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Sunday, 31 May, 2026
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भुला दिया गया अंडमान संकट: 1965 में भारत के खिलाफ क्यों खड़ा हुआ इंडोनेशिया

1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान राष्ट्रपति सुकर्णो के नेतृत्व वाले इंडोनेशिया में कुछ समय के लिए एक असाधारण विचार पर चर्चा हुई थी. यह दावा किया गया कि अंडमान और निकोबार द्वीप समूह सुमात्रा का विस्तार हैं.

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नई दिल्ली: भारत की दूर-दराज दक्षिणी सीमा पर एक बड़ा भू-राजनीतिक विवाद उभर रहा है. 81,000 करोड़ रुपये की ग्रेट निकोबार परियोजना में हिंद महासागर क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव के खिलाफ भारत की सबसे मजबूत सुरक्षा ढाल बनने की क्षमता है.

लेकिन प्रस्तावित परियोजना के भारत की रणनीतिक बहस का केंद्र बनने से करीब छह दशक पहले अंडमान और निकोबार द्वीप समूह को लेकर एक और विवाद हुआ था, जो अब लगभग लोगों की यादों से गायब हो चुका है. 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान, राष्ट्रपति सुकर्णो के नेतृत्व वाले इंडोनेशिया ने कुछ समय के लिए एक असाधारण विचार पर विचार किया था कि अंडमान और निकोबार द्वीप समूह सुमात्रा का विस्तार हैं और इन्हें भारत से छीना जा सकता है.

दो साल पहले, ब्रिटिश सांसद लॉर्ड ओगमोर ने हाउस ऑफ लॉर्ड्स में बहस के दौरान सुकर्णो की तुलना इटली के तानाशाह मुसोलिनी से करते हुए कहा था, “हिंद महासागर को इंडोनेशियाई महासागर कहना उनकी काफी साहसिक बात है.”

इंडोनेशिया की इस धमकी ने भारत के कूटनीतिक और सैन्य प्रतिष्ठान में हलचल मचा दी थी. युद्ध के चरम पर नई दिल्ली को डर था कि चीन-पाकिस्तान-इंडोनेशिया का विरोधी गठजोड़ बंगाल की खाड़ी में दूसरा समुद्री मोर्चा खोल सकता है.

क्या यह अचानक हुआ घटनाक्रम था जिसने भारत को चौंका दिया? या फिर यह उन कई छोटे-छोटे घटनाक्रमों का नतीजा था, जिन्होंने धीरे-धीरे भारत और इंडोनेशिया के रिश्तों को खराब कर दिया था?

आखिर यह वही देश था जो कभी भारत के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा था.

1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान, राष्ट्रपति सुकर्णो के नेतृत्व वाले इंडोनेशिया ने कुछ समय के लिए इस असाधारण विचार पर विचार किया था कि अंडमान और निकोबार द्वीप समूह सुमात्रा का विस्तार हैं और इन्हें भारत से छीना जा सकता है.

19 अगस्त 1946 को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को लिखे एक पत्र में इंडोनेशिया के पहले राष्ट्रपति सुकर्णो ने लिखा था, “आपका देश और आपके लोग हमारे साथ खून और संस्कृति के उन रिश्तों से जुड़े हैं, जो हमारे इतिहास की शुरुआत से मौजूद हैं. ‘इंडिया’ शब्द हमेशा हमारे जीवन का हिस्सा रहेगा क्योंकि यह हमारे देश और हमारी जाति के लिए चुने गए नाम के पहले दो अक्षर हैं. इंडोनेशिया के ‘इंडो’ में वही इंडिया है.”

लेकिन दो दशक से भी कम समय बाद, इंडोनेशिया युद्ध के दौरान पूरी तरह पाकिस्तान के पक्ष में खड़ा हो गया.

जकार्ता की सड़कों पर “भारत मुर्दाबाद, साम्राज्यवादियों के सेवक” और “शास्त्री को मारो” जैसे नारे गूंजने लगे. “खून और संस्कृति के रिश्तों” की भाषा अब कहीं ज्यादा खतरनाक रूप ले चुकी थी. सितंबर 1965 में इंडोनेशिया के विदेश मंत्री सुबंद्रियो ने खुलकर कहा था कि “नई उभरती ताकतों से जुड़े सभी देशों का कर्तव्य है कि वे भारतीय आक्रमण के खिलाफ पाकिस्तान की मदद करें.”

