नई दिल्ली: बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने पूर्व मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस को उस कथित राजनीतिक योजना का “फायदा उठाने वाला और सक्रिय हिस्सा” बताया है, जिसका मकसद बांग्लादेश को नुकसान पहुंचाना था. उन्होंने आरोप लगाया कि उग्रवादियों, धार्मिक कट्टरपंथियों और दूसरी ताकतों ने उन्हें सत्ता से हटाए जाने का फायदा उठाया.
दिप्रिंट को दिए एक एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में हसीना ने बांग्लादेश की मौजूदा स्थिति को “राष्ट्रीय संकट” बताया. उन्होंने आरक्षण विरोधी प्रदर्शनों की पूरी और स्वतंत्र जांच की मांग की, जिनकी वजह से आखिरकार अगस्त 2024 में उन्हें सत्ता छोड़नी पड़ी.
ढाका से नई दिल्ली आईं हसीना ने कहा कि वह दिसंबर में बांग्लादेश लौटने का इरादा रखती हैं और अपने खिलाफ चल रहे कानूनी मामलों का सामना करेंगी. इनमें बांग्लादेश के अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण द्वारा उनकी गैरमौजूदगी में सुनाई गई मौत की सजा भी शामिल है.
यह कहते हुए कि उन्हें बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि वह आखिरकार भारत आ जाएंगी, 78 साल की हसीना ने तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) सरकार को चुनौती दी कि वह उनकी पार्टी अवामी लीग से प्रतिबंध हटाए और उसके बाद आम चुनाव कराए.
शेख हसीना ने दिप्रिंट से कहा, “मैंने कहा है कि मैं दिसंबर के आसपास बांग्लादेश लौटने का इरादा रखती हूं. खास तारीख, समय और रास्ते की घोषणा सही समय पर की जाएगी. बांग्लादेश इस समय एक गंभीर राष्ट्रीय संकट से गुज़र रहा है. लोकतांत्रिक जगह खत्म कर दी गई है. न्यायपालिका का इस्तेमाल राजनीतिक बदले के लिए किया जा रहा है. मीडिया की आजादी पर रोक लगाई गई है. कानून-व्यवस्था कमजोर हुई है. अल्पसंख्यक खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं.”
उन्होंने आगे कहा, “यह अब सिर्फ अवामी लीग का मुद्दा नहीं है. यह एक राष्ट्रीय संकट है. देश की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकतों में से एक पर प्रतिबंध लगा दिया गया है. उसके लाखों समर्थकों से सामान्य राजनीतिक अधिकार छीन लिए गए हैं. अपने ही लोगों के इतने बड़े हिस्से को बाहर करके कोई देश फिर से स्थिर नहीं हो सकता.”
पूर्व प्रधानमंत्री ने संकेत दिया कि जब बांग्लादेश के लोग “इतने दर्दनाक और खतरनाक दौर” से गुज़र रहे हैं, तो वह “दूर नहीं रह सकतीं.”
हसीना अगस्त 2024 में ढाका से नई दिल्ली चली गई थीं. उन्हें सत्ता से हटाए जाने से पहले एक महीने से ज्यादा समय तक प्रदर्शन हुए थे. इन प्रदर्शनों की अगुवाई मुख्य रूप से छात्रों ने की थी. शुरुआत में ये प्रदर्शन पूर्व मुक्ति संग्राम सेनानियों के परिवार के सदस्यों के लिए लागू आरक्षण के खिलाफ थे, लेकिन बाद में प्रदर्शनकारियों ने उनके इस्तीफे की मांग शुरू कर दी.
हसीना ने प्रदर्शनों को बलपूर्वक दबाने की कोशिश की. संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, सरकारी कार्रवाई के कारण कम से कम 1,400 लोगों की मौत हुई और हज़ारों लोग घायल हुए. बांग्लादेश के अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण ने उनकी गैरमौजूदगी में मुकदमा चलाया और प्रदर्शनों को दबाने की कोशिश के दौरान राज्य द्वारा किए गए मानवता के खिलाफ अपराधों के लिए नवंबर 2025 में उन्हें मौत की सज़ा सुनाई.
