

JRC की स्थापना 1972 में हुई थी और इसकी अध्यक्षता दोनों देशों के जल संसाधन मंत्री करते हैं. इसकी आखिरी बैठक मई में कोलकाता में हुई थी, जिसमें संधि के नवीनीकरण को लेकर तकनीकी चर्चा हुई थी.

1996 की संधि में क्या है

1996 की संधि पर दिल्ली में तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री एच.डी. देवगौड़ा और उनके तत्कालीन बांग्लादेशी समकक्ष शेख हसीना ने हस्ताक्षर किए थे. इसका मकसद फरक्का में गंगा के पानी को बांटना था. फरक्का भारत में नदी पर बना आखिरी नियंत्रण ढांचा है. संधि के तहत सूखे मौसम के कम पानी वाले समय में 1 जनवरी से 31 मई तक हर 10 दिन के आधार पर तय फॉर्मूले के अनुसार पानी बांटा जाता है.

इस फॉर्मूले के मुताबिक, अगर नदी में पानी का प्रवाह 70,000 क्यूसेक या उससे कम है, तो दोनों देशों को बराबर हिस्सा मिलेगा. अगर प्रवाह 70,000 से 75,000 क्यूसेक के बीच है, तो बांग्लादेश को 35,000 क्यूसेक मिलेगा और बाकी पानी भारत को मिलेगा. अगर नदी में पानी का प्रवाह 75,000 क्यूसेक से ज्यादा है, तो भारत को 40,000 क्यूसेक मिलेगा और बाकी पानी बांग्लादेश को मिलेगा.

संधि में सूखे मौसम के सबसे कम पानी वाले समय में गंगा के पानी को बांटने का भी एक फॉर्मूला दिया गया है, जो 11 मार्च से 10 मई के बीच होता है. इस दौरान दोनों देशों को तीन अलग-अलग 10 दिन की अवधि में बारी-बारी से 35,000 क्यूसेक पानी मिलता है.

हालांकि, संधि में यह तय नहीं किया गया है कि जब फरक्का में नदी का पानी असामान्य रूप से कम हो जाए, तब बांग्लादेश को न्यूनतम कितना पानी मिलेगा. इसमें कहा गया है कि अगर किसी भी 10 दिन की अवधि में फरक्का पर पानी का प्रवाह 50,000 क्यूसेक से कम हो जाता है, तो दोनों देश “आपात आधार पर तुरंत बातचीत” करेंगे. यह बातचीत “बराबरी, निष्पक्षता और किसी भी पक्ष को नुकसान न पहुंचाने के सिद्धांतों” के आधार पर होगी.

बांग्लादेश के जल संसाधन मंत्री ने कहा कि पिछले 17 साल से बांग्लादेश में सत्ता में रहे लोगों ने देश के लोगों के हितों का ध्यान नहीं रखा. उन्होंने कहा, “लेकिन तारिक रहमान के नेतृत्व वाली हमारी सरकार अलग है. हमारे ध्यान में लोगों का हित है और हम यह सुनिश्चित करेंगे कि जब संधि के नवीनीकरण की बात आए तो यह इसमें नजर आए. इन सभी मुद्दों पर JRC की बैठक में चर्चा होगी.”

हितधारी राज्यों की आपत्ति

हालांकि भारत और बांग्लादेश ने अभी तक संधि पर दोबारा बातचीत शुरू नहीं की है, लेकिन भारत में हितधारी राज्यों की ओर से इसका विरोध शुरू हो गया है. इनमें बिहार भी शामिल है, जो संधि को खत्म करने की मांग कर रहा है.

राज्यसभा सांसद और जनता दल (यूनाइटेड) के राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय कुमार झा ने संधि को खत्म करने की मांग की है.

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर झा ने पिछले महीने लिखा, “30 साल के आंकड़े 1996 की भारत-बांग्लादेश गंगा जल संधि की वजह से खासकर बिहार पर पड़े गंभीर पर्यावरणीय और आर्थिक असर को दिखाते हैं. 12 दिसंबर 2026 को संधि खत्म होने के साथ JD(U) का रुख साफ है: इसे मौजूदा रूप में दोबारा लागू नहीं किया जाना चाहिए. भारत को इसे खत्म होने देना चाहिए और 2050 तक बिहार और दूसरे नदी बेसिन राज्यों की वैज्ञानिक तरीके से तय पानी की जरूरतों के आधार पर नए सिरे से बातचीत करनी चाहिए. इसमें बिहार को फैसले लेने की प्रक्रिया में मजबूती से शामिल किया जाना चाहिए.”

बांग्लादेश के साथ संधि के नवीनीकरण पर बातचीत शुरू करने में देरी को लेकर एक संसदीय समिति ने भी सरकार की आलोचना की है. विदेश मामलों की स्थायी समिति ने 30 जुलाई को संसद में पेश की गई ‘भारत-बांग्लादेश संबंधों का भविष्य’ पर अपनी Action Taken Report (कार्रवाई की रिपोर्ट) में सिफारिश की कि “भारत सरकार को जल्द से जल्द बांग्लादेश के साथ द्विपक्षीय बातचीत शुरू करनी चाहिए, ताकि 2026 के बाद कोई खाली जगह न बने.”

समिति ने यह भी सिफारिश की कि नवीनीकरण की प्रक्रिया में “नए जल संबंधी आंकड़ों, जलवायु परिवर्तन के अनुमान और नदी के पानी के बराबर और टिकाऊ इस्तेमाल की जरूरत” को ध्यान में रखा जाना चाहिए.

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर की अध्यक्षता वाली समिति ने कहा, “इस संबंध में समिति इस बात पर जोर देती है कि संबंधित राज्य सरकारों, खासकर पश्चिम बंगाल और बिहार, के साथ बातचीत जारी रखी जा सकती है, ताकि बातचीत के दौरान भारत का रुख तय करते समय राष्ट्रीय और राज्य स्तर के हितों के बीच तालमेल बनाया जा सके.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: क्या 6वीं अनुसूची अपना महत्व खो चुकी है? दार्जिलिंग से नागालैंड तक—राजनीतिक समझौते ही कर रहे हैं काम


 

share & View comments