बांडुंग की दोस्ती से कड़वाहट तक

आजादी के बाद एक दशक से ज्यादा समय तक भारत और इंडोनेशिया के बीच बेहद मजबूत संबंध रहे, जो औपनिवेशिक शासन के खिलाफ संघर्ष से बने थे. जब द्वितीय विश्व युद्ध के बाद डच साम्राज्यवादियों ने इंडोनेशिया पर फिर से नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश की, तब भारत जकार्ता का सबसे मजबूत अंतरराष्ट्रीय समर्थक बनकर उभरा. प्रधानमंत्री नेहरू ने कूटनीतिक और अन्य स्तरों पर इंडोनेशिया का समर्थन किया और वैश्विक मंच पर उसकी संप्रभुता की वकालत की.

इंडोनेशिया भी इस समर्थन को नहीं भूला था. डच सरकार द्वारा इंडोनेशिया की संप्रभुता को मान्यता देने के कुछ समय बाद सुकर्णो ने कहा था, “हमारे राष्ट्र के पुनर्जन्म की पूर्व संध्या पर मैं भारत और उसके प्रधानमंत्री के प्रति इंडोनेशियाई जनता की कृतज्ञता को मापने की व्यर्थ कोशिश कर रहा हूं, जिन्होंने अतीत में हमारे संघर्ष के दौरान अडिग और भाईचारे वाला समर्थन दिया.”

इतने अच्छे तालमेल वाले दो देशों के बीच एक दशक के भीतर मतभेद कैसे पैदा हो गए?

1951 तक इस भाईचारे को एक ऐतिहासिक मैत्री संधि के जरिए मजबूत कर दिया गया, जिसमें “स्थायी शांति और अटूट मित्रता” का वादा किया गया था. औपनिवेशिक शासन के ताजा घाव झेल रहे नए स्वतंत्र देशों के रूप में भारत और इंडोनेशिया ने नई विश्व व्यवस्था के निर्माण में अहम भूमिका निभाई. 1955 के बांडुंग सम्मेलन में दोनों देशों ने अफ्रीकी-एशियाई एकजुटता की अगुवाई की. यह भारत-इंडोनेशिया संबंधों का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था, जहां दोनों देशों ने उपनिवेशवाद विरोध, गुटनिरपेक्षता और पश्चिमी सैन्य गुटों के खिलाफ एक मजबूत मोर्चे का समर्थन किया.

ललिता प्रसाद सिंह ने ‘डायनेमिक्स ऑफ इंडियन-इंडोनेशियन रिलेशंस’ नामक लेख में लिखा है, “इंडोनेशिया ने भारत का अनुसरण करते हुए गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाई. बदले में भारत ने इंडोनेशिया को कोलंबो पावर्स (1954) जैसे औपचारिक और अनौपचारिक समूहों से परिचित कराया.”

हालांकि एकजुटता की इस भाषा के पीछे 1950 के दशक के आखिर तक मतभेद उभरने लगे थे.

इतनी अच्छी समझ रखने वाले दो देशों के बीच एक दशक के भीतर मतभेद कैसे पैदा हो गए?

दरार की शुरुआत उसी चीज से हुई जिसने दोनों देशों की दोस्ती को औपचारिक रूप दिया था, यानी बांडुंग सम्मेलन. सुकर्णो की दूसरी बांडुंग सम्मेलन की मांग का नेहरू द्वारा समर्थन न करना इंडोनेशियाई राष्ट्रपति को पसंद नहीं आया. इसके जवाब में सुकर्णो ने गुटनिरपेक्ष दुनिया में नेहरू की प्रमुख भूमिका को चुनौती देना शुरू कर दिया और हर मौके पर उनका विरोध करने लगे. सुकर्णो की सोच क्षेत्रीय और समुद्री महत्वाकांक्षाओं तथा आक्रामक उपनिवेशवाद विरोधी राजनीति से प्रेरित थी. यह नेहरू, यूगोस्लाविया के जोसिप ब्रोज टीटो और मिस्र के गमाल अब्देल नासिर की अपेक्षाकृत सतर्क कूटनीति से बिल्कुल अलग थी.

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में इंडोनेशियाई अध्ययन के सहायक प्रोफेसर गौतम कुमार झा ने कहा, “1960 के दशक की शुरुआत तक सुकर्णो इंडोनेशिया में बढ़ते घरेलू असंतोष का सामना कर रहे थे. अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में थी, महंगाई तेजी से बढ़ रही थी और खाद्य संकट के कारण व्यापक अशांति फैल गई थी.”

