जून के पहले हफ्ते में देश में दो बड़ी घटनाएं हुईं. दोनों घटनाओं का असर और उनके आसपास की चर्चा किसी न किसी रूप में अभी भी जारी है.
पहली, अयोध्या के राम जन्मभूमि मंदिर में चढ़ावे की लगातार चोरी की खबर सामने आई. विश्व हिंदू परिषद के सबसे वरिष्ठ पदाधिकारियों में से एक, चंपत राय, सवालों के घेरे में आ गए और आखिरकार उन्हें मंदिर ट्रस्ट के अपने पद से हटना पड़ा. दूसरी, व्यंग्यात्मक कॉकरेच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में चले युवा आंदोलन के बाद धर्मेंद्र प्रधान ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया. धर्मेंद्र प्रधान भी संघ परिवार से जुड़े हुए हैं.
ध्यान देने वाली बात यह है कि दोनों मामलों में संघ के नेताओं ने कई हफ्तों बाद ही अपनी बात रखी. और दोनों ही मामलों में उन्होंने अपनी कोई गलती नहीं मानी. RSS के मुखपत्र ऑर्गनाइजर ने तो Gen Z के आंदोलन को ‘भारत विरोधी’ और ‘अराजक पागलपन’ तक कह दिया. दरअसल, पूरे जून और जुलाई के दौरान RSS-BJP समर्थक सोशल मीडिया हैंडल सिर्फ CJP और Gen Z पर कीचड़ उछालने में लगे रहे. यह मानना भोलेपन की बात होगी कि RSS के नेताओं का अचानक विचार बदल गया.
इसीलिए 6 अगस्त को मुंबई में सरसंघचालक मोहन भागवत ने जो बयान दिया, वह एक तरह से ‘न्यूस्पीक’ है.
“Gen Z की शिकायतें जायज हैं. अगर उनसे पहले ही बात की गई होती, तो आंदोलन की जरूरत नहीं पड़ती. हमें उनकी बात सुननी चाहिए… जब दूसरे रास्ते काम नहीं करते, तो विरोध करना पड़ता है. विरोध करना एक जायज तरीका है,” भागवत ने कहा.
उन्होंने यह भी कहा कि “अपनी मांगों को लेकर आंदोलन करने वाले युवाओं को राष्ट्र-विरोधी नहीं कहा जा सकता.”
इस तरह भागवत ने इशारों में BJP नेतृत्व की आलोचना की कि उसने युवा प्रदर्शनकारियों से पहले ही बात नहीं की. यानी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भरोसेमंद मंत्रियों जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह को जो काम छह हफ्ते बाद सौंपा, वह काम बहुत पहले हो जाना चाहिए था.
Gen Z आंदोलन शुरू होने के पूरे दो महीने बाद भागवत की यह आलोचना क्या दिखाती है? ज्यादातर राजनीतिक लोगों को यह अच्छी राजनीति लगती है. जब सत्ताधारी संघ परिवार के नेता आंदोलन को अपने मुताबिक नहीं मोड़ पाए, तो अब इस पूरे आंदोलन को अपने नाम करने की कोशिश की जा रही है, ताकि विपक्ष को इसका कोई राजनीतिक फायदा न मिल सके.
लेकिन इस आलोचना का एक दूसरा पहलू भी है. RSS की एक पुरानी प्रवृत्ति रही है कि वह समाज के हर क्षेत्र में अपनी जगह बनाना चाहता है, हो सके तो नियंत्रण भी: हर संस्था में, हर शासन क्षेत्र में. कभी-कभी अपने ही प्रशिक्षित लोगों द्वारा चलाई जा रही सरकार की आलोचना करना भी इसी रणनीति का हिस्सा है. इससे ‘विपक्ष’ की भूमिका भी जितना संभव हो, अपने ही हाथ में रखने की कोशिश होती है.
आलोचना हमेशा देर से आती है
वाजपेयी सरकार के समय से यह देखा गया है कि RSS के वरिष्ठ नेता कभी-कभी किसी न किसी मुद्दे पर सरकार चलाने वालों की आलोचना करते हैं. लेकिन ऐसी आलोचनाओं में कोई सिद्धांत या गंभीरता नजर नहीं आती. ये आलोचनाएं तभी की जाती हैं, जब सरकार किसी मुद्दे पर पहले ही पूरी तरह अपमानित हो चुकी होती है. लेकिन जब वे फैसले लिए जा रहे होते हैं या नीतियों की घोषणा और उन्हें लागू किया जा रहा होता है, तब RSS के नेता चुप रहते हैं. ऐसा तब भी होता है जब ये फैसले संघ परिवार की घोषित स्थिति के खिलाफ हों. इसका एक उदाहरण बांग्लादेश के हिंदुओं के प्रति भारत सरकार की जिम्मेदारियां हैं. जब कांग्रेस सत्ता में थी, तब RSS नेताओं की बड़ी-बड़ी मांगों की लंबी सूची थी, जिसमें ‘मामले को संयुक्त राष्ट्र में उठाना’ भी शामिल था. अब कोई मांग नहीं है.
