न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र की शुरुआत हो रही है. ऐसे में खबर है कि नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह पर उनकी पार्टी और आम तौर पर देश की ओर से UNGA में शामिल होने का दबाव है. उनसे बाढ़ के बाद जलवायु न्याय और दुनिया से मदद मांगने की उम्मीद है.
पिछले तीन दशकों में नेपाल को तीन अलग-अलग तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा है—राजनीतिक उथल-पुथल, एक दशक लंबा गृहयुद्ध और प्राकृतिक आपदाएं. देश के अंदर लगातार होते इन बदलावों और संकटों का असर नेपाल के विकास पर पड़ा है, लेकिन सवाल अब भी बना हुआ है: नेपाल इससे बाहर कैसे निकल सकता है?
अब तक बाढ़ में 1,200 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और यह संख्या बढ़ने की आशंका है. नेपाल के लिए खोज और बचाव का काम आसान नहीं रहा है क्योंकि यहां का टैरेन बहुत मुश्किल है, आपात स्थिति से निपटने की तैयारी सीमित है और आर्थिक स्थिति भी कमजोर है. ऐसे में पीएम बालेन शाह का दुनिया के सामने अच्छी तरह तैयार किया गया संदेश यूएन के मंच से काफी अहम हो सकता है. वह जेन ज़ी की बढ़ती ताकत, सबको साथ लेकर चलने वाली लोकतंत्र की मांग, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाओं के असर और सबसे जरूरी बात, एक ऐसा देश होने के कारण नेपाल के सामने आने वाली अतिरिक्त मुश्किलों पर बात कर सकते हैं, जो चारों तरफ से जमीन से घिरा हुआ है.
2025 में अंतरिम प्रधानमंत्री सुशीला कार्की के सामने भी ऐसी ही दुविधा थी: क्या UNGA में जाकर लोकतंत्र पर संदेश दिया जाए, या देश में रहकर हिंसक जेन ज़ी आंदोलन के बाद कानून-व्यवस्था बहाल करने और नए चुनाव कराने पर ध्यान दिया जाए. कार्की ने दूसरा रास्ता चुना था, लेकिन अब बालेन के सामने सिर्फ देश के अंदर की चुनौतियां नहीं हैं. इतनी बड़ी बाढ़ के लिए दुनिया से असाधारण मदद की जरूरत है और UNGA से बेहतर और सही समय शायद ही कोई हो सकता है.
लोगों में निवेश
1990 का दशक नेपाल के इतिहास में बहुत अहम समय था. 1990 में हुआ जन आंदोलन 1996 में शुरू हुए एक दशक लंबे गृहयुद्ध के बाद आया, जिसके कारण बहुत से लोगों को पश्चिम एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया और ऑस्ट्रेलिया जाना पड़ा. भारत जाने के लिए रोज़गार के कारण होने वाला पलायन पहले से ही लंबे समय से होता रहा था क्योंकि खुले बॉर्डर को पार करने के लिए वीज़ा या पासपोर्ट की ज़रूरत नहीं थी, लेकिन तीसरे देशों में जाना एक नई बात थी और इसके कारण साफ थे: ज्यादा स्थायी जगह बसने और बेहतर आर्थिक भविष्य की तलाश.
पिछले तीन दशकों में नेपाल की जीडीपी में विदेशों से आने वाले कामगारों के पैसे (रेमिटेंस) का हिस्सा कई गुना बढ़ गया है. मुख्य रूप से खेती पर निर्भर अर्थव्यवस्था से लेकर रेमिटेंस पर चलने वाली अर्थव्यवस्था बनने तक, नेपाल ने लंबा सफर तय किया है. वित्त वर्ष 2025-26 में रेमिटेंस के जीडीपी का 33.02 प्रतिशत रहने की उम्मीद है—जो 2024-25 के मुकाबले 6.6 प्रतिशत की बड़ी बढ़ोतरी है. रेमिटेंस ने नेपाल की आर्थिक विकास की दिशा में लोगों को सबसे अहम जगह पर ला दिया है, लेकिन अपने लोगों में निवेश करने को लेकर राज्य की कोशिश बहुत कम रही है. इसके लिए पिछले 17 साल की राजनीतिक अस्थिरता और एक दशक लंबे गृहयुद्ध को काफी हद तक जिम्मेदार माना जा सकता है—1996 से 2006 तक चला माओवादी विद्रोह, जिसकी जड़ें गहरी सामाजिक-आर्थिक असमानता, ग्रामीण गरीबी और राजनीतिक अधिकारों से वंचित किए जाने में थीं और जिसके बाद आखिरकार राजशाही खत्म हुई.
मौजूदा संकट से पलायन निश्चित रूप से और बढ़ेगा. खासकर ऐसे समय में, जब जॉब मार्केट गिर रहा है और अर्थव्यवस्था कमजोर हो रही है, पलायन को एक रास्ते के तौर पर देखा जा सकता है क्योंकि राज्य के पास तुरंत कोई समाधान देने की क्षमता कम है. नेपाल को जिस चीज़ की ज़रूरत है और हमेशा से रही है, वह है ऐसे लोगों की सुरक्षा के लिए एक व्यवस्था, जो विदेश में अवसरों की तलाश में देश छोड़ते हैं. आखिरकार, अर्थव्यवस्था में उनके योगदान को देखते हुए उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य की नैतिक जिम्मेदारी है.