सुकर्णो क्षेत्रीय और समुद्री महत्वाकांक्षाओं तथा आक्रामक उपनिवेशवाद विरोधी राजनीति से प्रेरित थे, जो नेहरू की अधिक सतर्क कूटनीति से बिल्कुल अलग थी.

देश के भीतर बढ़ते संकट ने सुकर्णो को और भी महत्वाकांक्षी राजनीतिक प्रयोगों की ओर धकेल दिया.

झा ने कहा, “सत्ता बनाए रखने की कोशिश में सुकर्णो ने ‘गाइडेड डेमोक्रेसी’ मॉडल और ‘नसाकोम’ सिद्धांत को आगे बढ़ाया. इसके जरिए उन्होंने धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवादियों, इंडोनेशियाई कम्युनिस्ट पार्टी (PKI) और राजनीतिक इस्लामी ताकतों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की. लेकिन यह दांव पूरी तरह विफल रहा और अंततः उनकी सरकार का पतन हो गया.”

एक दशक से थोड़ा अधिक समय में एशिया की सबसे करीबी उपनिवेशोत्तर साझेदारियों में से एक कमजोर पड़ने लगी थी. हालांकि अंतिम झटका कहीं और से आने वाला था.

जकार्ता में पाकिस्तान की एंट्री

एशियाई खेलों से जुड़े विवाद और मलेशिया के मुद्दे पर नई दिल्ली के समर्थन के बाद इंडोनेशिया में भारत-विरोधी भावना पहले से ही काफी बढ़ चुकी थी. जकार्ता में भारत की स्थिति कमजोर पड़ रही थी, तभी पाकिस्तान ने बड़ी चतुराई से मौके का फायदा उठाया. उसने अपनी विदेश नीति में बदलाव किया, पश्चिमी देशों पर अपनी ज्यादा निर्भरता कम की और चीन सहित एशियाई-अफ्रीकी देशों के साथ अपने रिश्ते मजबूत किए.

बी.डी. अरोड़ा ने अपने शोधपत्र Pakistan’s Role in India-Indonesia Relations During the Soekarno Era में लिखा है कि सुकर्णो के “न्यू इमर्जिंग फोर्सेज (NEFO) बनाम ओल्ड एस्टैब्लिश्ड फोर्सेज (OLDEFO)” के सिद्धांत को देखते हुए पाकिस्तान ने उन्हें वही दिया जो भारत ने नहीं दिया था. पाकिस्तान ने दूसरे बांडुंग सम्मेलन की इंडोनेशिया की मांग का पूरा समर्थन किया और वेस्ट इरियन मुद्दे तथा “क्रश मलेशिया” अभियान में भी उसका बिना शर्त साथ दिया.

जकार्ता स्थित सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज (CSIS) के शोधकर्ता मुहम्मद वफ़ा खारिस्मा ने कहा, “इंडोनेशिया में पाकिस्तान को एक ऐसे देश के रूप में देखा जाता था जो इंडोनेशिया की चिंताओं को ज्यादा समझता था और उन पर ध्यान देता था. वेस्ट इरियन और कोनफ्रोन्टासी जैसे मुद्दों पर पाकिस्तान के बिना शर्त नैतिक और भौतिक समर्थन का जकार्ता में गहरा असर पड़ा.”

उन्होंने कहा, “दूसरी ओर, कोनफ्रोन्टासी के दौर में भारत को ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के साथ खड़ा माना जाने लगा. इससे इंडोनेशिया के कुछ प्रभावशाली वर्ग नई दिल्ली को ‘NECOLIM शक्तियों का सहयोगी’ मानने लगे.” हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि “ऐसी सोच मुख्य रूप से 1950 और 1960 के दशक की भू-राजनीतिक परिस्थितियों का परिणाम थी और आज के इंडोनेशिया में इसका बहुत कम असर है, जहां भारत के साथ संबंध पिछले कई दशकों में सबसे मजबूत स्थिति में हैं.”

पाकिस्तानी अखबारों, खासकर Dawn, ने सुकर्णो को “औपनिवेशिक शासन के खिलाफ लड़ने वाला क्रांतिकारी नेता” बताया, जबकि भारत को एक विस्तारवादी और “नव-साम्राज्यवादी” शक्ति के रूप में पेश किया, जो छोटे पड़ोसी देशों पर दबाव डाल रही थी.

