लगभग 228 BCE, चीन में वॉरिंग स्टेट्स पीरियड के दौरान, झाओ हाउस किन हाउस के साथ जंग में था. ली म्यू, एक शानदार स्ट्रैटेजिस्ट और निडर जनरल, झाओ आर्मी का कमांडर था और किन को एहसास हुआ कि जब तक जनरल ली म्यू को हटाया नहीं जाता, वे झाओ को नहीं हरा सकते. इसलिए, उन्होंने झाओ के एक दरबारी अधिकारी को रिश्वत दी ताकि यह बात फैल जाए कि जनरल ली म्यू की ख्वाहिश है कि वह किन को हराने के बाद झाओ की गद्दी हड़प ले. जब यह अफवाह फैली, तो राजा कियान ने ली म्यू को मरवा दिया. तीन महीने बाद, कमज़ोर किन ने मज़बूत लेकिन लीडरलेस झाओ पर एक बड़ी जीत हासिल की.
ऐसा लगता है कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने चीन का प्राचीन इतिहास नहीं पढ़ा है. चीनी सेना के पश्चिमी थिएटर कमांड के पूर्व कमांडर जनरल झाओ जोंग्की को शी ने पिछले हफ्ते बर्खास्त कर दिया. उनके साथ, शी अब तक 102 बड़े कमांडरों को हटा चुके हैं.
बात यहीं खत्म नहीं होती. चीन में कम्युनिज्म की शुरुआत लेनिनवादी-मार्क्सवादी विचार से हुई, जो रूस से सीमा पार करके वहां पहुंचा. इस विचार से प्रभावित होकर माओ जेदोंग और उनके साथियों ने 1921 में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) की नींव रखी. रूस का प्रभाव पूरे चीन पर छा गया. अभी हाल तक, 2015 तक, उसकी सेना ‘पीपुल्स लिबरेशन आर्मी’ (PLA) में किसी भी अधिकारी के लिए जनरल बनने के लिए जरूरी था कि उसका शिक्षण और प्रशिक्षण रूसी युद्ध कला के अनुसार हुआ हो.
स्टालिन ने डर के कारण और अपने लिए हर चुनौती को खत्म करने के लिए रूस की रेड आर्मी का ‘शुद्धीकरण’ किया. इसमें तेजतर्रार मिखाइल तुखचेव्स्की (‘डीप बैटल’ योजना के प्रमुख विचारक) समेत पांच में से तीन सोवियत मार्शलों की या तो हत्या करवा दी गई या उन्हें जेल में डाल दिया गया. 15 में से 12 आर्मी कमांडरों और 30-40 हजार अफसरों को हटा दिया गया. इससे हिटलर को विश्वास हो गया कि सोवियत सेना ‘बिना सिर वाले भीम’ जैसी है. इसके बाद उसने 1941 में तेल के बड़े भंडार वाले कॉकसस और स्टालिनग्राद पर कब्ज़ा करने के लिए ‘ऑपरेशन बार्बरोसा’ शुरू किया.
हिटलर का मशहूर बयान है: ‘हमें केवल दरवाजे को धक्का देना है, फिर तो पूरा सड़ा हुआ ढांचा भरभराकर गिर जाएगा.’ स्टालिन को आखिर में कुछ जनरलों को जेल से रिहा करके फिर से पद पर लाना पड़ा और उन्हें जर्मन सेना से लड़ने के लिए युद्ध के समय जरूरी अधिकार देने पड़े. रूसी सेना शुरुआत में कमजोर पड़ी, लेकिन करीब तीन साल बाद 1944 में उसने जर्मन सेना को पीछे खदेड़ दिया.
PLA से लगातार निष्कासन क्यों?
शी जिनपिंग चीन के राष्ट्रपति, सीसीपी के अध्यक्ष और सेंट्रल मिलिटरी कमीशन के अध्यक्ष बनते ही चीन की राजनीति, पार्टी और सेना के मुखिया बन गए. इसके बाद उन्होंने PLA को ‘वर्ल्ड क्लास’ यानी विश्व स्तरीय सेना बनाने के लिए उसमें अपनी महत्वाकांक्षी योजना ‘रिवोल्यूशन इन मिलिटरी अफेयर्स’ (RMA) शुरू कर दी.
