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Friday, 4 September, 2026
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ओपी राजभर यूपी के 9वें मंत्री, बड़े अधिकारियों से नाराज़; प्रमुख सचिव-निदेशक को हटाने की मांग

राजभर ने सीएम योगी को पत्र लिखकर अपने विभाग में लापरवाही का आरोप लगाया है. उन्होंने प्रमुख सचिव अनिल कुमार और निदेशक अमित कुमार सिंह पर सरकार के फैसलों को सही तरीके से लागू नहीं करने का आरोप लगाया है.

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लखनऊ: उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार में कैबिनेट मंत्रियों और उनके विभागों के बड़े अधिकारियों के बीच खींचतान कोई नई बात नहीं है. इस सूची में सबसे नया नाम पंचायती राज मंत्री और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP) के प्रमुख ओम प्रकाश राजभर का है. उन्होंने अपने विभाग के बड़े अधिकारियों पर ‘सहयोग नहीं करने’ का आरोप लगाया है और उन्हें हटाने की मांग की है.

राजभर ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखकर अपने ही विभाग में लापरवाही का आरोप लगाया है. उन्होंने प्रमुख सचिव अनिल कुमार और निदेशक अमित कुमार सिंह पर सरकार के फैसलों को सही तरीके से लागू नहीं करने का आरोप लगाया. उन्होंने यह भी कहा कि अधिकारी “किसी की बात नहीं सुन रहे हैं”. उन्होंने आरोप लगाया कि सरकारी योजनाओं के प्रचार और प्रसार के लिए दिए गए पैसों को मिलीभगत करके मनमाने तरीके से खर्च किया जा रहा है.

राजभर ने मांग की है कि दोनों बड़े अधिकारियों को उनके पदों से तुरंत हटाया जाए.

यह शिकायत पंचायती राज विभाग के डिजिटल लाइब्रेरी प्रोजेक्ट के दूसरे चरण के टेंडर को लेकर मंत्री और विभाग के अधिकारियों के बीच मतभेद के बीच आई है. सूत्रों ने बताया कि मंत्री और अधिकारी टेंडर को लेकर सहमति नहीं बना सके. इसके बाद अधिकारियों ने फैसला लेने के लिए फाइल मुख्य सचिव के जरिए भेज दी. बताया जाता है कि राजभर को यह कदम पसंद नहीं आया और उन्होंने यह मामला मुख्यमंत्री के सामने उठाया.

अपनी शिकायत में राजभर ने कहा कि चुनाव नजदीक हैं, लेकिन डिजिटल लाइब्रेरी प्रोजेक्ट अभी तक पूरा नहीं हुआ है.

उन्होंने प्रोजेक्ट के पहले चरण को विभाग ने किस तरह पूरा किया, इस पर भी सवाल उठाया. राजभर के मुताबिक, एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि पहला चरण पूरा हो चुका है. वहीं, इसी प्रोजेक्ट को लेकर 16 जिला पंचायती राज अधिकारियों (DPROs) के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की गई थी.

उन्होंने आरोप लगाया कि गलत रिपोर्ट दी गई थीं और संभल तथा उन्नाव की डिजिटल लाइब्रेरी में भी लापरवाही मिली थी. उन्होंने आगे आरोप लगाया कि पंचायती राज की योजनाओं के प्रचार और प्रसार के लिए दिए गए पैसों को मनमाने तरीके से खर्च किया जा रहा था.

विवाद के बारे में बात करते हुए राजभर ने कहा कि ऊपर के स्तर पर लिए गए फैसलों को विभाग के अंदर सही तरीके से लागू नहीं किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि चुनाव नजदीक होने को देखते हुए अधिकारियों को डिजिटल लाइब्रेरी प्रोजेक्ट का पहला चरण जल्द से जल्द पूरा करने के लिए बार-बार कहा गया था.

टेंडर के मुद्दे पर राजभर ने साफ किया कि किसी खास एजेंसी को फायदा पहुंचाने या चुनने को लेकर कोई बातचीत नहीं हुई थी. उन्होंने कहा कि उन्होंने मुख्यमंत्री से मौखिक रूप से भी प्रमुख सचिव और निदेशक को हटाने की मांग की थी. राजभर ने दिप्रिंट से कहा, “लखनऊ में बैठे अधिकारी अपने दफ्तरों से पूरे राज्य को चलाना चाहते हैं. जिलों में लागू की जा रही योजनाओं के बारे में मिलने वाली प्रतिक्रिया में उनकी बहुत कम दिलचस्पी है.”

उन्होंने आगे कहा कि मंत्री और दूसरे चुने हुए जनप्रतिनिधि नियमित रूप से जिलों में जाते हैं और लोगों से मिलते हैं. इससे उन्हें ज़मीन पर क्या स्थिति है, इसकी बेहतर समझ होती है.

पहली बार नहीं

यह नया विवाद मंत्रियों और बड़े अधिकारियों के बीच मतभेद का पहला मामला नहीं है. योगी सरकार में प्रशासन से जुड़े फैसलों और योजनाओं को लागू करने को लेकर पहले भी कई बार तनाव सामने आया है.