गौतम कुमार झा भी इससे सहमत हैं कि दो कारणों ने दोनों देशों के बीच अविश्वास की खाई को और चौड़ा किया. उन्होंने कहा, “सितंबर 1963 में सिंगापुर, सारावाक और सबाह को शामिल कर मलेशिया महासंघ के गठन के लिए नई दिल्ली का समर्थन और पाकिस्तानी मीडिया के जरिए लगातार फैलाया गया भारत-विरोधी प्रचार.” इसका नतीजा यह हुआ कि हजारों प्रदर्शनकारियों ने भारतीय दूतावास पर पथराव किया और बैनर लहराए जिन पर लिखा था, “भारत और मलेशिया NECOLIM के जुड़वां भाई हैं.”

पाकिस्तानी अखबारों, खासकर Dawn, ने सुकर्णो को “औपनिवेशिक शासन के खिलाफ लड़ने वाला क्रांतिकारी नेता” बताया, जबकि भारत को एक विस्तारवादी और “नव-साम्राज्यवादी” शक्ति के रूप में पेश किया, जो छोटे पड़ोसी देशों पर दबाव डाल रही थी.

झा ने कहा, “आज की तरह उस समय भी पाकिस्तानी प्रेस ने भारत के खिलाफ माहौल बनाने में अहम भूमिका निभाई. लगातार भारत-विरोधी खबरों और खुलकर इंडोनेशिया समर्थक रुख के जरिए पाकिस्तानी मीडिया ने इंडोनेशियाई लोगों की नजर में पाकिस्तान की छवि मजबूत कर दी.”

इंडोनेशिया-पाकिस्तान संबंधों में एक बड़ा मोड़ अप्रैल 1964 में आया, जब एक संयुक्त बयान में जकार्ता ने कश्मीर मुद्दे पर अपनी पहले की तटस्थ स्थिति छोड़ दी. अरोड़ा के अनुसार, बयान में कहा गया कि “संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों और राज्य की जनता की इच्छा के अनुसार इस विवाद का जल्द समाधान होना चाहिए.”

इंडोनेशियाई लोगों के दिल और दिमाग में पाकिस्तान ने जो जगह बनाई थी, उसका फायदा उसे भारत के साथ युद्ध होने पर मिला.

जकार्ता भारत के खिलाफ हो गया

भारत में वर्ष 1965 को मुख्य रूप से पाकिस्तान के साथ युद्ध के लिए याद किया जाता है. लेकिन लोगों की यादों से यह बात लगभग गायब हो चुकी है कि उसी समय इंडोनेशिया में भी भारत-विरोधी गुस्सा चरम पर था.

इंडोनेशिया के हजारों युवा और 1926 में स्थापित दुनिया के सबसे बड़े इस्लामी संगठन नहदतुल उलमा (Nahdlatul Ulama) के छात्र सड़कों पर उतर आए. वे ऐसे बैनर लेकर चल रहे थे जिन पर लिखा था, “भारतीय साम्राज्यवादियों का नाश हो”, “भारत वापस जाओ” और “भारत को कुचल दो”. तब तक इंडोनेशिया पूरी तरह पाकिस्तान के पक्ष में आ चुका था. जकार्ता में हिंसक प्रदर्शन शुरू हो गए. भारतीय दुकानों और रेस्तरां को लूटा गया, जिससे नई दिल्ली में गहरा गुस्सा और नाराजगी फैल गई.

करीब 4,000 प्रदर्शनकारियों ने जकार्ता स्थित भारतीय दूतावास पर हमला कर दिया. उन्होंने फर्नीचर तोड़ दिया, खिड़कियां चकनाचूर कर दीं और भारतीय राष्ट्रीय ध्वज को फाड़ डाला.

सुबांद्रियो ने दूतावास पर हुए इस हमले को “क्रांतिकारी कार्रवाई” बताया और कहा कि यह “कश्मीर और पाकिस्तान के खिलाफ आक्रामकता दिखाने वाले भारत की निंदा” के रूप में सामने आया है.

सुकर्णो ने भी सार्वजनिक रूप से अपनी सहानुभूति जताई. उन्होंने कहा कि “इंडोनेशियाई जनता की प्रार्थनाएं पाकिस्तान के उन लोगों के साथ हैं जो अपने देश और जनता की संप्रभुता और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए बहादुरी से लड़ रहे हैं.”

1965 में नहदतुल उलमा के हजारों युवा और छात्र सड़कों पर उतर आए थे और “भारतीय साम्राज्यवादियों का नाश हो”, “भारत वापस जाओ” और “भारत को कुचल दो” जैसे नारे लगा रहे थे.