Gen Z को लेकर मौजूदा आलोचनात्मक रुख सिर्फ दिखावा है. इसी तरह का रुख पिछले लोकसभा चुनावों के नतीजों के बाद भी देखने को मिला था. जब BJP 400 का आंकड़ा पार करने के बजाय 240 सीटों पर रुक गई, तब RSS नेताओं ने चुनाव प्रचार के दौरान BJP नेतृत्व की भड़काऊ भाषा और अहंकारी रवैये पर तंज कसे.
इससे ऐसा लगता है कि संघ नेताओं की कभी-कभार की आलोचनाएं सिर्फ एक रणनीति हैं. पहली बात, यह नुकसान की भरपाई करने की कोशिश होती है, ताकि संघ-BJP समर्थक निराश न हों और नेतृत्व के लिए कहीं और न देखने लगें, और विपक्ष को भी फायदा न मिले. दूसरी बात, इसके जरिए BJP के शासकों पर दबाव बनाया जाता है कि वे संघ को सत्ता में ज्यादा हिस्सा दें. RSS अलग-अलग क्षेत्रों, खासकर शिक्षा और संस्कृति में, अपना सीधा और अप्रत्यक्ष प्रभाव बढ़ाना चाहता है. संघ के एक वरिष्ठ नेता के शब्दों में, वह नहीं चाहता कि BJP ‘अपने ही लोगों की अनदेखी करे’.
इसलिए BJP नेताओं की संघ द्वारा कभी-कभार की जाने वाली आलोचना या उन पर किए जाने वाले तंज बेहतर स्थिति की कोई उम्मीद पैदा नहीं करते. असहमति और विपक्ष के प्रति सम्मान की बातें भी बनावटी लगती हैं. सिर्फ विपक्ष ही नहीं, बल्कि स्वतंत्र आलोचकों पर भी संघ परिवार के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने जुबानी हमले और आरोप लगाए हैं. आखिर ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ का नारा क्या विपक्ष के प्रति सम्मान की निशानी था?
एक पुराना तरीका
संघ से जुड़े लोगों के आपत्तिजनक बयानों में विपक्षी नेताओं को ‘जर्सी गाय’ या ‘हाइब्रिड बछड़ा’ कहना, किसी को ‘पचास करोड़ की गर्लफ्रेंड’ बताना और बिहार के लोगों के DNA में ‘खराबी’ होने का आरोप लगाना शामिल है. RSS के नेताओं ने यह सब चुपचाप देखा है. बल्कि, जब तक इन बयानों से राजनीतिक फायदा मिलता रहा और चुनावी संख्या बढ़ाने में मदद मिलती रही, तब तक वे अंदर ही अंदर खुश होते रहे.
दरअसल, अगर 2024 में BJP 400 से ज्यादा सीटें जीत गई होती, तो संघ के नेताओं ने उसकी ‘भड़काऊ भाषा’ और ‘अहंकार’ की आलोचना निश्चित रूप से नहीं की होती. इसी तरह, अगर CJP का आंदोलन पूरी तरह असफल हो गया होता, तो RSS प्रमुख की तरफ से भी इस तरह के बदले हुए बयान सुनने को नहीं मिलते.
अगर घटिया बयान, अहंकार और बड़े-बड़े झूठ चुनावी फायदा दिलाते हैं, या अगर सत्ता में बैठे लोगों का अधिकार और प्रभाव बना रहता है, तो सब ठीक है. ऐसे समय में सवाल पूछे जाने पर भी सिर्फ सफाई दी जाती है: ‘राजनीति ऐसा ही काम है, इसमें कुछ नहीं कर सकते’, ऐसा सुनने को मिलता है. यह उन असहज समर्थकों को संतुष्ट करने के लिए किया जाता है.
