बांग्लादेश “जुलाई आंदोलन” की दूसरी वर्षगांठ मना रहा है, जिसने तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना को सत्ता से हटा दिया था. पिछले दो सालों में देश 2024 की घटनाओं से आगे बढ़ चुका है. पहले मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी और अब प्रधानमंत्री तारिक रहमान के नेतृत्व में चुनी हुई सरकार है. ढाका में कई लोगों का मानना है कि बांग्लादेश अब कानून-व्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ रहा है.
लेकिन सबसे पहला सवाल जो कई लोग पूछते हैं: क्या हसीना का राजनीतिक सफर खत्म हो गया है?
5 अगस्त को दिल्ली के फॉरेन कॉरेस्पोंडेंट्स क्लब ऑफ साउथ एशिया में प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए हसीना ने अपने पिता शेख मुजीबुर रहमान को याद किया. उन्होंने बांग्लादेश की आज़ादी के लिए अपने परिवार के बलिदान का ज़िक्र किया और कहा कि वह वापस लौटेंगी और उन लोगों के साथ रहेंगी, जिनसे वह प्यार करती हैं.
हसीना सिर्फ ऑडियो के जरिए वर्चुअल मीडिया से जुड़ीं, जबकि उनके बेटे सजीब वाजेद अमेरिका से जुड़े. अपने 20 मिनट से ज्यादा लंबे भाषण में हसीना ने तीन मुख्य बातें कहीं—2024 का जुलाई-अगस्त आंदोलन एक “सुनियोजित हमला” था, देश सुरक्षित नहीं है, और वह हर हाल में वापस जाएंगी, “चाहे मेरी किस्मत में जो भी लिखा हो. मैं अपने प्यारे देशवासियों को तकलीफ में छोड़कर दूर नहीं रह सकती.”
इसके बाद दूसरा सवाल उठता है: क्या हसीना कभी बांग्लादेश वापस जाएंगी?
वापसी जो शायद तुरंत न हो
बांग्लादेश के लोगों और मीडिया के अलावा, यह सवाल कि क्या शेख हसीना कभी वापस लौटेंगी, राजनयिक हलकों और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बना हुआ है. इसकी वजह यह है कि बांग्लादेश में होने वाले राजनीतिक घटनाक्रम पूरे क्षेत्र पर असर डाल सकते हैं. अगर वहां फिर अस्थिरता बढ़ती है, तो उसका असर निवेश, व्यापार और दूसरी चीजों पर भी पड़ सकता है.
इसी तरह, नई दिल्ली के जानकार भी यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि हसीना की वापसी को लेकर भारत की सोच और रणनीति क्या है. लेकिन आखिर में लगभग सभी की राय एक जैसी दिखती है—कम से कम मौजूदा हालात में उनकी वापसी की संभावना नहीं है.
अगर शेख हसीना को सत्ता से हटाने के लिए जुलाई आंदोलन की ज़रूरत पड़ी थी, तो उनकी वापसी के लिए अवामी लीग के कार्यकर्ताओं और समर्थकों के साथ एक और बड़ा आंदोलन चाहिए होगा.
खुद हसीना ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “कम से कम 10,000 लोगों की हत्या हुई है या वे लापता हो गए हैं” और “पिछले दो साल में करीब 6.5 लाख लोगों को गिरफ्तार किया गया है, 3,500 मामले दर्ज हुए हैं, लगभग 4.5 लाख नेताओं, कार्यकर्ताओं और समर्थकों को आरोपी बनाया गया है, और मेरे खिलाफ ही करीब 600 मामले दर्ज किए गए हैं.”
ऐसे हालात में, जब अवामी लीग के कार्यकर्ता या तो छिपे हुए हैं या गिरफ्तार होकर जेल में हैं, उनकी वापसी के लिए कोई बड़ा आंदोलन खड़ा होना मुश्किल लगता है.
हालांकि, हसीना ने कहा कि उन्हें अपनी “किस्मत” की परवाह नहीं है और वह हर हाल में अपने लोगों के लिए वापस लौटना चाहती हैं, लेकिन फिलहाल उनकी वापसी संभव नहीं दिखती. फिर भी, उनकी बातें सिर्फ अवामी लीग के समर्थकों तक सीमित नहीं हैं. बहुत से लोग, जो रहमान और बाद में उनकी बेटी को 1971 में पाकिस्तान के खिलाफ बांग्लादेश की लड़ाई और एक स्वतंत्र बांग्लादेश की सांस्कृतिक और वैचारिक पहचान का प्रतीक मानते हैं, वे भी उनकी बातों से जुड़ाव महसूस करते हैं.