भारत-विरोधी भावना अब सिर्फ कूटनीतिक दायरों तक सीमित नहीं थी. यह सड़कों तक पहुंच चुकी थी और जकार्ता के सबसे ऊंचे सत्ता केंद्रों से भी उसका समर्थन हो रहा था.

दोनों देशों की राजधानियों में जवाबी प्रदर्शन शुरू हो गए. दिल्ली में प्रदर्शनकारियों ने इंडोनेशियाई दूतावास के बाहर प्रदर्शन किया और सुकर्णो के पुतले जलाए. भारत के राष्ट्रीय सम्मान के खिलाफ माने गए इस व्यवहार पर संसद में भी भारी हंगामा हुआ. विपक्षी नेताओं ने भारत-इंडोनेशिया के कूटनीतिक संबंधों को तोड़ने और भारतीय मिशन को वापस बुलाने की मांग की. हालांकि तत्कालीन विदेश मंत्री स्वर्ण सिंह ने इन मांगों को ठुकरा दिया और कहा कि “ऐसा करना हमारे हित में नहीं होगा.”

हर दिन अखबारों की सुर्खियां नई स्थिति को दिखा रही थीं. The Indian Express के एक संपादकीय “Dictator’s Axis” में बताया गया कि सुकर्णो ने पाकिस्तान के युद्ध प्रयासों को मजबूत करने के लिए 5,000 स्वयंसेवक भेजने की पेशकश की थी. एक दूसरी खबर “Jakarta Aid for Pindi Blocked” में बताया गया कि जकार्ता ने मित्र राष्ट्र सीलोन (अब श्रीलंका) से अपने हवाई अड्डों का इस्तेमाल करने की अनुमति मांगी थी ताकि इंडोनेशियाई कर्मियों को पाकिस्तान भेजा जा सके.

इसके बाद सीधे सैन्य सहयोग की खबरें भी सामने आईं. 20 सितंबर 1965 को The Hindu में “Indo Planes in East Pakistan” शीर्षक से खबर छपी. अरोड़ा के अनुसार, “इंडोनेशिया ने पाकिस्तान नौसेना को रूस में बने छह युद्धपोतों का एक बेड़ा दिया था, जिसमें दो पनडुब्बियां भी शामिल थीं.”

1 अगस्त 1965 को ढाका में इंडोनेशियाई वाणिज्य दूतावास के उद्घाटन के दौरान पाकिस्तान में इंडोनेशिया के राजदूत ब्रिगेडियर जनरल रोकमितो हेंद्रानिंग्रात ने कहा था कि “इंडोनेशिया सरकार और उसके 10.5 करोड़ लोग बिना किसी शर्त के पाकिस्तान को पूरा राजनीतिक और नैतिक समर्थन दे रहे हैं.”

नई दिल्ली के लिए यह स्थिति बेहद चिंताजनक थी. स्वर्ण सिंह ने कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि चीन और पाकिस्तान के साथ मिलकर यदि इंडोनेशिया भारत के खिलाफ सक्रिय दुश्मनी दिखाता है, तो उसे भारत के खिलाफ आक्रमण माना जाएगा और उसी तरह जवाब दिया जाएगा.

1965 के युद्ध के दौरान इंडोनेशिया ने पाकिस्तान नौसेना को रूस में बने छह युद्धपोतों का एक बेड़ा दिया था, जिसमें दो पनडुब्बियां भी शामिल थीं.

भारत को दूसरे मोर्चे का डर

अमेरिका में भारत के राजदूत ब्रज कुमार नेहरू 9 सितंबर 1965 को तत्कालीन राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन से मिलने पहुंचे. उन्होंने बताया कि चीन, पाकिस्तान और इंडोनेशिया के बीच एक स्पष्ट समझ बन चुकी है, जिसका मकसद “हम पर तीन तरफ से दबाव बनाना” है.

उन्होंने पूछा कि अगर चीन भी युद्ध में शामिल हो गया तो भारत क्या करेगा. नेहरू ने राष्ट्रपति से कहा, “भारत को लगता है कि इंडोनेशिया का योगदान अंडमान और निकोबार द्वीपों पर कब्जा करने के रूप में हो सकता है. भारत इसे रोक नहीं पाएगा, क्योंकि उसके पास नौसेना नहीं है.”

जॉनसन का जवाब सीधा था. उन्होंने कहा कि यह स्थिति “इस समय हमारे बाल सफेद कर रही है.”