यह तरीका लंबे समय से चला आ रहा है. पिछले 25 सालों में RSS ने BJP नेताओं की एक के बाद एक अजीब और अनुचित हरकतों के लिए लगातार सफाई दी. कभी-कभी RSS की बीच की कतार के लोग खुद ही आलोचकों पर झूठे आरोप लगाते हैं और कीचड़ उछालते हैं. इसमें वही अहंकार और खराब भाषा दिखाई देती है, हालांकि यह उतनी सार्वजनिक नहीं होती.
इसलिए BJP की संघ नेताओं द्वारा समय-समय पर की जाने वाली आलोचना के पीछे कोई सिद्धांत नजर नहीं आता. यह एक रणनीति रही है, जिससे अपनी स्थिति को संभाला जा सके और हवा जिस दिशा में चल रही हो, उसी के हिसाब से अपनी स्थिति बदली जा सके.
यह कुछ हद तक हॉलीवुड की ‘गुड कॉप, बैड कॉप’ वाली तरकीब जैसी भी लगती है. दोनों का मकसद एक ही होता है, सिर्फ तरीके अलग होते हैं. RSS-BJP के नेता दशकों से आम समर्थकों और अपने ही कार्यकर्ताओं के साथ भी इसी तरह का खेल खेलते रहे हैं.
एक तरफ, RSS और BJP दोनों के जिम्मेदार लोग पार्टी के हित में किए जाने वाले हर तरह के दांव-पेच में करीब से शामिल रहते हैं. इसे आज शिक्षा के क्षेत्र में भी थोड़ी सी नजर रखने पर देखा जा सकता है. लेकिन गलत तरीकों को रोकने के बजाय, दोनों संगठन समर्थकों को यह बताकर गुमराह करते हैं कि यह ‘लाचारी’ या ‘कुछ समय की जरूरत’ है. जब कोई मामला पूरी तरह सामने आ जाता है, या कोई नेता या बड़ा पदाधिकारी बुरी तरह फंस जाता है, तो वे उससे अपना हाथ खींच लेते हैं. जैसे कि चयन करने में उनकी कोई जिम्मेदारी ही नहीं थी.
ध्यान भटकाने की चाल
थोड़ा सा भी ध्यान से देखने पर साफ दिखता है कि RSS और BJP के बीच किसी भी ‘अंतर’ की बात बढ़ा-चढ़ाकर कही जाती है. इन दोनों के बीच जो तथाकथित तनाव दिखाया जाता है, वह ज्यादातर मीडिया और भोले समर्थकों के लिए किया जाता है. इसका एक मकसद यह भी है कि संघ के नेता खुद को BJP के नेताओं से ज्यादा पवित्र दिखा सकें. साथ ही, यह संघ के साधारण और ईमानदार कार्यकर्ताओं के अंदर के असंतोष को भटकाने और दबाने का एक तरीका है. यह असली सवालों से ध्यान हटाने की एक उपयोगी तरकीब है.
आखिर, पूरी दुनिया में यह एक सामान्य तरीका है कि जब नेतृत्व ने गलतियां की हों, नुकसान पहुंचाया हो, जिसमें चुनावी हार भी शामिल है, तो उस नेतृत्व को बदल दिया जाता है. यूरोप में नेता खुद ही इस्तीफा दे देते हैं, बिना किसी मांग के. यह नैतिक भी है और जरूरी भी. यह किसी संगठन और पार्टी की सेहत के लिए भी अच्छा है, ताकि नए विचारों और नई ऊर्जा के लिए लगातार जगह बनती रहे. लेकिन यहां, आम तौर पर हिंदुओं के बीच, और खास तौर पर संघ-BJP में, इसे पूरी तरह नकारने की प्रवृत्ति रही है.
इसलिए, समय-समय पर ‘तनाव’ की जो बातें सामने आती हैं, वे सिर्फ RSS और BJP को एक-दूसरे से अलग दिखाने की पुरानी चाल लगती हैं. असल में, दोनों एक ही परिवार का हिस्सा हैं. वे बस दो अलग कपड़े पहनते हैं, ताकि अगर एक पर छींटे पड़ें, तो दूसरा खुद को साफ-सुथरा बता सके. ज्यादा से ज्यादा राजनीतिक जगह पर कब्जा करना चाहने वाला मूल राजनीतिक प्रोजेक्ट चलता रह सकता है. देश की बौद्धिक गिरावट की मौजूदा स्थिति में यह प्रोजेक्ट सफल रहा है, और संभावना है कि आगे भी सफल होता रहेगा.
शंकर शरण एक कॉलमिस्ट और पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर हैं. विचार निजी हैं.
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