सैन्य मामलों के अलावा भ्रष्टाचार, चापलूसी की गहरी जड़ें जमा चुकी संस्कृति और गुटबाजी को खत्म करना भी ज़रूरी था. शी PLA के नेतृत्व के पीछे पड़ गए. उन्होंने ‘मक्खियों’ और ‘बाघों’ से भी निपटने का संकल्प लिया, यानी वह किसी को नहीं बख्शेंगे, चाहे वह किसी भी पद पर क्यों न हो.
उन्होंने ऐलान किया था, “अगर हम बुरी प्रवृत्तियों को मजबूत होने से नहीं रोकेंगे, उन्हें बढ़ने देंगे तो यह पार्टी और जनता के बीच दीवार खड़ी करने जैसा होगा. इस तरह हम अपनी जड़ों से टूट जाएंगे, अपना जीवन-रक्त और अपनी ताकत गंवा देंगे.”
उन्होंने 2012 में ‘आठसूत्री नियमावली’ जारी करके ‘नियमों की लीक पर चलने की प्रवृत्ति, नौकरशाही, सुखवाद और फिजूलखर्ची’ जैसी चार बुराइयों को खत्म करने की मुहिम शुरू की.
तब जनता ने इन्हें ऊंचे आदर्शों के रूप में स्वीकार किया. 10 लाख से ज्यादा सदस्यों को पार्टी से निकाल दिया गया और यह सिलसिला अभी भी जारी है. लेकिन 2026 कोई 2012 नहीं है.
यह लगभग नामुमकिन है कि कोई व्यवस्था ‘भ्रष्ट’ बनी रहे और उसके जनरल नतीजों की परवाह किए बिना 14 साल तक ‘अनुशासन और कानून का गंभीर उल्लंघन करते रहें.’ यानी समस्या कुछ और है.
क्या यह निष्कासन एक बड़ी और सामान्य प्रक्रिया है, या इसका जोर किसी खास क्षेत्र, समूह या गुट को निशाना बनाने पर है?
‘सेंटर फॉर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज’ (CSIS) में ‘चाइना पावर प्रोजेक्ट’ के तहत जनवरी 2022 से फरवरी 2026 के बीच किए गए एक विस्तृत अध्ययन ने, जिसकी पुष्टि दूसरे स्रोतों ने भी की है, कुछ दिलचस्प और महत्वपूर्ण आंकड़े सामने रखे हैं.
सबसे ज्यादा निष्कासन दक्षिणी थिएटर कमांड से किए गए हैं. इसके बाद क्रमशः मध्य, पूर्वी और उत्तरी थिएटरों से निष्कासन हुए हैं. ऊपर वाले तीन कमांडों ने ‘चीनी राष्ट्र के कायाकल्प’ के शी के सपने को पूरा करने के लिए ताइवान पर कब्ज़ा करने में भूमिका निभाई, लेकिन किसी राजनीतिक नेता के लिए इससे बुरी बात और क्या हो सकती है कि जिन कमांडरों को बड़ी और महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई हो, वही अविश्वसनीय और भ्रष्ट पाए जाएं.
पश्चिमी थिएटर कमांड, शिनजियांग और तिब्बत मिलिटरी कमांड में सबसे कम निष्कासन हुए. ये कमांड भारत का सामना करते हैं. भारतीय रणनीतिकारों को इस बात पर गौर करना चाहिए कि जिन कमांडरों को भारत की सीमा यानी एलएसी की जिम्मेदारी दी गई, वे कम भ्रष्ट माने गए और दूसरे कमांडों के मुकाबले शायद ज्यादा वफादार और प्रतिबद्ध माने गए.