हसीना ने दिप्रिंट से कहा, “राजनीतिक मकसद से चलाए गए एक मामले में, मेरी गैरमौजूदगी में दी गई मौत की सज़ा को न्याय नहीं माना जा सकता. मुझे सामान्य, निष्पक्ष और भरोसेमंद न्यायिक प्रक्रिया के जरिए अपना बचाव करने का सही मौका नहीं दिया गया.”
उन्होंने आगे कहा, “गैरकानूनी अंतरिम सरकार ने व्यवस्था में बदलाव किया, न्यायाधिकरण को फिर से बनाया, राजनीतिक रूप से पक्षपाती अभियोजक और न्यायाधीश नियुक्त किए और एक दिखावटी मुकदमा चलाया, जहां कानूनी सुरक्षा के बुनियादी नियमों को नज़रअंदाज़ किया गया. इसलिए हां, मैं इस फैसले को चुनौती दूंगी. मैं कानून के जरिए इन मामलों का सामना करूंगी, लेकिन कानून का मतलब न्याय होना चाहिए, राजनीतिक बदला नहीं.”
‘बांग्लादेश छोड़कर भारत जाने की योजना नहीं बनाई थी’
शेख हसीना ने कहा कि उन्होंने “बांग्लादेश छोड़कर भारत जाने की योजना नहीं बनाई थी”. उनके मुताबिक, 5 अगस्त 2024 की घटनाओं और “और ज्यादा खून-खराबा रोकने” की उनकी कोशिश के कारण उन्हें नई दिल्ली जाना पड़ा.
हसीना ने कहा, “घटनाएं बहुत तेज़ी से हुईं और पहले से ही खतरनाक स्थिति में मेरी सबसे बड़ी चिंता ज्यादा खून-खराबा रोकना था. मैं इसलिए वापस लौटने की तैयारी नहीं कर रही हूं कि स्थिति आसान हो गई है. मैं इसलिए लौटने की तैयारी कर रही हूं क्योंकि बांग्लादेश को डर, बदले और अस्थिरता के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता. सवाल यह है कि क्या बांग्लादेश अपना लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्ष चरित्र, कानून-व्यवस्था, अर्थव्यवस्था और भविष्य वापस पा सकता है.”
उन्होंने आगे कहा, “सुरक्षा की स्थिति में सुधार नहीं हुआ है. कई मामलों में यह और खराब हुई है. कानून-व्यवस्था कमजोर हुई है, कट्टरपंथी समूहों का हौसला बढ़ा है, अल्पसंख्यक खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं और अवामी लीग के नेता और कार्यकर्ता लगातार उत्पीड़न का सामना कर रहे हैं.”
पूर्व प्रधानमंत्री का भारत में लगातार रहना और उनके सार्वजनिक बयान ढाका में नाराज़गी पैदा कर रहे हैं. भारत और बांग्लादेश के रिश्ते, जो पिछले छह महीनों में धीरे-धीरे बेहतर हो रहे थे, 5 अगस्त को नई दिल्ली में उनकी प्रेस कॉन्फ्रेंस से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं.
प्रधानमंत्री तारिक रहमान के अगस्त या सितंबर में भारत आने की उम्मीद थी, लेकिन ऐसा लगता है कि यह दौरा अनिश्चित समय के लिए टाल दिया गया है. ढाका का कहना है कि हसीना की वापसी किसी भी भविष्य की यात्रा के लिए ज़रूरी शर्त है.
हसीना ने यूनुस को ‘कठपुतली’ कहने से सावधान किया
हसीना ने यूनुस को “कठपुतली” कहने से सावधान किया. उन्होंने इस शब्द को “सरल” बताया और कहा कि इससे ज्यादा खतरनाक सच्चाई सामने नहीं आती. उनके मुताबिक, यूनुस “बांग्लादेश को नुकसान पहुंचाने वाली एक राजनीतिक योजना का फायदा उठाने वाले और उसमें सक्रिय रूप से शामिल दोनों थे.”