अंडमान का डर

हिंद महासागर के पूर्वी प्रवेश मार्ग और मलक्का जलडमरूमध्य के पास स्थित अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, जिसे भारत का “डूब न सकने वाला विमानवाहक पोत” कहा जाता है, अपने आकार से कहीं ज्यादा रणनीतिक महत्व रखता था. यह द्वीप समूह इंडोनेशिया के सबसे पश्चिमी प्रांत सुमात्रा के काफी करीब है. इसलिए इंडोनेशियाई घुसपैठ का डर सिर्फ कल्पना नहीं बल्कि एक वास्तविक आशंका था.

और इंडोनेशिया के पास ऐसा करने की क्षमता भी थी. भारत के पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल अरुण प्रकाश ने इंडोनेशिया की समुद्री महत्वाकांक्षाओं का जिक्र करते हुए कहा,

“राष्ट्रपति सुकर्णो ने घोषणा की थी कि हिंद महासागर को ‘इंडोनेशियाई महासागर’ कहा जाना चाहिए. बताया जाता है कि इंडोनेशियाई नौसेना ने ऐसे नक्शे भी छापे थे जिनमें इसे इंडोनेशियाई महासागर कहा गया था.”

उन्होंने कहा, “1960 के दशक की शुरुआत तक इंडोनेशिया ने सोवियत संघ से काफी मजबूत नौसैनिक क्षमता हासिल कर ली थी. उसके पास क्रूजर, पनडुब्बियां और मिसाइल नौकाएं थीं. यह सब उस समय हुआ जब भारतीय नौसेना का बड़ा विस्तार अभी शुरू भी नहीं हुआ था. 1961-62 के आसपास इंडोनेशियाई नौसेना को क्षेत्र की एक महत्वपूर्ण ताकत माना जाता था. 1965 के युद्ध के दौरान इंडोनेशिया ने पाकिस्तान को एक पनडुब्बी और एक गश्ती नौका देने की पेशकश भी की थी, लेकिन जब तक वे कराची पहुंचे तब तक युद्धविराम लागू हो चुका था.”

अंडमान-निकोबार पर कब्जे की आशंका

द्वीपों पर इंडोनेशिया के संभावित कब्जे की आशंका सिर्फ सैन्य हलकों तक सीमित नहीं थी, बल्कि सत्ता के गलियारों में भी चर्चा का विषय थी.

राज्यसभा सदस्य कर्नल बशीर हुसैन जैदी ने संसद में “अंडमान और निकोबार द्वीपों को खतरे” की बात उठाई और खास तौर पर इंडोनेशिया के घातक पनडुब्बी बेड़े का जिक्र किया.

सांसद एच.वी. कामथ ने और स्पष्ट शब्दों में कहा, “हालांकि रक्षा मंत्री इसे स्वीकार नहीं कर रहे हैं, लेकिन यह साफ था कि निकोबार द्वीपों के पास देखी गई पनडुब्बी इंडोनेशिया की थी.”

ये आशंकाएं बेबुनियाद नहीं थीं. रिस्टियन एट्रियांडी सुप्रियान्तो ने अपने शोधपत्र The Indo-Indonesia Defense Relationship: Towards a Convergent Mandala में लिखा है,

“इंडोनेशियाई वायुसेना ने पाकिस्तान को MIG-15 और MIG-19 विमान देने पर सहमति जताई थी, जबकि नौसेना ने दो पनडुब्बियां, दो कोमार श्रेणी की मिसाइल नौकाएं और दो जगुआर श्रेणी की टॉरपीडो नौकाएं पाकिस्तान भेजीं. इस स्थिति ने केवल द्वीपों के ऊपर प्रदर्शनात्मक उड़ानों को जन्म दिया, लेकिन सुकर्णो के ‘इंडोनेशियाई महासागर’ वाले विचारों के साथ मिलकर इसने भारत में स्वाभाविक चिंता पैदा कर दी.”

क्या अंडमान और निकोबार सुमात्रा का विस्तार हैं?

क्या इन आशंकाओं में वास्तव में कोई सच्चाई थी? पाकिस्तान की तरफ से सामने आया एक विवरण बताता है कि शायद थी.