जूनियर अफसरों के साथ बातचीत से पता चला कि चीन के पूर्वी, समुद्री इलाके के ज्यादा अमीर प्रांतों में तैनात अफसर तिब्बत और शिनजियांग के कठिन और दूरदराज इलाकों में तैनात अफसरों के मुकाबले ज्यादा महत्वाकांक्षी थे.
जो जनरल बीजिंग में सत्ता के केंद्र के ज्यादा करीब थे, उन्हें दूसरी जगहों पर कम महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों पर तैनात जनरलों के मुकाबले ज्यादा संख्या में हटाया गया.
उदाहरण के लिए पिछले चार साल में हटाए गए 90 जनरलों और लेफ्टिनेंट जनरलों में से 21 तो शक्तिशाली सेंट्रल मिलिटरी कमीशन (CMC) और बीजिंग में उसके कार्यालयों से थे. इससे साफ है कि शी ने चीन के आसपास दूसरे क्षेत्रों में ऑपरेशन से जुड़े कमांडरों (90 में से 25) के मुकाबले इन जनरलों पर ज्यादा गहरी नज़र रखी.
सबसे ज्यादा संख्या में छंटनी क्रमशः रॉकेट फोर्स, थलसेना और नौसेना से हुई. वहीं वायुसेना और पहले की ‘स्ट्रेटेजिक सपोर्ट फोर्स’ से, जिसे अब एयरोस्पेस, साइबर और इनफॉर्मेशन फोर्स में बांट दिया गया है, सबसे कम छंटनी हुई है.
साइबर और इनफॉर्मेशन फोर्स शी की आंख और कान हैं. इसलिए यह हैरानी की बात नहीं है कि हटाए गए जनरलों के बारे में काफी जानकारी इन दो फोर्स ने इकट्ठा की.
ऐसी खबरें सामने आ रही हैं कि मिसाइलों में ईंधन की जगह पानी भर दिया गया और मिसाइलों के भंडार के दरवाजे समय पर नहीं खुले. यह भी आरोप सामने आए कि मिसाइलों और रॉकेटों का उत्पादन करने वाले रक्षा उद्योग परिसरों के निर्माण में भारी कमीशनखोरी की गई.
PLA पर इन सबका क्या असर पड़ेगा?
पहले, ‘हायर डायरेक्शन ऑफ वॉर’ (HDW) पर विचार करें. जब ऑपरेशन से अलग रहने वाले झांग शेंगमिन, जो राजनीतिक कमिसार वर्ग से हैं, जैसे कमांडर और खुद शी जिनपिंग ही CMC में PLA के सबसे बड़े कमांडर हैं, तो साफ है कि ‘HDW’ की कमान शी के हाथ में ही है.
सभी थिएटर कमांडर सीधे शी को रिपोर्ट करेंगे. सेना से बाहर के एक नेता के हाथ में PLA की पूरी कमान होना एक खतरनाक मिसाल है.
इसके साथ ही युद्ध, खासकर ताइवान युद्ध के नतीजे की जिम्मेदारी और जवाबदेही भी उनके कंधों पर आती है. इससे बिल्कुल साफ हो जाता है कि ‘स्ट्रेट्स’ के पार युद्ध तब तक नहीं होगा, जब तक शी ऐसा पेशेवर नेतृत्व तैयार नहीं कर लेते, जो उन्हें यह भरोसा दे सके कि वह ताइवान जीतकर उनके हाथ में सौंप देगा.
दूसरे, जब किसी तानाशाही सरकार में कोई कमांडर सीधे सबसे बड़े कमांडर को रिपोर्ट करता है, तो इससे दो तरह के दबाव पैदा होते हैं. एक, वफादारी दिखाने का दबाव और दूसरा, नतीजे दिखाने का दबाव.
तानाशाह नहीं चाहते कि उन्हें बुरी खबर दी जाए. जब यह पता हो कि नाकाम होने पर क्या नतीजे भुगतने पड़ेंगे, तो कमांडर अपने अधिकारों का इस्तेमाल गलत तरीके से करने लगते हैं, अपनी समझ को किनारे रख देते हैं और अपने नेताओं की पूजा करने लगते हैं.
