नई दिल्ली: नेपाल की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) के सत्ता में आने के छह महीने बाद, एंटी-एस्टैब्लिशमेंट भावना की लहर पर सवार होकर सत्ता में आई पार्टी के दो सबसे प्रमुख नेताओं, प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह और पार्टी अध्यक्ष रबी लामिछाने के बीच असहजता अब पार्टी के नियमों, कैबिनेट नियुक्तियों और विदेश नीति को लेकर विवादों के रूप में सामने आ रही है.
नेपाल के मीडिया में आई खबरों के मुताबिक, अब RSP के कुछ नेताओं पर निगरानी रखे जाने के आरोप भी लग रहे हैं.
दोनों पक्षों के बीच चुनाव से पहले एक व्यापक समझ बनी थी, जिसके तहत शाह को सरकार चलानी थी, जबकि लामिछाने को पार्टी के आंतरिक मामलों को देखना था. इस व्यवस्था ने RSP को शाह की शिक्षित, शहरी मतदाताओं के बीच लोकप्रियता और लामिछाने के ग्रामीण इलाकों में बड़े जनसमर्थन को एक साथ लाने में मदद की. इसके बाद हुए चुनावों में RSP ने लगभग दो-तिहाई बहुमत हासिल किया.
लेकिन वह फरवरी की बात थी. उपसभामुख के चयन से लेकर काठमांडू में नदी किनारे बसी बस्तियों को हटाने और नेपाल के दक्षिणी मैदानी इलाकों में सांप्रदायिक तनाव से निपटने तक, दोनों पक्षों के बीच कई बार मतभेद सामने आए हैं.
मौजूदा विवाद 13 जुलाई को केंद्रीय कार्य समिति की बैठक में खुलकर सामने आया, जब शाह के साथ खड़े एक गुट ने लामिछाने के नेतृत्व के खिलाफ शिकायतों को दर्ज करने वाला एक लिखित दस्तावेज़ पेश किया. स्थानीय मीडिया ने इसकी खबर दी.
हालांकि, एक और मुद्दा था. शिकायत के केंद्र में RSP के हाल ही में अपनाए गए पार्टी ढांचे में जोड़ा गया एक प्रावधान था. इसके तहत पार्टी अध्यक्ष को संसदीय दल के नेता—यह पद शाह के पास है, को पार्टी की आधिकारिक लाइन से हटने पर पद से हटाने का अधिकार दिया गया था.
शाह गुट के मुताबिक, यह प्रावधान 20 जून को हुई केंद्रीय समिति की बैठक और दो दिन बाद पार्टी के नियमों के सार्वजनिक होने के बीच जोड़ा गया था और इसकी जानकारी अधिवेशन के प्रतिनिधियों को नहीं थी. शाह के समर्थक तब तक अधिवेशन स्थल छोड़ चुके थे, जब संगठन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किया गया. दिप्रिंट को जानकारी मिली है कि इस संशोधन ने पार्टी अध्यक्ष को संसदीय दल के नेता को हटाने का अधिकार दे दिया, अगर वह व्यक्ति पार्टी के निर्देशों के खिलाफ काम करता है.
बालेंद्र शाह के समर्थकों ने कथित तौर पर इस कदम को प्रक्रिया के लिहाज़ से अनुचित और राजनीतिक रूप से निशाना साधने वाला माना. इससे भी महत्वपूर्ण बात यह थी कि उनका मानना था कि इससे रबी लामिछाने को जब चाहें बालेंद्र को हटाने का अधिकार मिल गया, जिससे “दरार पैदा हो गई.”
केंद्रीय समिति के सदस्य गणेश कार्की द्वारा पेश किए गए दस्तावेज़ में कहा गया कि पार्टी के चुनाव में मजबूत प्रदर्शन के पीछे शाह की राजनीतिक लोकप्रियता निर्णायक कारण थी और इसके बदले पार्टी को शाह को पूरे पांच साल का कार्यकाल पूरा करने का मौका देना चाहिए.