विदेशों में रहने वाले नेपाली लोग योगदान देते हैं, उन्हें सुरक्षा का भरोसा चाहिए
हाल की आपदा के तुरंत बाद PM बालेन शाह ने विदेशों में रहने वाले नेपाली लोगों (नेपाली डायस्पोरा) से देश की मदद करने की अपील की. नेपाल के कई राजनयिक मिशनों ने प्रधानमंत्री राहत कोष के खाते की जानकारी वाले क्यूआर कोड शेयर किए और लोगों से योगदान देने की अपील की. सरकार को कई देशों से राहत, बचाव और आर्थिक मदद भी मिली है, लेकिन विदेशों में रहने वाले नेपाली लोगों से मदद की अपील खास तौर पर महत्वपूर्ण है.
आज अनुमान है कि 26 लाख नेपाली—यानी 3 करोड़ की कुल आबादी का करीब 9 प्रतिशत—विदेशों में रहते हैं. इनमें ज्यादातर भारत, मलेशिया, सऊदी अरब, कतर, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान में रहते हैं, लेकिन दुनिया में होने वाले संकट, खासकर यूरोप और पश्चिम एशिया में होने वाले युद्धों ने ऐसे हालात पैदा किए हैं, जिनमें राज्य को अपने लोगों की सुरक्षा करनी और उन्हें वापस निकालना पड़ता है.
कुछ समय पहले रूस-यूक्रेन युद्ध ने प्रवासियों की सुरक्षा का सवाल खड़ा कर दिया था और कई देशों ने अपने नागरिकों को वहां से निकालने के लिए जल्दी-जल्दी कदम उठाए, लेकिन सीमित संसाधनों और कमजोर राजनयिक संपर्क के कारण नेपाल को अपने नागरिकों को बाहर निकालने में भारत जैसे देशों की मदद पर निर्भर रहना पड़ा. ऐसी खबरें भी आई थीं कि कुछ नेपाली यूक्रेन के खिलाफ चल रहे इस भयानक युद्ध में लड़ने के लिए रूसी सेना में शामिल हो गए थे.
रोजगार का आकर्षण, चाहे वह बिना नियमों के हो, गैरकानूनी हो या जोखिम भरा हो, पलायन को और ज्यादा खतरनाक बना रहा है.
इसलिए, नेपाल को तुरंत अपने लोगों में बड़े स्तर पर निवेश करने की ज़रूरत है और उन्हें यह भरोसा देना होगा कि ज़रूरत पड़ने पर देश उन्हें वापस लाएगा. 2026 के आम चुनावों के दौरान, जो जेन ज़ी आंदोलन के बाद हुए थे, बालेन शाह ने मतदाताओं को भरोसा दिया था कि वह विदेशों में रहने वाले नेपाली लोगों के लिए और ज्यादा काम करेंगे और वास्तव में नेपाली डायस्पोरा ने ‘बालेन लहर’ को एक बड़ा आंदोलन बनाने में अहम भूमिका निभाई थी. चाहे घर पर मौजूद रिश्तेदारों को बदलाव के लिए वोट देने के लिए मनाना हो या सोशल मीडिया पर बालेन शाह के समर्थन से पोस्ट भर देना हो.
अगर विदेशों में रहने वाले नेपाली लोग आर्थिक विकास के लिए इतने अहम हैं, तो उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी राज्य की होनी चाहिए और इसकी शुरुआत राजनयिक मिशनों को मजबूत करके की जा सकती है.
फिलहाल अमेरिका, भारत, चीन, जर्मनी, मलेशिया, कतर, रूस, ब्रिटेन और जापान में नेपाल के महत्वपूर्ण राजनयिक मिशनों में स्थायी राजदूत नहीं हैं. अंतरिम सरकार की प्रधानमंत्री सुशीला कार्की ने अक्टूबर 2025 में इनमें से ज्यादातर राजदूतों को वापस बुला लिया था. इसके लिए उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली द्वारा की गई कई नियुक्तियों का हवाला दिया था. पद संभालने के बाद बालेन सरकार ने भी अप्रैल 2026 में कुछ राजदूतों को वापस बुला लिया और नई नियुक्तियों के लिए आवेदन और चयन प्रक्रिया के जरिए खुली अपील की, लेकिन यह प्रक्रिया अभी तक आगे नहीं बढ़ पाई है.
जब राजदूतों के महत्वपूर्ण पद खाली हैं, तो विदेशों में रहने वाले नेपाली लोगों के साथ ही उन देशों की सरकारों से भी नेपाल का राजनयिक संपर्क कम हो जाता है.
नेपाल की कहानी सिर्फ हाल की अचानक आई बाढ़ के दिल दहला देने वाले असर तक सीमित नहीं है. जब नेपाल के मौजूदा संकट के लिए दुनिया भर से प्रार्थनाएं और मदद मिल रही है, तब देश को अपने उन लोगों में फिर से निवेश करने की ज़रूरत है, जो रेमिटेंस और दूसरे तरीकों से राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में योगदान देते हैं. साथ ही, हर संकट के बाद नई रणनीतियां और ज्यादा मजबूत व्यवस्थाएं बननी चाहिए.
ऋषि गुप्ता ग्लोबल स्ट्रैटेजिक अफेयर्स के एक्सपर्ट हैं.
इस लेख में व्यक्त विचार पूरी तरह लेखक के अपने हैं और किसी भी रूप में उनके वर्तमान या पूर्व संस्थानों के विचारों का प्रतिनिधित्व नहीं करते.
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