एयर मार्शल असगर खान ने अपनी आत्मकथा The First Round में इंडोनेशियाई नौसेना प्रमुख एडमिरल मार्टाडिनाटा के साथ हुई बातचीत का जिक्र किया है. उनके अनुसार मार्टाडिनाटा ने पूछा था,

“क्या आप नहीं चाहते कि हम अंडमान द्वीपों पर कब्जा कर लें? नक्शा देखिए, अंडमान और निकोबार द्वीप सुमात्रा का ही विस्तार हैं और किसी भी हालत में पूर्वी पाकिस्तान और इंडोनेशिया के बीच स्थित हैं. भारतीयों का वहां क्या अधिकार है? किसी भी स्थिति में इंडोनेशियाई नौसेना तुरंत इन द्वीपों की ओर जाने वाले समुद्री रास्तों पर गश्त शुरू कर देगी.”

कई लोगों का मानना है कि यह तेजी से बढ़ते युद्ध के माहौल में दिया गया एक अनौपचारिक बयान था, न कि कोई वास्तविक रणनीतिक योजना.

मुहम्मद वफ़ा ने अधिक संतुलित नजरिया पेश करते हुए कहा,

“द्वीपों पर किए गए ये दावे वास्तविक क्षेत्रीय महत्वाकांक्षा से ज्यादा भारत को अस्थिर करने की एक सोची-समझी कोशिश थे. इसका उद्देश्य भारतीय सैन्य संसाधनों पर दबाव बढ़ाना, उसकी रणनीतिक एकाग्रता को बांटना और नई दिल्ली को पश्चिमी और पूर्वी दोनों समुद्री मोर्चों से एक साथ खतरे के लिए तैयार रहने को मजबूर करना था.”

आक्रामक समुद्री राजनीति

अंडमान और निकोबार को लेकर इंडोनेशियाई अधिकारियों के बयान उस समय की आक्रामक समुद्री राजनीति के अनुरूप थे. ऐसे ही दावे पापुआ न्यू गिनी जैसे अन्य पड़ोसी क्षेत्रों के बारे में भी किए गए थे, जिससे ऑस्ट्रेलिया के साथ इंडोनेशिया का टकराव बढ़ रहा था.

जनवरी 1964 में जब राष्ट्रपति जॉनसन के विशेष प्रतिनिधि और अमेरिकी अटॉर्नी जनरल इंडोनेशिया पहुंचे, तब पीकेआई प्रमुख दीपा नुसंतारा ऐदित ने हिंद महासागर को “इंडोनेशियाई महासागर” कहा था.

बी.डी. अरोड़ा की पुस्तक India, Indonesia and the Emergence of Malaysia के अनुसार उन्होंने कहा था,

“आइए हम मलेशिया को कुचलना जारी रखें और सातवें बेड़े को इंडोनेशियाई महासागर से बाहर निकाल दें.”

भारतीय नौसेना की चिंता

अपनी पुस्तक Transition to Triumph: History of the Indian Navy, 1965-1975 में वाइस एडमिरल गुलाब मोहनलाल हीरानंदानी ने तत्कालीन नौसेना प्रमुख एडमिरल भास्कर सदाशिव सोमन के विचारों का उल्लेख किया है.

पूर्व नौसेना प्रमुख ने कहा था,

“1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद अंडमान और निकोबार द्वीपों की रक्षा पूरी तरह मेरे जिम्मे छोड़ दी गई थी. मुझे इन द्वीपों को लेकर थोड़ी चिंता थी. बाद में यह कितना सही साबित हुआ, मैं नहीं जानता, लेकिन उससे पहले खबरें थीं कि सुकर्णो की नजर इन द्वीपों पर है.”

उन्होंने आगे कहा,

“मेरे पास कराची में इंडोनेशियाई जहाजों की मौजूदगी की कुछ खुफिया जानकारी भी थी. मुझे पता था कि पाकिस्तान और इंडोनेशिया की संयुक्त नौसैनिक कार्रवाई भारतीय बेड़े या भारतीय मुख्य भूमि के खिलाफ नहीं होगी. सबसे अधिक संभावना अंडमान और निकोबार द्वीपों पर कब्जे की थी.”

उन्होंने यह भी कहा,

“मुझे पूरा विश्वास था कि इंडोनेशियाई नौसेना, यह जानते हुए कि वहां केवल खाकी वर्दी वाले नाविकों की एक छोटी टुकड़ी मौजूद है, निकोबार द्वीप पर कब्जा करने की कोशिश कर सकती है, भले ही उस समय उसकी नौसेना बहुत मजबूत स्थिति में न हो.”

इन आशंकाओं का असर

इन आशंकाओं का वास्तविक प्रभाव पड़ा.