नेपाल खबर की रिपोर्ट के मुताबिक, कार्की द्वारा पेश किए गए दस्तावेज़ में कहा गया, “चुनाव में जनता से इतने बड़े पैमाने पर वोट मिलने का निर्णायक कारण RSP और बालेंद्र शाह के बीच हुआ राजनीतिक समझौता है.” इसमें आगे कहा गया, “अगर वह समझौता नहीं होता, तो RSP को इतने वोट नहीं मिलते और अगर वह समझौता नहीं होता, तो बालेंद्र शाह प्रधानमंत्री नहीं बन पाते.”
लामिछाने ने इसके बाद समिति को सीधे संबोधित करते हुए इस विचार को खारिज कर दिया कि यह प्रावधान किसी छिपे हुए एजेंडे का हिस्सा था. उन्होंने साथियों से कहा कि वह पार्टी के दूसरे नेताओं पर शक नहीं कर सकते और अगर सदस्यों को उनके इरादों पर शक है, तो वह इस्तीफा देने के लिए तैयार हैं.
विवाद को और बढ़ाते हुए, लामिछाने के खेमे के नेताओं ने आरोप लगाया है कि सरकारी सुरक्षा एजेंसियां उनके साथ खड़े वरिष्ठ नेताओं पर नजर रख रही हैं. इनमें वित्त मंत्री स्वर्णिम वागले और विदेश मंत्री शिशिर खनाल भी शामिल हैं. नेपाल खबर की रिपोर्ट के मुताबिक, उनका दावा है कि लामिछाने की भारत यात्रा के बाद निगरानी और बढ़ गई. लामिछाने ने 2 जून को बीजेपी के निमंत्रण पर पार्टी-टू-पार्टी बातचीत समेत अन्य कार्यक्रमों के लिए भारत का दौरा किया था.
विदेश नीति को लेकर मतभेद
अब तनाव इस बात तक भी पहुंच गया है कि दोनों नेता विदेशी सरकारों के साथ किस तरह संपर्क करते हैं. एशिया-पैसिफिक की राजनीति, सुरक्षा और कूटनीति पर केंद्रित पत्रिका द डिप्लोमैट के लिए नेपाली पत्रकार विश्वास बराल ने जुलाई में लिखे एक लेख में इस स्थिति का विश्लेषण किया था.
बराल ने लिखा कि अपने प्रधानमंत्री बनने के पहले तीन महीनों में शाह ने विदेशी नेताओं के साथ आमने-सामने की मुलाकातों से लगभग पूरी तरह दूरी बनाए रखी—यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नई दिल्ली आने के निमंत्रण को भी ठुकरा दिया.
इसके बजाय लामिछाने खुद भारत गए. उन्होंने मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की और बराल के मुताबिक, उनका काफी गर्मजोशी से स्वागत किया गया. नेपाल में कई लोगों ने इस स्वागत को इस संकेत के तौर पर देखा कि अगर शाह नई दिल्ली से दूरी बनाए रखते हैं, तो भारत लामिछाने के साथ संबंध मजबूत करने के लिए तैयार है.
बराल ने लिखा कि पार्टी के आम अधिवेशन के बाद शाह ने शायद अपने इस रुख पर फिर से विचार किया है. उन्होंने एशियाई विकास बैंक (ADB) के एक वरिष्ठ अधिकारी से मुलाकात की, जिसे व्यापक स्तर पर दोबारा संपर्क बढ़ाने की दिशा में बदलाव के संकेत के रूप में देखा जा सकता है. बराल ने कहा कि शाह को इस बदलाव को सावधानी से संभालना होगा, क्योंकि भारत इस बात से असहज है कि उसे ‘किनारे’ किया जा रहा है और चीन भी काठमांडू में पिछले साल हुए Gen Z के नेतृत्व वाले प्रदर्शनों के बाद बढ़ते अमेरिकी प्रभाव से परेशान है.