हसीना की वापसी की संभावना कम है, लेकिन पूरी तरह नामुमकिन नहीं है. हालांकि इसके लिए बहुत लंबा इंतज़ार करना पड़ सकता है, शायद एक पूरी पीढ़ी तक. बांग्लादेश के इतिहास में आंदोलन और सत्ता में वापसी कोई नई बात नहीं है.
आज सत्ता में मौजूद बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) भी 2024 तक भूमिगत थी. तारिक रहमान एक दशक से ज्यादा समय तक ब्रिटेन में स्वयं निर्वासन में रहे. इसी तरह जमात-ए-इस्लामी का भी अस्तित्व और भविष्य लंबे समय तक संकट में रहा. लेकिन आज एक पार्टी सत्ता में है और जमात संसद में 11 दलों वाले विपक्ष का नेतृत्व कर रही है.
इसलिए बांग्लादेश का इतिहास आंदोलनों, क्रांतियों और नेतृत्व में बड़े बदलावों से जुड़ा रहा है. ऐसे में अवामी लीग का फिर से खुलकर राजनीति में लौटना देर से हो सकता है, लेकिन संभव है.
हालांकि, मौजूदा सरकार के सामने इससे भी बड़ी चुनौती है. उसे लगातार यह साबित करना होगा कि वह हसीना सरकार से अलग है. साथ ही, उसके ऊपर अच्छा प्रदर्शन करने का दबाव हमेशा बना रहेगा.
भारत पर असर
नई दिल्ली में शेख हसीना की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने कड़ा बयान जारी किया. उसमें कहा गया, “बांग्लादेश इस बात से नाराज़ है कि फरार और नरसंहार के दोषी करार दी गई शेख हसीना को आज शाम नई दिल्ली में मीडिया से लाइव बातचीत करने की अनुमति दी गई. वहां उन्होंने और उनके साथियों ने बांग्लादेश और उसके लोगों के खिलाफ ज़हरीले बयान दिए.” यह दिखाता है कि हसीना देश से बाहर रहते हुए भी बांग्लादेश की सरकार के लिए चिंता का कारण बनी हुई हैं.
इसमें कोई शक नहीं कि हसीना का भारत में रहना दोनों देशों के रिश्तों में तनाव पैदा करता है, लेकिन नई दिल्ली में कुछ लोग यह मान लेते हैं कि सिर्फ यही तनाव की वजह है. जबकि कुछ जानकार साफ कहते हैं कि अगर हसीना को बांग्लादेश भेज भी दिया जाए, तब भी यह तय नहीं है कि दोनों देशों के रिश्ते फिर से सामान्य हो जाएंगे.
कुछ लोग यह सवाल भी पूछते हैं कि क्या हसीना के सत्ता में रहते हुए भी ढाका और नई दिल्ली के रिश्तों में तनाव नहीं था? कई बार इसकी वजह बांग्लादेश का चीन की तरफ झुकाव या वहां अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा थी. हालांकि, उस समय दोनों देशों के बीच सीधी बातचीत का रास्ता खुला था, जो अब लगभग खत्म होता दिख रहा है.
साथ ही, नई दिल्ली को आज के नए बांग्लादेश को भी समझना होगा. यह ऐसा बांग्लादेश है, जिसमें अंदर और बाहर दोनों स्तर पर बड़े बदलाव आए हैं. इन बदलावों का असर भारत को लेकर लोगों की सोच, चीन के प्रति झुकाव, आर्थिक विकास और दुनिया में उसकी स्थिति पर पड़ा है.
आज 2026 में बांग्लादेश की नाममात्र जीडीपी (Nominal GDP) लगभग 510 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है. उसकी विकास दर 4.7 प्रतिशत रहने का अनुमान है और प्रति व्यक्ति नाममात्र जीडीपी 2,911 डॉलर रहने की संभावना है. 2025 से 2026 के बीच प्रति व्यक्ति जीडीपी में 10.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी का अनुमान है.
वहीं, चीन बांग्लादेश का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है. बंगाल की खाड़ी और पूरे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भी बांग्लादेश की रणनीतिक अहमियत बहुत ज्यादा है. इसलिए अमेरिका सहित दुनिया की बड़ी ताकतों के लिए भी वह एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार बन गया है.
