नई दिल्ली: भारतीय कंपनियों की ओर से प्रायोजित कर्मचारियों के लिए स्थायी श्रम प्रमाणन कार्यक्रम (Permanent Labour Certification Program) के नए और पहले से लंबित आवेदनों पर रोक लगाने के अमेरिकी श्रम विभाग के फैसले पर भारत ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है. विदेश मंत्रालय (MEA) ने शुक्रवार को एक बयान में कहा कि ये कदम “दोनों देशों की साझा महत्वाकांक्षाओं को आगे नहीं बढ़ाते हैं”.
मंत्रालय ने अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की टिप्पणियों का भी जवाब दिया और उन्हें “बिना किसी वजह के की गई और बेहद अपमानजनक” टिप्पणियां बताया. वेंस ने इस रोक का ऐलान करते समय माइक्रोसॉफ्ट को निशाना बनाया था. उन्होंने कहा था कि कंपनी को विदेशी कर्मचारियों की जगह “बंधुआ विदेशी मजदूरों” को रखने के बजाय “बेहतरीन अमेरिकी कर्मचारियों” को नौकरी देनी चाहिए.
बयान में कहा गया, “अमेरिका का इतिहास भी पीढ़ियों से आए प्रवासियों ने बनाया है. उनके श्रम, कारोबार और नए विचारों ने देश की तरक्की और खुशहाली में योगदान दिया है. ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करना, जिनका संबंध इतिहास के दर्दनाक दौर और औपनिवेशिक विरासत से है, बेहद अपमानजनक है.”
अमेरिकी श्रम विभाग ने गुरुवार को ऐलान किया कि वह स्थायी श्रम प्रमाणन कार्यक्रम के तहत नए और पहले से लंबित आवेदनों पर कार्रवाई रोक देगा. इस कार्यक्रम को PERM के नाम से जाना जाता है. ये आवेदन भारतीय आईटी कंपनियों इंफोसिस, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS), विप्रो, एचसीएल और कॉग्निजेंट के साथ-साथ फ्रांस की कंपनी कैपजेमिनी और अमेरिका की कंपनियों माइक्रोसॉफ्ट और एडोबी की ओर से प्रायोजित कर्मचारियों के लिए थे. विभाग ने इन कंपनियों पर भर्ती में धोखाधड़ी करने का आरोप लगाया है.
कई कुशल विदेशी कर्मचारियों के लिए PERM ग्रीन कार्ड पाने की दिशा में एक अहम कदम है. रोजगार के आधार पर मिलने वाले ज्यादातर ग्रीन कार्ड के लिए किसी कर्मचारी को प्रायोजित करने से पहले कंपनी को श्रम विभाग से प्रमाणन लेना होता है. इसमें विभाग यह प्रमाणित करता है कि संबंधित नौकरी के लिए कोई योग्य अमेरिकी कर्मचारी “काम करने में सक्षम, इच्छुक, योग्य और उपलब्ध” नहीं है.
Statement on announcement made by the US Department of Labour ⬇️
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— Randhir Jaiswal (@MEAIndia) October 9, 2026
विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में PERM और H-1B कार्यक्रम के बीच अंतर भी बताया. मंत्रालय ने कहा कि PERM आवेदनों पर रोक लगाने से अपने आप मौजूदा H-1B वीजा की वैधता या वीजा धारकों और उनके परिवार के सदस्यों की स्थिति पर कोई असर नहीं पड़ता. हालांकि, इससे प्रभावित कंपनियों के उन कर्मचारियों के लिए ग्रीन कार्ड मिलने की प्रक्रिया धीमी हो सकती है, जो इसके लिए योग्य हैं.
मंत्रालय ने यह भी कहा कि कुशल कर्मचारियों का आना-जाना भारत जितना ही अमेरिका के लिए भी फायदेमंद है. इससे अमेरिकी कंपनियों को प्रतिभाशाली कर्मचारी, नए विचार, शोध करने की क्षमता और काम की बेहतर उत्पादकता मिलती है. इससे शेयरधारकों की संपत्ति भी बढ़ती है. बयान में कहा गया, “इसलिए यह ऐसा क्षेत्र है, जिससे दोनों देशों को बहुत फायदा होता है.”