उन्होंने कहा, “शाह को बहुत सावधानी से आगे बढ़ने की ज़रूरत है. भारत इस बात से नाराज़ है कि उन्होंने उसे ‘किनारे’ किया है, खासकर भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिस्री से मिलने से इनकार करके, जो मोदी का निमंत्रण देने नेपाल आए थे. नेपाल में कई लोगों ने नई दिल्ली में लामिछाने के गर्मजोशी से हुए स्वागत को भारत के एक संकेत के तौर पर देखा कि अगर शाह लगातार उसे नज़रअंदाज़ करते रहे, तो वह RSP में एक वैकल्पिक शक्ति केंद्र को मजबूत करने के लिए तैयार होगा. चीन भी मार्च के चुनावों में नेपाली कम्युनिस्ट पार्टियों के प्रभाव में आई भारी कमी और नेपाली जमीन पर हाल में बढ़ी ‘चीन विरोधी गतिविधियों’ से खुश नहीं है.”
दरारें खुलकर सामने आईं
राजनीतिक विश्लेषक कनक मणि दीक्षित ने दिप्रिंट से कहा कि इस विवाद की कुछ जड़ें नेपाल की संसदीय व्यवस्था में ही हैं. इसमें आमतौर पर सत्तारूढ़ पार्टी का नेता ही सरकार का प्रमुख भी होता है, लेकिन RSP के मामले में जानबूझकर यह भूमिका दो प्रतिद्वंद्वी नेताओं के बीच बांटी गई है.
बराल का विश्लेषण भी एक अलग नज़रिए से इसी निष्कर्ष तक पहुंचता है. उन्होंने कहा कि नेपाल की राजनीति में इससे पहले भी व्यक्तित्व पर आधारित ऐसे गठबंधन टूट चुके हैं. सबसे प्रमुख उदाहरण 2021 में नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी का टूटना था, जब उसके दो सबसे प्रभावशाली नेताओं, के.पी. शर्मा ओली और पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’, के बीच सत्ता को लेकर संघर्ष हुआ था.
उन्होंने तर्क दिया कि शाह-लामिछाने का विभाजन कुछ हद तक तय था, क्योंकि RSP एक एंटी-एस्टैब्लिशमेंट आंदोलन से बदलकर एक ऐसी सत्तारूढ़ पार्टी बन गई, जिसके पास बांटने के लिए राजनीतिक फायदे और पद हैं. ऐसी परिस्थितियां किसी गठबंधन के अंदर छिपे मतभेदों को सामने ले आती हैं, जो पहले मुख्य रूप से पुराने राजनीतिक सिस्टम के विरोध के कारण एकजुट था.
दिप्रिंट ने मार्च में नेपाल चुनावों के दौरान इस बात पर रिपोर्ट की थी कि कई विश्लेषकों ने संभावित दरार की बात कही थी और इसे ‘कब’ का सवाल बताया था, ‘क्यों’ का नहीं.
हाल की ऐसी ही एक घटना में वित्त मंत्री वागले ने दावा किया कि उनके पास सिर्फ एक ऐसा सलाहकार है, जिसे भुगतान नहीं किया गया है, जबकि शाह के पास ऐसे कई सलाहकार हैं. इस टिप्पणी को अपनी ही सरकार के भीतर से प्रधानमंत्री की असामान्य रूप से सीधी आलोचना के रूप में देखा गया.
पूर्वी तराई क्षेत्र में हुई सांप्रदायिक हिंसा इस विवाद के लिए आखिरी चोट साबित होती दिखी. पिछले हफ्ते जब कोसी और मधेस क्षेत्र में तनाव बढ़ा, तो सरकार का शीर्ष नेतृत्व मौके से गायब दिखाई दिया.
दीक्षित ने कहा, “प्रधानमंत्री पूरी तरह चुप थे.”