दूसरी ओर, बांग्लादेश की सेना “फोर्सेज गोल 2030” के तहत आधुनिकीकरण कर रही है. यह मिशन 2009 में शुरू हुआ था. हसीना के कार्यकाल में इसमें कई बदलाव हुए थे और मौजूदा सरकार के दौरान भी इसमें बदलाव होना स्वाभाविक माना जा रहा है.
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बांग्लादेश की भौगोलिक स्थिति बहुत मजबूत है. वह न तो ज़मीन से घिरा हुआ देश है और न ही कोई द्वीप देश. यही वजह है कि वह इस पूरे क्षेत्र में एक अहम भूमिका निभाता है.
उसकी आबादी की स्थिति भी ध्यान देने लायक है. वहां लोगों की औसत उम्र 26-27 साल है. युवा अब स्थानीय या क्षेत्रीय स्तर से आगे बढ़कर शिक्षा और रोजगार के अवसर तलाश रहे हैं. यह ऐसी पीढ़ी है, जिस पर खासकर 1971 के इतिहास का बोझ पहले की पीढ़ियों जितना नहीं है.
इन सब बातों को देखते हुए, जब ढाका भारत से कहता है कि “बांग्लादेश संप्रभु समानता, आपसी सम्मान, एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में दखल न देने और राष्ट्रीय गरिमा के आधार पर भारत के साथ रचनात्मक, दोनों के लिए फायदेमंद और भविष्य की ओर देखने वाले रिश्ते चाहता है,” तो इसके साथ दोनों देशों के बीच मौजूद तनाव की चुनौती भी जुड़ी रहती है.
नई दिल्ली में हसीना की प्रेस कॉन्फ्रेंस पर आपत्ति जताते हुए बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने यह भी कहा कि “भारत में उन्हें मीडिया से खुलकर बात करने का मौका देना हमारे लोगों की भावनाओं को गहरी ठेस पहुंचाता है और दोनों देशों के अच्छे रिश्तों के विकास के लिए नुकसानदायक है.” यह संदेश भी काफी सख्त था.
ढाका की सरकार और वहां का मीडिया अक्सर यह सवाल उठाते हैं कि भारत ने अपने यहां मेहमान के तौर पर रह रही हसीना को मीडिया और जनता से बात करने की अनुमति क्यों दी. लेकिन यही नियम तब भी लागू होना चाहिए था, जब तारिक रहमान कई साल तक ब्रिटेन में निर्वासन में रहकर भी बांग्लादेश की राजनीति और सार्वजनिक बहस में हिस्सा लेते रहे. क्या तब ढाका ने ब्रिटेन के साथ अपने रिश्तों में इसे कोई शर्त बनाया था? जवाब है—नहीं.
भारत के खिलाफ माहौल बनाना अब एक चलन और आसान राजनीतिक हथियार बन गया है. अगर आज बांग्लादेश ऐसा कर रहा है, तो वह भी उसी रास्ते पर चल रहा है. दुर्भाग्य से, लंबे समय तक इस क्षेत्र के छोटे देशों के लिए अपनी राजनीतिक और आर्थिक कमियों का दोष भारत पर डालना आसान रहा है.
लेकिन आज इस तरह की बातों को लगातार सही साबित करना पहले जितना आसान नहीं है. भारत के पड़ोसी देश पहले से ज्यादा मजबूत, समृद्ध और प्रभावशाली बन चुके हैं. क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर उनकी अपनी पहचान है. इसके बावजूद हर समस्या के लिए नई दिल्ली को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश जारी रहती है. यह अब रणनीतिक सोच से ज्यादा राजनीतिक सुविधा जैसा लगता है.
भारत और बांग्लादेश के बीच चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं और आने वाले समय में रिश्तों में और तनाव आ सकता है. लेकिन रिश्तों को फिर से बेहतर बनाने का एक ही रास्ता है—दोनों देशों के संबंध किसी एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द न घूमें, बल्कि व्यापक मुद्दों और सहयोग को प्राथमिकता दी जाए.
ढाका भारत से सवाल पूछता है और सख्त भाषा का इस्तेमाल करता है, लेकिन उसे नई दिल्ली की सुरक्षा चिंताओं का भी ध्यान रखना होगा. इनमें बांग्लादेश का धीरे-धीरे चीन के प्रभाव वाले दायरे में जाना भी शामिल है.
ऋषि गुप्ता ग्लोबल स्ट्रैटेजिक अफेयर्स के एक्सपर्ट हैं. इस लेख में व्यक्त विचार पूरी तरह लेखक के अपने हैं और किसी भी रूप में उनके वर्तमान या पूर्व संस्थानों के विचारों का प्रतिनिधित्व नहीं करते.
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