शेख हसीना ने कहा, “उनके शासन में बांग्लादेश को आतंकवादियों और उग्रवादियों के शासन की तरफ धकेला गया. कट्टरपंथी ताकतों को फिर से जगह मिली. मुक्ति संग्राम विरोधी ताकतों का हौसला बढ़ा. देश की धर्मनिरपेक्ष नींव पर हमला किया गया. अल्पसंख्यक, सांस्कृतिक कार्यकर्ता, पत्रकार और मुक्ति संग्राम के समर्थक नागरिक असुरक्षित हो गए.”
पूर्व प्रधानमंत्री ने आगे कहा, “उनके शासन से किसे फायदा हुआ? उन लोगों को जो अवामी लीग को राजनीति से हटाना चाहते थे. उन लोगों को जो मुक्ति संग्राम की भावना को कमजोर करना चाहते थे. उन लोगों को जो कट्टरपंथी ताकतों को फिर से जगह दिलाना चाहते थे. उन लोगों को जो बांग्लादेश को अस्थिर, दूसरों पर निर्भर और आसानी से प्रभावित होने वाला बनाना चाहते थे.”
जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें लगता है कि जिन प्रदर्शनों के बाद उन्हें सत्ता से हटना पड़ा, उन्हें बाहरी एजेंसियों का समर्थन था, तो हसीना ने कहा कि “पूरे जवाब के लिए एक भरोसेमंद और स्वतंत्र जांच ज़रूरी है.”
उन्होंने कहा, “लेकिन तरीका साफ है. जो शुरुआत में आरक्षण में सुधार का मुद्दा था, उसे चुनी हुई सरकार को हटाने के एकमात्र अभियान में बदल दिया गया. हिंसा एक साथ और योजनाबद्ध तरीके से फैल गई. पुलिस स्टेशनों, सरकारी ढांचे, मीडिया संस्थानों, सरकारी दफ्तरों और देश के विकास से जुड़े प्रतीकों को निशाना बनाया गया. हथियार लूटे गए. जेलों पर हमला किया गया. आतंकवादी भाग निकले. प्रचार बहुत तेज़ी और एक तय तरीके से फैलाया गया.”
उन्होंने आगे कहा, “मुहम्मद यूनुस ने खुद इस आंदोलन को ‘बहुत सोच-समझकर तैयार किया गया’ बताया था और एक ‘मुख्य साजिशकर्ता’ की बात की थी. यह पूरी तरह अचानक हुआ प्रदर्शन नहीं था. उस अभियान से कई ताकतों को फायदा हुआ: विपक्षी राजनीतिक ताकतों, कट्टरपंथी समूहों, उग्रवादी नेटवर्कों, उन लोगों को जो अवामी लीग को खत्म करना चाहते थे और उन बाहरी ताकतों को जो कमजोर, बंटा हुआ और अस्थिर बांग्लादेश चाहती हैं.”
पूर्व प्रधानमंत्री का अब भी मानना है कि भारत और म्यांमार के बीच बांग्लादेश की रणनीतिक स्थिति को देखते हुए, स्थिर ढाका “भू-राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है.”
उन्होंने कहा, “इसीलिए पूरी सच्चाई की जांच होनी चाहिए. लोगों को यह जानने का अधिकार है कि हिंसा की योजना किसने बनाई, इसके लिए पैसे किसने दिए, इसे किसने बढ़ावा दिया और किसने इसकी रक्षा की.”
अंतरिम सरकार ने अगस्त 2024 के बीच में हसीना की सरकार की जगह सत्ता संभाली थी. फरवरी 2026 तक यूनुस सरकार चला रहे थे. इसके बाद आम चुनाव हुए, जिसमें तारिक रहमान और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) सत्ता में आई.
हसीना की BNP को चुनौती
शेख हसीना ने फरवरी में हुए चुनाव के नतीजों को साफ तौर पर खारिज कर दिया. उन्होंने कहा कि यह चुनाव न तो स्वतंत्र, निष्पक्ष, सभी को शामिल करने वाला और न ही भरोसेमंद था. उन्होंने आम चुनाव में अवामी लीग के हिस्सा लेने पर लगी रोक का ज़िक्र करते हुए कहा कि इससे मतदाताओं को “वास्तविक विकल्प नहीं मिला.”