देवांगंज, सुनसरी जिले में हिंसा के पांच दिन बाद शाह ने 30 जुलाई को राष्ट्र को संबोधित किया और सद्भाव और शांति की अपील की.
इसके उलट, रबी लामिछाने राजनीतिक खालीपन को भरने के लिए आगे आए. उन्होंने हिंसा को लेकर सर्वदलीय बैठक बुलाई और राष्ट्रपति को इसकी जानकारी दी. दीक्षित के मुताबिक, ये ऐसे कदम थे जिन्हें सामान्य तौर पर प्रधानमंत्री को उठाना चाहिए था.
दीक्षित ने कहा, “सोशल मीडिया की अच्छी समझ होने के बावजूद, वह (शाह) शासन चलाने के मामले में काफी कमजोर हैं. जब जनता को उनकी ज़रूरत थी, तब वह कहीं नज़र नहीं आए.”
बालेंद्र की सोशल मीडिया वाली जीत
बढ़ती दरार को लेकर नीति विश्लेषक और Gen Z प्रदर्शन की आयोजक आकृति घिमिरे, जिन्होंने अंतरिम सरकार के साथ काम किया था, ने कहा कि RSP के अंदर बहुत से लोग वास्तव में यह नहीं जानते कि संसद के भीतर कैसे काम किया जाता है.
उन्होंने कहा, “यह ऐसा है जैसे आप किसी ऐसी सोसाइटी में चले जाएं, जहां आपको नियम ही नहीं पता हों.” उन्होंने आगे कहा कि बालेंद्र एक स्वतंत्र निर्णय लेने वाले नेता के बजाय एक राजनीतिक ढाल की तरह काम करते हैं. “बालेंद्र सिर्फ एक प्रॉक्सी हैं. सारी गलतियां बालेंद्र से होंगी.”
हालांकि, उन्होंने कहा कि रबी के भविष्य के राजनीतिक लक्ष्यों के लिए स्वर्णिम का आर्थिक प्रबंधन राजनीतिक रूप से ज्यादा महत्वपूर्ण माना जा रहा है. उन्होंने कहा, “अगर स्वर्णिम अर्थव्यवस्था को खराब कर देते हैं, तो रबी की लोकप्रियता नीचे चली जाएगी.”
ऐसी स्थिति में, नए नेता स्वाभाविक रूप से अनुभवी नेताओं के संकेतों का पालन करते हैं. हालांकि, नियमों से बाहर जाने के परिणामों को गंभीर बताया गया. उन्होंने कहा, “वे (पुराने दौर के नेता) आपको जिस तरह सज़ा देते हैं, वह है आपके खिलाफ जनता में असंतोष पैदा करवाना.”
उन्होंने पिछले हफ्ते हुए सड़क प्रदर्शनों का उदाहरण दिया, जो 25 साल के ऑटो ड्राइवर गणेश नेपाली के एक विवाद के बाद खुद को आग लगाने की घटना के बाद हुए थे.
विपक्ष, जिसमें नेपाली कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूनिफाइड मार्क्सिस्ट-लेनिनिस्ट) शामिल हैं, ने संसद के अंदर अपनी आलोचना दर्ज की. हालांकि, घिमिरे ने कहा कि अब यह बात जनता तक नहीं पहुंचती. “वे अपनी आवाज उठा रहे होंगे, लेकिन क्या हमने इसके बारे में सुना है? हमने नहीं सुना.”
उन्होंने इसकी वजह सिर्फ मीडिया के पक्षपात को नहीं बताया, बल्कि राजनीतिक संवाद के बदलते तरीके को बताया.
घिमिरे ने कहा, “मौजूदा सरकार इस जगह को नियंत्रित करती है. एल्गोरिदम और सोशल मीडिया का यह स्थान, जहां हम लोकतंत्र चलाते हैं, वास्तव में इस बात को बदल रहा है कि हम राजनीति को कैसे देखते और समझते हैं.”
