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Wednesday, 2 September, 2026
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पाकिस्तान में 125 साल पुराना हिंदू मंदिर ‘ढहाया’, सरकार ने कहा—भारी बारिश से उसका एक हिस्सा गिरा

इससे पहले जुलाई में फारूकाबाद में 125 साल पुराना एक गुरुद्वारा ढहा दिया गया था. नई दिल्ली ने इस घटना को ‘बेहद निंदनीय’ बताया था और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के मामले में पाकिस्तान के रिकॉर्ड की आलोचना की थी.

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नई दिल्ली: पाकिस्तान में पिछले हफ्ते पंजाब में 125 साल पुराने एक हिंदू मंदिर को कथित तौर पर ढहा दिया गया, ताकि वहां एक मदरसे के लिए जगह बनाई जा सके. अब इस ‘तोड़फोड़’ को लेकर अल्पसंख्यक अधिकार संगठन और धार्मिक संपत्तियों का प्रबंधन करने वाली सरकारी संस्था के बीच विवाद शुरू हो गया है. अल्पसंख्यक समूह के विरोध के बीच सरकार ने साफ किया कि मंदिर का सिर्फ एक हिस्सा टूटा था और वह भी भारी बारिश की वजह से.

अल्पसंख्यक अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठन पाकिस्तान मसीहा मिल्लत पार्टी के मुताबिक, नरोवाल जिले के सिराज गांव में स्थित इस मंदिर को 21 अगस्त को ढहा दिया गया था. हालांकि, संगठन ने दावा किया कि मंदिर के पास स्थित एक धार्मिक स्कूल के विस्तार के लिए इस इमारत को जानबूझकर तोड़ा गया था. डॉन अखबार ने यह खबर दी.

पाकिस्तान में हिंदू और सिख धार्मिक संपत्तियों की देखरेख करने वाले इवैक्यूई ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड (ETPB) ने इस दावे को खारिज किया. एक अधिकारी ने कहा कि मंदिर को ढहाया नहीं गया, बल्कि तेज़ बारिश के बाद वह गिर गया.

डॉन की रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए पाकिस्तान पंजाब सरकार ने एक स्पष्टीकरण जारी किया. इसमें कहा गया कि मंदिर बारिश में गिर गया था और उसे ढहाया नहीं गया. बयान में कहा गया, “डॉन के दावे के उलट, मंदिर के पास की ज़मीन एक धार्मिक स्कूल को लीज पर दी गई थी, लेकिन मंदिर की अपनी ज़मीन कभी किसी को लीज पर नहीं दी गई.”

बयान में आगे कहा गया, “अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री सरदार रमेश सिंह अरोड़ा ने भी हिंदू मंदिर की जगह का दौरा किया और पाया कि तेज़ बारिश के कारण मंदिर के निशान का सिर्फ एक हिस्सा गिरा है, जिसे सरकार ने फिर से ठीक कराने का वादा किया है.”

अल्पसंख्यक अधिकार समूह के अध्यक्ष असलम परवेज साहोत्रा ने डॉन की रिपोर्ट में कहा कि कुछ लोगों ने इस इमारत को तोड़ा और वहां से ईंटें, गुंबद में लगे धातु के सामान और दूसरी चीज़ें हटा लीं.

साहोत्रा ने आगे कहा कि उन्होंने और स्थानीय लोगों ने 28 अगस्त को पंजाब के अतिरिक्त गृह सचिव से मुलाकात की और एक लिखित शिकायत दी. उन्होंने कथित तौर पर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की. साथ ही उन अधिकारियों के खिलाफ भी कार्रवाई की मांग की गई, जिन पर धार्मिक स्थल की सुरक्षा न करने का आरोप है.

यह विवाद मंदिर के आसपास की जमीन के मालिकाना हक और इस्तेमाल से भी जुड़ा हुआ है. साहोत्रा ने कहा कि ETPB ने पहले मंदिर के पास की संपत्ति एक धार्मिक स्कूल को लीज पर दी थी, लेकिन कई साल तक किराया नहीं देने और जमीन का बताए गए उद्देश्य के लिए इस्तेमाल नहीं करने के बाद लीज रद्द कर दी गई.

साहोत्रा के मुताबिक, इसके बाद संपत्ति के कुछ हिस्सों पर गैरकानूनी तरीके से कब्जा कर लिया गया. उनके संगठन ने मंदिर को उसके पुराने रूप में फिर से बनाने की मांग की है. संगठन ने पंजाब सरकार से हिंदू मंदिरों, सिख गुरुद्वारों और ईसाई चर्चों के साथ-साथ उनसे जुड़ी संपत्तियों की सुरक्षा मजबूत करने की भी मांग की है.

ETPB के अधिकारी इफ्तिखार राणा ने मंदिर को ढहाए जाने के आरोप को खारिज कर दिया.

डॉन से बात करते हुए राणा ने कहा कि यह इमारत भारी बारिश के बाद गिर गई थी. उन्होंने माना कि मंदिर बहुत पुराना था, लेकिन कहा कि ETPB के रिकॉर्ड में इसका कोई औपचारिक नाम दर्ज नहीं था.

उन्होंने यह भी पुष्टि की कि मंदिर के पास की जमीन एक धार्मिक स्कूल को लीज पर दी गई थी. हालांकि, उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि मंदिर की अपनी संपत्ति किसी को लीज पर नहीं दी गई थी.

इससे पहले जुलाई में फारूकाबाद में 125 साल पुराने एक गुरुद्वारे, श्री गुरु सिंह सभा साहिब, को ढहा दिया गया था. नई दिल्ली ने इस घटना को “बेहद निंदनीय” बताया था और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के मामले में पाकिस्तान के रिकॉर्ड की आलोचना की थी.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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