हसीना ने कहा, “मैं फरवरी के चुनाव को स्वतंत्र, निष्पक्ष, सभी को शामिल करने वाला, भरोसेमंद और लोकतांत्रिक चुनाव नहीं मानती. देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टियों में से एक पर प्रतिबंध लगाने के बाद हुआ चुनाव जनता की इच्छा को ज़ाहिर नहीं कर सकता…अगर बीएनपी को सच में लगता है कि उसे जनता का समर्थन मिला है, तो प्रतिबंध हटाए, राजनीतिक कैदियों को रिहा करे, झूठे मामलों को वापस ले और सभी को शामिल करके चुनाव कराए. लोगों को आज़ादी से फैसला करने दें. यही एक ऐसा नतीजा होगा जिसे लोकतांत्रिक मान्यता मिल सकती है.”
हालांकि, इस बयान में कुछ हद तक अवामी लीग के अपने उस रिकॉर्ड की बात छिप जाती है, जिसमें उसने ऐसे चुनाव कराए हैं जिन्हें अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं माना था. जनवरी 2024 में हसीना ने जो आखिरी चुनाव जीता था, उसकी अमेरिका समेत कई देशों ने आलोचना की थी और कहा था कि यह अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरा नहीं उतरता.
हसीना ने मई 2025 के उस दिन को “लोकतंत्र के लिए काला दिन” बताया, जब यूनुस सरकार ने आतंकवाद विरोधी कानून के तहत अवामी लीग को किसी भी राजनीतिक या साइबर गतिविधि को करने से रोक दिया था.
‘स्थिर रिश्ते भारत पर कोई एहसान नहीं’
हसीना को अब भी भारत-बांग्लादेश के रिश्ते लंबे समय तक बने रहने की उम्मीद है.
उन्होंने कहा कि यह रिश्ता “किसी एक सरकार या किसी एक समय के तनाव पर आधारित नहीं है. इसकी जड़ें इतिहास, भूगोल, मुक्ति संग्राम, सुरक्षा, व्यापार, नदियों, संस्कृति और सीमा के दोनों तरफ रहने वाले लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी में हैं.”
हसीना ने कहा, “भारत के साथ स्थिर रिश्ता भारत पर कोई एहसान नहीं है. यह बांग्लादेश के अपने राष्ट्रीय हित में है. भारत हमारा सबसे बड़ा पड़ोसी है. हमारी नदियां, सीमाएं, बाजार, ऊर्जा सहयोग और सुरक्षा से जुड़ी चिंताएं एक-दूसरे से बहुत गहराई से जुड़ी हैं. ढाका में जिम्मेदार नेतृत्व को इस रिश्ते को नारेबाजी या दुश्मनी के बजाय समझदारी और भरोसे के साथ संभालना चाहिए.”
उन्होंने आगे कहा, “प्रवास के मामले में भी मैं यही तरीका अपनाऊंगी: मिलकर पहचान की जांच करना, अधिकारियों के बीच लगातार बातचीत, मानव तस्करी करने वाले नेटवर्क और फर्जी दस्तावेजों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और सीमा पर काम करने वाली एजेंसियों के बीच व्यावहारिक सहयोग.”
पूर्व प्रधानमंत्री ने कहा कि अवैध प्रवास से जुड़े मुद्दों को “शांतिपूर्वक, कानूनी तरीके से और जिम्मेदारी के साथ” सुलझाया जाना चाहिए.
भारत लगातार अवैध प्रवास का मुद्दा उठाता रहा है, जबकि बांग्लादेश ने नागरिकता की पहचान की जांच में आने वाली मुश्किलों की ओर इशारा किया है.
दोनों देशों के बीच कई सालों से कांसुलर बातचीत नहीं हुई है. शेख हसीना के सत्ता में रहने के दौरान भी ऐसी बातचीत नहीं हुई थी.
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