दीक्षित और घिमिरे, दोनों ने शाह की संवाद रणनीति को सोशल मीडिया से संचालित राजनीति का एक बिल्कुल साफ उदाहरण बताया. प्रधानमंत्री बहुत कम प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं, लेकिन फिर भी जनता के बीच उनका मजबूत समर्थन बना हुआ है, क्योंकि वह ऑनलाइन सीधे लोगों से संवाद करते हैं. बड़े फैसले अक्सर औपचारिक प्रशासनिक प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही सोशल मीडिया पर दिखाई देने लगते हैं.
घिमिरे ने कहा, “वह लगातार फेसबुक और ट्विटर पर पोस्ट करते रहते हैं, इसलिए वह सोशल मीडिया को अपने एक साधन के रूप में इस्तेमाल करना जारी रखते हैं. शायद उन्होंने दस्तावेजों पर हस्ताक्षर भी नहीं किए थे. उन्होंने बस पहले इसे प्रकाशित करने का फैसला किया.”
आगे क्या होगा
सरकार में 100 दिन पूरे होने और आम अधिवेशन के करीब तीन हफ्ते बाद भी RSP अपनी केंद्रीय समिति को पूरा नहीं कर पाई है और पार्टी के कई पदों पर अभी भी नियुक्तियां नहीं हुई हैं. इस देरी की वजह शाह और लामिछाने खेमों के बीच नियुक्तियों को लेकर जारी मतभेद को बताया जा रहा है.
पार्टी बढ़ती दरार को संभाल पाती है या फिर पुराने नेपाली राजनीतिक गठबंधनों की तरह आपसी खींचतान के कारण टूटने की राह पर जाती है, यह अभी एक खुला सवाल है. बराल के शब्दों में, यह उस पार्टी के लिए एक परीक्षा है कि वह अपने ही शिखर सम्मेलन में खुद को एकजुट रख पाती है या नहीं.
बराल ने लिखा, “यह कोई छोटा-मोटा मामला नहीं है. अगर मौजूदा RSP संसदीय दल के नेता शाह को किसी वजह से इस पद से हटा दिया जाता है, तो प्रधानमंत्री पद पर उनकी पकड़ टिकना मुश्किल हो जाएगा.”
उन्होंने लिखा, “पार्टी के नए नियमों में शाह के अलावा एक और वरिष्ठ नेता का प्रावधान भी किया गया है. यह लामिछाने की ओर से पार्टी में शाह के बढ़ते प्रभाव पर लगाम लगाने का एक और तरीका लगता है.”
दीक्षित ने कहा कि नेपाल के पूर्वी तराई में सांप्रदायिक हिंसा से निपटने के सरकार के तरीके को देखते हुए यह दरार खास तौर पर महत्वपूर्ण हो गई है. प्रधानमंत्री और गृह मंत्री सुदन गुरुङ, दोनों को हिंसा से निपटने के तरीके को लेकर अपनी विश्वसनीयता खोते हुए देखा गया, जबकि रबी लामिछाने को ज्यादा राजनीतिक परिपक्वता दिखाते हुए बताया गया.
दीक्षित ने आगे कहा, “प्रधानमंत्री और गृह मंत्री की विश्वसनीयता कम होने के बीच, रबी लामिछाने ने कुछ ऐसे कदम उठाए हैं, जो ज्यादा परिपक्वता दिखाते हैं और उन्हें अपनी खुद की विश्वसनीयता बनाने में मदद कर रहे हैं.”
उन्होंने कहा, “उन्हें बालेंद्र शाह से ज्यादा अनुभवी माना जाता है, जबकि बालेंद्र शाह अब भी अपनी बातों और रुख को लेकर समझ से परे बने हुए हैं.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
यह भी पढ़ें: नेपाल में सांप्रदायिक हिंसा में 3 लोगों की मौत, PM बालेंद्र शाह की देर से आई प्रतिक्रिया पर उठे सवाल