नई दिल्ली: प्रधानमंत्री बालेन शाह इस महीने संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में नेपाल के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करेंगे. वह पिछले महीने रसुवा और नुवाकोट समेत तीन जिलों में अचानक आई बाढ़ से हुई भारी तबाही की ओर दुनिया का ध्यान खींचेंगे.
यह फैसला बालेन की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) के सांसदों, मंत्रियों और नेताओं की ओर से लगातार की जा रही इस मांग के बीच लिया गया है कि वह खुद सालाना होने वाली इस बैठक में दुनिया के नेताओं के सामने नेपाल का मुद्दा रखें. यह जानकारी काठमांडू पोस्ट ने दी है.
रिपोर्ट के मुताबिक, प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) ने विदेश मंत्रालय से एक छोटा प्रतिनिधिमंडल बनाने को भी कहा है, लेकिन अभी तक यह तय नहीं हुआ है कि इसमें कौन-कौन शामिल होंगे. मार्च में पद संभालने के बाद बालेन की यह पहली विदेश यात्रा होगी.
पहले विदेश मंत्री शिशिर खनाल को महासभा के लिए न्यूयॉर्क जाना था, लेकिन 26 अगस्त को भोटेकोशी नदी में आई जानलेवा अचानक बाढ़ से नेपाल के कुछ हिस्सों में भारी तबाही के बाद इस फैसले पर दोबारा विचार किया गया. 4 सितंबर तक इस बाढ़ में कम से कम 1,280 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 5,000 से ज्यादा लोग अब भी लापता हैं.
रिपोर्ट में कहा गया है कि इस आपदा के बाद जलवायु परिवर्तन पर ज्यादा अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई की नेपाल की लंबे समय से चली आ रही मांग और भी जरूरी हो गई है. खास तौर पर हिमालय में रहने वाले लोगों को जिन खतरों का सामना करना पड़ रहा है, उनका मुद्दा भी अहम हो गया है.
महासभा के 81वें सत्र की औपचारिक शुरुआत 8 सितंबर को होगी, जबकि हाई-लेवल जनरल डिबेट 22 सितंबर से शुरू होगी.
गुरुवार को नेपाल के अलग-अलग राजनीतिक दलों के सांसदों ने प्रधानमंत्री बालेन शाह से UNGA में शामिल होने की अपील की. उन्होंने कहा कि बालेन को इस अंतरराष्ट्रीय मंच का इस्तेमाल जलवायु से जुड़ी आपदाओं के प्रति नेपाल की कमजोरी को दुनिया के सामने रखने के लिए करना चाहिए.
रिपोर्ट के मुताबिक, RSP के मनीष झा और नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के बरशमान पुन उन नेताओं में शामिल थे, जिन्होंने बालेन से न्यूयॉर्क जाने की अपील की.
पुन ने कहा कि नेपाल को संयुक्त राष्ट्र का इस्तेमाल ज्यादा अंतरराष्ट्रीय मदद और मुआवजा मांगने के लिए करना चाहिए. उन्होंने कहा, “सिर्फ यहां से इस मुद्दे को उठाना काफी नहीं है. प्रधानमंत्री को संयुक्त राष्ट्र और दूसरे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जाना चाहिए, दुनिया से अपील करनी चाहिए, अपने अधिकारों की बात रखनी चाहिए और मुआवजे की मांग करनी चाहिए.”
शाह ने बुधवार को संसद में सांसदों को भोटेकोशी आपदा से हुए नुकसान और सरकार की ओर से उठाए गए कदमों की जानकारी देते हुए भी यही बात कही.
उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से कहा कि वह अचानक आई बाढ़ को हिमालयी क्षेत्र के सामने बढ़ते खतरों की चेतावनी के तौर पर देखे. शाह ने कहा, “विशेषज्ञों ने कहा है कि रसुवा में भोटेकोशी नदी में आई बाढ़ हिमालय में बड़े पैमाने पर चट्टान खिसकने की वजह से आई थी. यह घटना इस बात का गंभीर संकेत है कि हमारे सामने मौजूद खतरे बढ़ रहे हैं.”
उन्होंने कहा कि नेपाल को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह बात और मजबूती से रखनी होगी कि जलवायु परिवर्तन देश में आने वाली प्राकृतिक आपदाओं को बढ़ाने में भूमिका निभा रहा है.
उन्होंने कहा, “जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक समस्या है. इसके असर को कम करना और उससे निपटना अंतरराष्ट्रीय समुदाय की साझा जिम्मेदारी है.”
कुछ मंत्री और RSP के नेता बालेन से नवंबर में तुर्किये के अंताल्या में होने वाले UN जलवायु सम्मेलन COP31 में भी शामिल होने की अपील कर रहे हैं.
नेपाल के विदेश मंत्री खनाल ने मंगलवार को कहा कि नेपाल का अपना ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन “लगभग नगण्य” है. इसके बावजूद नेपाल उस संकट का खामियाजा भुगत रहा है, जिसे पैदा करने में उसका बहुत कम योगदान है.
खनाल ने स्थानीय टीवी चैनल कांतिपुर टीवी को दिए इंटरव्यू में कहा, “हम अपनी कूटनीति का तरीका ‘मदद’ से बदलकर ‘न्याय और मुआवजे’ की ओर ले जा रहे हैं. यह दान का मामला नहीं है; यह कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी का मामला है. चीन, जो दुनिया में सबसे ज्यादा उत्सर्जन करता है, दूसरे नंबर पर अमेरिका और तीसरे नंबर पर भारत जैसे बड़े औद्योगिक उत्सर्जकों की ऐतिहासिक जिम्मेदारी है कि वे नेपाल जैसे कमजोर देशों को मुआवजा दें.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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