डेविड ब्रूस्टर ने अपनी किताब The Relationship Between India and Indonesia: An Evolving Security Partnership? में लिखा है,

“इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो ने पाकिस्तान के समर्थन के तौर पर अंडमान और निकोबार द्वीपों को भारत से छीनने पर थोड़े समय के लिए विचार भी किया था.”

भारत की युद्धकालीन नौसैनिक रणनीति पर भी इसका असर पड़ा.

ब्रूस्टर लिखते हैं, “असल में अंडमान द्वीपों के प्रति इंडोनेशियाई खतरा ही वह प्रमुख कारण था जिसकी वजह से 1965 के युद्ध के दौरान भारतीय नौसेना बंगाल की खाड़ी में बनी रही और पाकिस्तान के खिलाफ कोई आक्रामक कार्रवाई नहीं कर सकी.”

लेकिन हमला कभी नहीं हुआ

जिस इंडोनेशियाई कदम का डर था, वह कभी नहीं उठाया गया. भारत और पाकिस्तान के बीच युद्धविराम हो गया, इससे पहले कि इंडोनेशिया कोई कार्रवाई करता.

लेकिन इसका पूरा जवाब इंडोनेशिया के अंदर हुई घटनाओं में छिपा था.

30 सितंबर 1965 को, जब युद्ध समाप्ति की ओर बढ़ रहा था, जकार्ता में तख्तापलट की कोशिश हुई. मेजर जनरल सुहार्तो ने इसे कुचल दिया और धीरे-धीरे सुकर्णो की सत्ता छीन ली. 1967 तक वे राष्ट्रपति बन गए.

ब्रूस्टर के अनुसार, हिंद महासागर और अंडमान द्वीपों को लेकर भारत के खिलाफ सुकर्णो की समुद्री चुनौती पूरी तरह खत्म हो गई क्योंकि तख्तापलट के बाद जकार्ता को अपनी नौसेना पीछे बुलानी पड़ी और उसकी आक्रामक नीति समाप्त हो गई.

भारत के खिलाफ सबसे ज्यादा आक्रामक रुख रखने वाले अधिकारी, जिनमें एडमिरल मार्टाडिनाटा और एयर मार्शल उमर दानी शामिल थे, बाद में हुई कार्रवाई में सत्ता से बाहर कर दिए गए.

सुकर्णो की टकराव वाली विदेश नीति भी उनके शासन के साथ खत्म हो गई. “इंडोनेशियाई महासागर” का विचार धीरे-धीरे भुला दिया गया.

इंडो-पैसिफिक में भारत की चौकी

आज भारत और इंडोनेशिया के संबंध 1960 के दशक के तनावों से बहुत आगे निकल चुके हैं और एक मजबूत व्यापक रणनीतिक साझेदारी में बदल गए हैं.

सदियों पुराने सांस्कृतिक संबंधों और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में साझा चिंताओं के कारण दोनों देश अब एक-दूसरे को महत्वपूर्ण समुद्री साझेदार मानते हैं. दोनों समुद्री सुरक्षा, संपर्क, आतंकवाद-रोधी सहयोग और स्वतंत्र, खुला तथा नियम-आधारित इंडो-पैसिफिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए साथ काम कर रहे हैं.

द्विपक्षीय व्यापार 2005-06 में 4.3 अरब डॉलर से बढ़कर 2023-24 में लगभग 30 अरब डॉलर तक पहुंच गया है.

गरुड़ शक्ति और समुद्र शक्ति जैसे रक्षा अभ्यास तथा समन्वित गश्त कई क्षेत्रों में सहयोग को मजबूत कर रहे हैं.

2025 में BRICS में इंडोनेशिया की आधिकारिक एंट्री ने इस साझेदारी को नई गति दी है. इससे रणनीतिक सहयोग बढ़ाने और वैश्विक मंचों पर साझा आवाज उठाने के नए अवसर खुले हैं.

1965 में भारत के “डूब न सकने वाले विमानवाहक पोत” को लेकर हुआ विवाद यह याद दिलाता है कि ग्रेट निकोबार परियोजना केवल एक द्वीप विकास योजना नहीं है.

आज के दौर में, जब समुद्री शक्ति भू-राजनीतिक प्रभाव तय करने में बड़ी भूमिका निभा रही है, ये द्वीप अब दूर-दराज की सीमाएं नहीं बल्कि रणनीतिक संपत्ति हैं.

ग्रेट निकोबार परियोजना यह संकेत देती है कि भारत अब केवल इंडो-पैसिफिक को देख नहीं रहा है, बल्कि उसमें नेतृत्व करने के लिए भी तैयार है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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