नई दिल्ली: चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग शनिवार सुबह BRICS नेताओं के शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए नई दिल्ली पहुंचेंगे. दिप्रिंट को यह जानकारी मिली है. उनके साथ अधिकारियों और कारोबारी नेताओं का एक बड़ा प्रतिनिधिमंडल भी होगा.
शी शिखर सम्मेलन में शामिल होंगे और रविवार सुबह रवाना होने से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ द्विपक्षीय बैठक भी करेंगे.
सरकारी सूत्रों ने कहा कि शी की यात्रा की तैयारियां पूरी हो चुकी हैं. हालांकि, चीनी विदेश मंत्रालय ने गुरुवार को कहा कि उसे शी की प्रस्तावित भारत यात्रा के बारे में कोई आधिकारिक जानकारी नहीं मिली है.
सूत्रों ने कहा कि बीजिंग के पास औपचारिक घोषणा करने के लिए अभी समय है और चीनी पक्ष यात्रा कार्यक्रम को अंतिम रूप दे रहा है.
सूत्रों ने बताया कि चीनी दूतावास ने शी की यात्रा के लिए चाणक्यपुरी के राजनयिक इलाके के पास एक पांच सितारा होटल में भी इंतजाम किए हैं.
यह सात साल में शी की पहली भारत यात्रा होगी. यह यात्रा ऐसे समय हो रही है जब 2020 में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर तनाव बढ़ने के बाद दोनों देशों के रिश्तों में धीरे-धीरे सुधार आया है.
सूत्रों ने कहा कि द्विपक्षीय बैठक भारत मंडपम में होने की संभावना है, जहां BRICS शिखर सम्मेलन होना है. इसके बजाय बैठक हैदराबाद हाउस में हो सकती है. सूत्रों के मुताबिक, इससे शिखर सम्मेलन स्थल और मध्य दिल्ली के बीच दोनों नेताओं को लाने-ले जाने में लगने वाला अतिरिक्त समय बचेगा.
शी की प्रस्तावित यात्रा ऐसे समय हो रही है जब भारत और चीन रिश्तों को स्थिर करने की कोशिश कर रहे हैं. साथ ही, दोनों देश सीमा, व्यापार और बाजार तक पहुंच को लेकर जारी मतभेदों से भी निपट रहे हैं.
बड़ा चीनी प्रतिनिधिमंडल, आर्थिक मुद्दों पर जोर
शी के साथ सरकार के अधिकारियों और कारोबारी नेताओं का एक बड़ा प्रतिनिधिमंडल आने की उम्मीद है. इससे भारत के साथ आर्थिक संबंधों को और मजबूत करने में बीजिंग की दिलचस्पी दिखाई देती है.
आर्थिक पहलू इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि नई दिल्ली ने इस साल चीनी निवेश पर लगी कुछ पाबंदियों को चुनिंदा तौर पर कम करने के लिए कई कदम उठाए हैं. हालांकि, चीनी कंपनियों की सुरक्षा जांच अभी भी सख्त है.
इस साल मार्च में मोदी सरकार ने भारत के साथ जमीन की सीमा साझा करने वाले देशों, जिनमें चीन भी शामिल है, से कुछ अल्पसंख्यक निवेश के लिए नियमों में ढील को मंजूरी दी थी. इन बदलावों का मकसद निवेश को आसान बनाना था, लेकिन भारतीय कंपनियों पर चीनी नियंत्रण रोकने के लिए सुरक्षा उपाय बनाए रखे गए.
यह अप्रैल 2020 में उठाए गए उस कदम में ढील देने की कोशिश थी, जिसके तहत भारत ने अपनी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नीति में बदलाव किया था. इसके तहत भारत के साथ जमीन की सीमा साझा करने वाले देशों से होने वाले निवेश के लिए पहले से सरकारी मंजूरी लेना जरूरी कर दिया गया था.
मार्च में बदलाव के बाद से अलग-अलग क्षेत्रों में कई ऐसे कदम उठाए गए हैं.
जून में सरकार ने भारत में मैन्युफैक्चरिंग का काम कर रही चीन से जुड़ी चार पावर-इक्विपमेंट कंपनियों को महत्वपूर्ण बिजली परियोजनाओं के लिए सरकारी टेंडर में हिस्सा लेने की अनुमति दी. यह छूट दो साल के लिए दी गई है.इसमें TBEA एनर्जी, नानजिंग इलेक्ट्रिक इंडिया, न्यू नॉर्थईस्ट इलेक्ट्रिक इंडिया और ताइकाई इलेक्ट्रिक (इंडिया) शामिल हैं.
