प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पूरा राजनीतिक करियर इस बात पर आधारित रहा है कि वह खुद को कांग्रेस पार्टी, उसकी विचारधारा और नीतियों के बिल्कुल विरोध में दिखाने की कोशिश करते रहे हैं.
यहां तक कि उन्होंने विदेश दौरों के दौरान दावा किया कि प्रधानमंत्री बनने से पहले भारत किसी “भिखारी” से बेहतर नहीं था (जर्मनी में), भारत को “स्कैम इंडिया” कहा जाना चाहिए था (कनाडा), और एक समय ऐसा था जब लोग “भारत में पैदा होने पर शर्मिंदा” होते थे (चीन में). हां, यही वह व्यक्ति हैं जो राहुल गांधी पर विदेश में कुछ सच्ची बातें कहने के लिए भारत का “अपमान” और “बदनाम” करने का आरोप लगाते हैं.
इसलिए, BRICS शिखर सम्मेलन के उस घोषणा पत्र से सामने आए गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) जैसे रुख को देखकर हर कोई हैरान रह गया, जिसे भारत की अध्यक्षता में तैयार किया गया था. अमेरिका की व्यापार नीतियों की आलोचना? हां. फिलिस्तीन के लिए मजबूत समर्थन? हां. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसे वैश्विक संस्थानों में सुधार की मांग? हां. ग्लोबल साउथ की एकजुटता का ज़िक्र? हां. रूस की सैन्य कार्रवाई पर चुप्पी? हां. अप्रैल 1955 में हुई बांडुंग कॉन्फ्रेंस की तारीफ, जिसने NAM के गठन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया? हां.
फिलिस्तीन को लेकर इस्तेमाल किए गए कड़े शब्दों पर गौर कीजिए. इस बयान में कहा गया कि “कब्जे वाले फिलिस्तीनी क्षेत्र” से किसी भी फिलिस्तीनी को “जबरन विस्थापित करने, चाहे वह अस्थायी हो या स्थायी”, का वह “दृढ़ विरोध” करता है. इसमें “अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त 1967 की सीमाओं के अंदर एक फिलिस्तीनी राज्य बनाने” का समर्थन किया गया, जिसमें “गाजा पट्टी और वेस्ट बैंक शामिल हैं और पूर्वी यरुशलम उसकी राजधानी है”. ये ऐसे शब्द नहीं हैं, जिन्हें इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू या उनके करीबी सहयोगी मोदी चाहते कि भारत अपने नाम से जारी करे (लेकिन कांग्रेस पार्टी 100 प्रतिशत ऐसा चाहती).
हकीकत ने मोदी को बदलने पर मजबूर कर दिया
बहुत वक्त नहीं बीता है, जब मोदी ने इज़रायल की तरफ एक अजीब तरह का झुकाव दिखाया था. उन्होंने ईरान पर होने वाले हमले की आशंका के बीच इज़रायल का दौरा किया था, जिसके बारे में हर कोई जानता था कि हमला होने वाला है. इसके अलावा, भारतीय मिशनों के प्रमुखों को ईरान के मारे गए सर्वोच्च नेता अली खामेनेई के लिए रखी गई ईरान की शोक पुस्तिका में हस्ताक्षर नहीं करने के निर्देश दिए गए थे. साथ ही, भारत से रवाना होने के कुछ ही दिनों बाद हिंद महासागर में अमेरिकी नौसेना द्वारा IRIS Dena को डुबोए जाने पर भी चुपचाप इसे स्वीकार किया गया. ऐसा लग रहा था जैसे मोदी को उनके सबसे करीबी दोस्त ने यह विश्वास दिला दिया था कि अमेरिका-इज़रायल के छोटे और तेज़ अभियान के बाद ईरान की सरकार गिर जाएगी.
सच यह है कि मोदी दक्षिणपंथी नेता हैं, लेकिन हकीकत ने उन्हें अपनी नीति बदलने पर मजबूर कर दिया है. उन्होंने विदेश नीति को अपने व्यक्तित्व से जोड़ दिया और अपनी छवि बनाने को प्राथमिकता दी (याद कीजिए ‘हाउडी मोदी’ और ‘अबकी बार ट्रंप सरकार’), जिसका नतीजा यह हुआ कि जब अमेरिका ने अपना रुख बदला और एक बार फिर खाकी वर्दी पहने पाकिस्तानी फील्ड मार्शल का साथ देने लगा, तो मोदी के पास कुछ नहीं बचा. जिस क्वाड को बहुत ज्यादा महत्व दिया जाता था, वह भी तब बहुत कम मायने रखता दिखा, जब चीन गलवान में घुस आया, हमारे 20 सैनिकों को मार दिया और उन बफर जोन पर कब्ज़ा करके बैठ गया, जो पूरी तरह भारतीय क्षेत्र में थे.