‘सांप का सिर काटना’
वेंस ने इस व्यवस्था को एक ऐसी प्रक्रिया बताया, जिसके जरिए विदेशी कर्मचारी अमेरिका आते हैं और फिर वहां लंबे समय तक रह सकते हैं. उन्होंने कहा कि H-1B वीजा के जरिए कर्मचारी देश में आते हैं और PERM “वह तरीका है, जिससे ये कर्मचारी वहां बने रहते हैं”. वेंस के मुताबिक, H-1B वीजा को दो-तीन बार रिन्यू कराने के बाद कंपनियां PERM के लिए आवेदन करती हैं. इससे ग्रीन कार्ड मिल सकता है और कर्मचारी अनिश्चित समय तक अमेरिका में रह सकते हैं.
वेंस ने कहा, “H-1B वीजा कार्यक्रम का मकसद कंपनियों को अमेरिका के बाहर से सबसे बेहतरीन लोगों को लाने की अनुमति देना है.” उन्होंने आगे कहा कि इस व्यवस्था में “बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी होने लगी है”.
उन्होंने खास तौर पर माइक्रोसॉफ्ट का नाम लिया और कहा कि किसी दूसरी कंपनी ने इस व्यवस्था का इतना ज्यादा गलत इस्तेमाल नहीं किया है. वेंस के मुताबिक, कंपनी ने पिछले साल 6,000 अमेरिकी कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया था, जबकि उसे 6,300 H-1B वीजा और करीब 3,000 ग्रीन कार्ड का फायदा मिला. वेंस ने कहा, “आप एक बेहतरीन अमेरिकी कंपनी हैं, लेकिन आपको बेहतरीन अमेरिकी कर्मचारियों को नौकरी देनी होगी.”
श्रम सचिव कीथ सोंडरलिंग ने कहा कि 2009 से अब तक इन कंपनियों को करीब 2,30,000 H-1B वीजा और 1,00,000 से ज्यादा स्थायी श्रम प्रमाणन मिले हैं. उन्होंने कहा कि ये ऐसी नौकरियां थीं, जिन्हें “अमेरिकी कर्मचारियों से छीन लिया गया” और प्रशासन अब “सांप का सिर काट रहा है”.
अमेरिका का यह कदम ट्रंप प्रशासन की उस कोशिश का नया हिस्सा है, जो पिछले एक साल से H-1B व्यवस्था पर रोक लगाने और ज्यादा कुशल विदेशी कर्मचारियों के आने को कम करने के लिए की जा रही है.
इस कार्यक्रम का सबसे ज्यादा फायदा भारतीय नागरिकों को मिला है. 2024 में जारी किए गए H-1B वीजा में से 71 प्रतिशत तक भारतीयों को मिले थे. उसी साल अमेरिका में भारतीय समुदाय की आबादी करीब 32 लाख थी. इस तरह भारतीय समुदाय अमेरिका में प्रवासियों का दूसरा सबसे बड़ा समूह था. पिछले साल अमेरिकी प्रशासन ने H-1B वीजा आवेदनों पर 1,00,000 डॉलर का शुल्क लगा दिया था. हालांकि, अदालतों ने आगे की कानूनी समीक्षा होने तक इस फैसले पर रोक लगा दी है.
वेंस की टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया देते हुए विदेश मंत्रालय ने कहा कि अमेरिका में काम करने वाले भारतीय पेशेवर अच्छी शिक्षा हासिल किए हुए हैं और अमेरिकी अर्थव्यवस्था तथा नए आविष्कारों से जुड़े क्षेत्र में योगदान देते हैं. मंत्रालय ने कहा कि अमेरिका का इतिहास “पीढ़ियों से आए प्रवासियों ने बनाया है”.
बयान में कहा गया, “हमारा मानना है कि इस तरह के बयान बिना किसी वजह के दिए गए हैं और इस बात को नजरअंदाज करते हैं कि अमेरिका में भारतीय पेशेवर अच्छी शिक्षा हासिल किए हुए और कुशल लोग हैं, जो वहां की अर्थव्यवस्था और नए आविष्कारों से जुड़े क्षेत्र में योगदान देते हैं.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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