याद कीजिए कि हेनरी-8 ने अपनी तीन रानियों का सिर कैसे कटवा दिया था और इंग्लैंड में उसकी रानी बनना सबसे खतरनाक और बदनाम काम बन गया था. आज PLA का जनरल बनना शायद ऐसी ही दुविधा में फंसने जैसा है.
तीसरी बात है, PLA की क्षमता. जोखिम लेने से कमांडरों के बचने, अपनी जिम्मेदारी किसी दूसरे के कंधे पर डालने की सोच और खराब नेतृत्व का सेना के निचले स्तरों के मनोबल पर पड़ने वाले असर के बारे में काफी कुछ लिखा जा चुका है.
कुछ विचारकों ने इन पदों पर प्रमोट किए जाने वाले सैन्य कमांडरों की नई पीढ़ी में अनुभव की कमी का जिक्र किया है. उन्होंने सैन्य ऑपरेशन, खासकर ताइवान जलमार्ग में जटिल समुद्री ऑपरेशन चलाने की उनकी क्षमता का भी विश्लेषण किया है.
उनके निष्कर्ष बेशक सही हैं. लेकिन उन्हें समय के हिसाब से देखना बेहतर होगा.
याद रहे कि अमेरिका, भारत या पाकिस्तान आदि की पेशेवर सेनाओं में अधिकारी मेजर जनरल और उससे ऊपर के पदों पर पांच-छह साल सेवा देते हैं. इसके बाद कमांडर के रूप में केवल दो-तीन साल सेवा देते हैं.
लेकिन PLA के अधिकारियों के पास जनरल के रैंक पर 10 से 13 साल का अनुभव होता है. इनमें से ज्यादातर 53-54 साल की उम्र में मेजर जनरल बनते हैं और 67 साल की उम्र में CMC से रिटायर होते हैं.
इसलिए, तथाकथित ‘नई जमात’ के लोग जब कमांडर बनते हैं, तब वे कोई नौसिखिए नहीं होते. वे जिम्मेदारी और जवाबदेही संभालने के लिए पर्याप्त अनुभवी होते हैं.
लेकिन CCP और नेता के प्रति वफादारी ही अंतिम कसौटी होती है. बाकी किसी चीज का ज्यादा महत्व नहीं रहता.
अंतिम बात खुद शी जिनपिंग की है. माओ से भी ज्यादा ताकत हासिल कर चुके और पार्टी के संविधान में माओ की तरह अपना ‘शी जिनपिंग विचार’ दर्ज करा चुके शी का कोई उत्तराधिकारी नहीं हो सकता.
माओ का पक्का मानना था कि ‘बंदूक पर पार्टी का ही नियंत्रण होना चाहिए’ और यह कि ‘सत्ता बंदूक की नली से निकलती है.’
चेयरमैन के अपने लंबे-लंबे कार्यकाल में वह समय-समय पर छंटनी करते रहे. 1950 के दशक में मार्शल पेंग देहूयाई की छंटनी की गई. 1960 के दशक में PLA के चीफ ऑफ जनरल स्टाफ जनरल लुओ रूइक्विंग को हटा दिया गया. उनके नामित उत्तराधिकारी और रक्षा मंत्री लिन ब्याओ एक रहस्यमय विमान हादसे में मारे गए.
शी माओ के नक्शेकदम पर चल रहे हैं और वह माओ से भी आगे जा सकते हैं, लेकिन इतिहास पर विश्वास करें तो उनका यह मशहूर बयान अपशकुन का संकेत देता है कि ‘जो लोग अतीत को याद नहीं रखते, वे उसे दोहराने को अभिशप्त होते हैं.’
मेजर जनरल मंदीप सिंह, SM, VSM, एक रिटायर्ड आर्टिलरी ऑफिसर हैं और चीन पर गहरी नज़र रखते हैं. यह लेख उनके निजी विचार हैं.
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