अब यह सच है कि हम एक अस्थिर और तेज़ी से बदलती दुनिया में रह रहे हैं. बहुत कम लोगों ने डॉनल्ड ट्रंप द्वारा वैश्विक व्यवस्था को जानबूझकर पूरी तरह बदल देने की आशंका जताई थी—हालांकि, हममें से कुछ लोगों ने उस समय चेतावनी दी थी, लेकिन जब विदेश नीति बनाने का आधार आत्ममुग्धता और अपनी छवि बनाने के लिए प्रचार हो, तो नतीजा यह होगा कि आप ठीक उस समय यह घोषणा करेंगे कि “यह युद्ध का दौर नहीं है”, जब युद्ध का दौर शुरू हो रहा हो.
और इसलिए, परिस्थितियों से जुड़े बड़े कारण मोदी को फिर से—इसे हम गुटनिरपेक्षता 3.0 कह सकते हैं, की ओर लौटने पर मजबूर कर रहे हैं. यह आसान नहीं रहा है.
शुरुआत की ओर वापसी
23-24 अप्रैल को नई दिल्ली में हुई BRICS की तैयारी बैठक में घोषणा पत्र का मसौदा तैयार नहीं हो सका. इसकी एक वजह इज़रायल और फिलिस्तीन पर भाषा को “कम तीखा” करने की भारत की अप्रत्याशित कोशिश थी, लेकिन दूसरे देशों का दबाव बहुत ज्यादा साबित हुआ. इसकी एक वजह भारत की संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सदस्यता पाने की अपनी महत्वाकांक्षा भी थी—भारत जुलाई में इसके लिए आधिकारिक रूप से अभियान शुरू करने वाला था और उसके सामने इस्लामिक सहयोग संगठन के समर्थन वाले ताजिकिस्तान की उम्मीदवारी थी. इसलिए भारत के पास फिलिस्तीन के मुद्दे पर ग्लोबल साउथ को नाराज़ करने से बचने की हर वजह थी.
इस साल की शुरुआत में जर्मनी भी अपनी उम्मीदवारी हार गया था, क्योंकि उसका रुख इज़रायल के समर्थन में था, जैसा कि खुद जर्मनी के विदेश मंत्री ने माना था. यही है हकीकत का आपको अपनी जगह दिखा देना.
जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में भारत ने गुटनिरपेक्षता को सिर्फ एक मजबूत नैतिक सिद्धांत के तौर पर नहीं अपनाया था (जिसका BJP समर्थक किस्म के लोग मजाक उड़ाना पसंद करते हैं), बल्कि अपनी स्थिति और कमजोरियों का सही आकलन करने के कारण भी इसे अपनाया था. गुटनिरपेक्षता ने दूसरे उपनिवेशवाद से आज़ाद हुए देशों के साथ मिलकर काम करते हुए भारत के लिए अपने फैसले लेने की गुंजाइश बढ़ाई और उसके हितों की रक्षा की. यह एक व्यावहारिक रणनीति थी, जिसका मकसद भारत को महाशक्तियों के बीच की प्रतिस्पर्धा से मिलने वाले फायदे दिलाना था, लेकिन इसकी कीमत किसी ऐसे देश के रूप में नहीं चुकानी थी जो आसानी से किसी महाशक्ति के इशारे पर चले.
गुटनिरपेक्षता ने 1971 में इंदिरा गांधी को अमेरिका-चीन के खतरे को संतुलित करने के लिए सोवियत संघ की तरफ झुकने से नहीं रोका. इसके बाद उन्होंने रोनाल्ड रीगन के साथ अक्टूबर 1981 में कैनकन शिखर सम्मेलन और जुलाई 1982 में व्हाइट हाउस की अपनी अगली यात्रा के दौरान बातचीत भी की—दोनों ही शीत युद्ध के चरम दौर में हुए थे.
यह वही जगह थी, जिसे मोदी पश्चिम के साथ तेजी से जुड़ने की कोशिश में खोने के खतरे में थे और ईमानदारी से कहें तो ट्रंप ने भारत-अमेरिका संबंधों को उलटकर भारत को मोदी के इस झुकाव से बचा लिया.
इसीलिए हम खुद को शुरुआत में पाते हैं, नॉन-अलाइमेंट का समर्थन करते हुए यह दिखावा करते हैं कि “स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी” का बताया गया लक्ष्य–यह शब्द मनमोहन सिंह के राज में पॉपुलर हुआ–पूरी तरह से अलग है. इससे हमें अलायंस में उलझे बिना भारत को फिर से बनाने का समय और जगह मिलती है, जिसे इंटरनेशनल रिलेशंस लिटरेचर ‘इंटरनल बैलेंसिंग’ कहता है क्योंकि, पसंद हो या न हो, हम युद्ध के दौर में हैं.
अमिताभ दुबे कांग्रेस के सदस्य हैं. उनका एक्स हैंडल @dubeyamitabh है. यहां व्यक्त विचार उनके निजी हैं.
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