पिछले साल जुलाई में औद्योगिक विकास मंत्री नंद गोपाल नंदी ने अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाए थे. उन्होंने कहा था कि अधिकारी सरकारी नीतियों को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं, लापरवाही कर रहे हैं, मंत्रियों के निर्देशों का पालन नहीं कर रहे हैं और कुछ लोगों को फायदा पहुंचा रहे हैं.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लिखे पत्र में नंदी ने दावा किया था कि बार-बार निर्देश देने के बावजूद अधिकारियों ने पिछले दो साल से उन्हें जरूरी फाइलें नहीं दिखाई थीं. उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ अधिकारी सरकारी नीतियों और नियमों को नज़रअंदाज़ करके खुद फैसले ले रहे थे. उन्होंने यह भी दावा किया कि विकास कार्यों में देरी करने के लिए जरूरी फाइलों को गायब कराया जा रहा था.

उनसे पहले उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक, कैबिनेट मंत्री आशीष पटेल, कैबिनेट मंत्री संजय निषाद, स्वतंत्र प्रभार वाले राज्य मंत्री दिनेश प्रताप सिंह, कैबिनेट मंत्री जयवीर सिंह, राज्य मंत्री दिनेश खटीक और राज्य मंत्री प्रतिभा शुक्ला भी अलग-अलग समय पर ऐसी ही चिंताएं उठा चुके हैं.

पिछले साल कैबिनेट मंत्री आशीष पटेल ने राज्य सरकार के सूचना विभाग पर अपनी पार्टी अपना दल (सोनेलाल) को कमजोर करने की कोशिश करने का आरोप लगाया था. उन्होंने आरोप लगाया था कि पार्टी के अंदर मतभेद को लेकर झूठी और भ्रामक खबरें छापने के लिए मीडिया के एक हिस्से पर दबाव बनाया जा रहा है.

आशीष पटेल ने इस बार पत्र नहीं लिखा, बल्कि सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए यह मुद्दा उठाया. हालांकि, इससे पहले उन्होंने विभाग के अधिकारियों की कथित लापरवाही को लेकर सरकार को पत्र लिखा था.

पिछले साल फरवरी में महिला कल्याण, बाल विकास और पोषण राज्य मंत्री प्रतिभा शुक्ला ने एकीकृत बाल विकास योजना (ICDS) के निदेशक को पत्र लिखा था. इसमें उन्होंने अपने विभाग में भ्रष्टाचार और गड़बड़ी का आरोप लगाया था.

शुक्ला से पहले कैबिनेट मंत्री और भारतीय जनता पार्टी के सहयोगी संजय निषाद भी कई बार सरकारी अधिकारियों को लेकर चिंता जता चुके थे. इस साल जून में निषाद ने कहा था कि अधिकारी मंत्रियों की बात नहीं सुन रहे हैं. उन्होंने कहा था, “अधिकारी मंत्रियों की बात नहीं सुनते. उन्हें हमें जवाब देना है और हमें जनता को जवाब देना है.”

निषाद ने यह भी आरोप लगाया था कि राज्य सरकार के कुछ अधिकारी राजनीतिक रूप से समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की ओर झुके हुए हैं, लेकिन खुद को बीजेपी का समर्थक बताते हैं. उनका दावा था कि ऐसे अधिकारी पार्टी के बड़े नेताओं को गलत जानकारी दे रहे हैं.

मंत्रियों के बार-बार लिखे गए पत्रों और सार्वजनिक बयानों ने विपक्ष को योगी आदित्यनाथ सरकार पर निशाना साधने का एक और मौका दे दिया है. समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता मनोज काका ने कहा कि मंत्रियों और अधिकारियों के बीच मतभेद योगी सरकार में नियमित बात बन गए हैं.

उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “यूपी में मंत्रियों और अधिकारियों के बीच विवाद इतना आम हो गया है कि हम इसे बड़ी खबर भी नहीं मानते. अब यह साफ दिखाई दे रहा है कि मंत्री भी मुख्यमंत्री से खुश नहीं हैं, इसलिए उनके पत्र बार-बार सार्वजनिक हो रहे हैं. अलग-अलग विभागों से गड़बड़ी के आरोप सामने आ रहे हैं, जबकि मुख्यमंत्री को जैसे इनकी जानकारी ही नहीं है.”

उत्तर प्रदेश में बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं के मुताबिक, पिछले तीन साल में मंत्रियों और अधिकारियों के बीच मतभेद के कई मामले सामने आए हैं.

यह मामला पहली बार योगी आदित्यनाथ के दूसरे कार्यकाल में जुलाई 2022 में चर्चा में आया था. उस समय उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने तत्कालीन अपर मुख्य सचिव, चिकित्सा और स्वास्थ्य, अमित मोहन प्रसाद को पत्र लिखा था. पाठक ने विभाग में डॉक्टरों के तबादलों को लेकर नाराजगी जताई थी. ये तबादले उस समय हुए थे जब पाठक राज्य में मौजूद नहीं थे.

इसके बाद कई मंत्रियों ने सरकारी अधिकारियों से नाराजगी जताते हुए पत्र लिखे हैं. इनमें से कई पत्र बाद में सोशल मीडिया पर सामने आए और वायरल हो गए.

विवाद पर मुख्यमंत्री कार्यालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “सरकार में सब कुछ ठीक तरह से चल रहा है. ऐसे मुद्दे समय-समय पर सामने आते रहते हैं और ये कोई बड़ी चिंता की बात नहीं हैं. ऐसे मामले भी रहे हैं जब मंत्रियों ने खुद अपने पत्र सार्वजनिक किए हैं. मैं इसके बारे में विस्तार से नहीं जाना चाहता. हमारा ध्यान सरकार के कामकाज को सुचारू रूप से चलाने पर है और हम इसे बनाए रखने के लिए काम कर रहे हैं.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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