एक और महत्वपूर्ण घटनाक्रम भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी डिक्सन टेक्नोलॉजीज और चीनी स्मार्टफोन कंपनी Vivo के बीच मैन्युफैक्चरिंग साझेदारी को मिली सरकारी मंजूरी है.
यह कदम इसलिए खास है क्योंकि इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग उन क्षेत्रों में से एक है, जहां भारत घरेलू उत्पादन बढ़ाना चाहता है. लेकिन तकनीक, पुर्जों और मैन्युफैक्चरिंग विशेषज्ञता के लिए वह अभी भी चीनी कंपनियों और सप्लाई चेन पर निर्भर है.
लेकिन यह छूट हर क्षेत्र में नहीं दी गई है.
रॉयटर्स के मुताबिक, भारत ने Ant Group के मालिकाना हक वाली Alipay के भारत के डिजिटल पेमेंट सिस्टम से जुड़ने के प्रस्ताव को सुरक्षा चिंताओं के चलते खारिज कर दिया है.
बुधवार को सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन ऑफिस ने Xiaomi के भारत में कारोबार की विस्तृत जांच की सिफारिश की. इसमें पैसों के लेन-देन और विदेशी निवेश से जुड़े नियमों के पालन की जांच भी शामिल है.
सूत्रों ने बताया कि भारत अब चीनी निवेश पर पूरी तरह रोक लगाने की नीति से हटकर चीनी पूंजी की जांच उसके मालिकाना हक, क्षेत्र और रणनीतिक महत्व के आधार पर कर रहा है.
इसलिए इलेक्ट्रॉनिक्स और मैन्युफैक्चरिंग में चीनी निवेश आसान हो रहा है और बिजली उपकरण जैसे उन क्षेत्रों में, जहां भारत को क्षमता की कमी का सामना करना पड़ता है, चीनी कंपनियों की भागीदारी को चुनिंदा तौर पर मंजूरी दी जा रही है. लेकिन खासकर रणनीतिक क्षेत्रों में बड़े चीनी नियंत्रण वाले निवेशों की अभी भी कड़ी जांच हो रही है.
गलवान से सावधानी के साथ आर्थिक जुड़ाव तक
शी की यात्रा भारत और चीन के बीच अक्टूबर 2024 में हुए उस समझौते के करीब दो साल बाद होगी, जिसमें पूर्वी लद्दाख में पेट्रोलिंग की व्यवस्था पर सहमति बनी थी. इसके बाद डेपसांग मैदान और चुशुल जैसे बचे हुए टकराव वाले इलाकों से सैनिकों की वापसी हुई थी.
इसके बाद दोनों देशों ने द्विपक्षीय रिश्तों को स्थिर करने के लिए व्यापक प्रयास शुरू किए.
मोदी और शी ने अक्टूबर 2024 में कजान में हुए BRICS शिखर सम्मेलन के दौरान मुलाकात की थी. गलवान झड़प के बाद दोनों नेताओं के बीच यह पहली औपचारिक द्विपक्षीय बैठक थी.
इसके बाद दोनों देशों के बीच उच्च स्तर पर राजनीतिक बातचीत हुई है, सीधी उड़ानें फिर शुरू हुई हैं और वीजा नियमों में भी ढील दी गई है.
हालांकि, सीमा विवाद अभी भी हल नहीं हुआ है और दोनों देश LAC के पास बड़ी संख्या में सैन्य बल तैनात रखे हुए हैं.
इसी बीच, भारत और चीन ने सितंबर के पहले सप्ताह में पूर्वी सेक्टर में कोर कमांडर स्तर की दो दौर की बातचीत की. इसमें सोमवार को हुई बैठक भी शामिल है. यह बातचीत अरुणाचल प्रदेश के तवांग क्षेत्र में लगातार बने तनाव के बीच हुई.
यह पहली बार है जब पूर्वी सेक्टर में कोर कमांडर स्तर की बैठकें हुई हैं. इस तरह की व्यवस्था 2020 में गलवान झड़प के बाद पश्चिमी सेक्टर में शुरू की गई थी.
अब मध्य सेक्टर के लिए भी इसी तरह की व्यवस्था पर सहमति बनी है.
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