गुरुग्राम: मानसून सत्र के आखिरी दिन मंगलवार को हरियाणा विधानसभा में जीरो आवर था. मुलाना की विधायक पूजा के पास सिर्फ एक बात कहने के लिए थी कि उनके समुदाय की पहचान के साथ कोई समझौता नहीं हो सकता. कांग्रेस विधायक, जिनका नाम सरकारी रिकॉर्ड में सिर्फ उनके पहले नाम से दर्ज है, उन्होंने सदन में कहा, “हम संत रविदास जी के अनुयायी हैं. हमारी जाति का नाम बदलकर मेघवाल नहीं किया जाना चाहिए. हमने ऐसी कोई मांग नहीं की है.”
विकास एवं पंचायत मंत्री कृष्ण लाल पंवार जवाब देने के लिए खड़े हुए और कहा कि मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ऐसा कुछ नहीं कर रहे हैं और उन्होंने पहले ही इस तरह के किसी कदम से इनकार कर दिया है.
यह जवाब सैनी के खुद दिए बयान से मेल नहीं खाता, जो उन्होंने एक हफ्ते से थोड़ा ज्यादा समय पहले दिया था. 23 अगस्त को रेवाड़ी जिले के बावल में एक सभा को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा था कि उनकी सरकार केंद्र से सिफारिश करेगी कि मेघवाल समुदाय के सदस्यों को अपने जाति प्रमाणपत्र पर ‘चमार’ की जगह ‘मेघवाल’ लिखने की अनुमति दी जाए.
सैनी ने कहा था, “हम केंद्र से सिफारिश करेंगे कि समुदाय के सदस्यों को अपने जाति प्रमाणपत्र में अगर वे चाहें तो ‘मेघवाल’ शब्द इस्तेमाल करने का विकल्प दिया जाए.”
यह घोषणा मेघवाल उत्थान समिति की ओर से समरसता सम्मेलन और प्रतिभा सम्मान समारोह में मुख्यमंत्री के सामने रखी गई 10 मांगों में से एक के जवाब में की गई थी. सैनी ने सभी मांगों को मौके पर ही स्वीकार कर लिया था. उन्होंने संगठन को 31 लाख रुपये की आर्थिक मदद देने की भी घोषणा की थी.
हरियाणा में ‘चमार’ अनुसूचित जाति की वह श्रेणी है, जिसमें यह समुदाय आधिकारिक तौर पर दर्ज है. हालांकि, समुदाय के लोग लंबे समय से कहते रहे हैं कि इस शब्द से सामाजिक रूप से गलत छवि जुड़ी हुई है.
विधानसभा सत्र के बाद दिप्रिंट से बात करते हुए पूजा ने कहा कि बावल में हुई उस घोषणा के बाद से उनके समुदाय में चिंता बनी हुई है. वह खुद ‘रविदासिया’ समुदाय से हैं, जो ‘चमार’ जाति के अंदर आने वाले कई उप-समुदायों में से एक है. उन्होंने कहा कि उनके समुदाय के लोग नहीं चाहते कि सभी के जाति प्रमाणपत्रों पर किसी एक उप-जाति का नाम थोपा जाए.
उन्होंने कहा कि उन्हें सबसे अजीब बात यह लगी कि सैनी ने यह घोषणा एक खुले मंच से की थी और इसके वीडियो अभी भी ऑनलाइन चल रहे हैं. लेकिन मुख्यमंत्री ने इसके बाद अखबारों में छपी खबरों को लेकर खुद कोई सफाई या खंडन नहीं दिया. इसके बजाय उन्होंने अपने समुदाय से ही आने वाले पंवार को उनकी ओर से इस बात से इनकार करने के लिए आगे किया.
पहचान का मुद्दा
पूजा के पति और अंबाला से सांसद वरुण चौधरी ने इस आपत्ति को और आगे बढ़ाया है. 28 अगस्त को सैनी को लिखे पत्र में चौधरी ने कहा कि चमार समुदाय ने कभी भी अपना नाम बदलने की मांग नहीं की है और यह नाम उसकी पहचान का अहम हिस्सा है. उन्होंने कहा कि गुरु रविदास ने भी अपनी बानी में अपनी पहचान के लिए इस शब्द का इस्तेमाल किया था.
चौधरी ने पंवार के खंडन को लेकर सीधे सवाल भी उठाया. उन्होंने पूछा कि अगर पंवार की बात सही है, तो बावल की घोषणा की खबर छापने वाले किसी भी अखबार को मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से सुधार नोटिस क्यों नहीं भेजा गया. उन्होंने सैनी से केंद्र सरकार को नाम बदलने की कोई सिफारिश नहीं करने को कहा.
झज्जर की विधायक गीता भुक्कल, जो इसी समुदाय से आती हैं, उन्होंने इससे एक कदम आगे जाकर इस घोषणा के कानूनी आधार पर ही सवाल उठाया. उन्होंने कहा, “जातियों को अनुसूचित जाति के रूप में वर्गीकृत करने का अधिकार केंद्र के पास है और राज्यों की इसमें कोई भूमिका नहीं है. मुझे नहीं पता कि मुख्यमंत्री ने किस अधिकार के तहत चमार की जगह मेघवाल लिखे हुए जाति प्रमाणपत्र जारी करने की मांग को स्वीकार किया.”
भुक्कल ने कहा कि चमार एक जाति है, जबकि मेघवाल कई उप-जातियों में से एक है. इनमें रविदासिया और जाटव भी शामिल हैं. उन्होंने कहा कि इस घोषणा से दूसरे उप-समुदायों में नाराजगी पैदा हुई है.
उन्होंने यह भी कहा कि गुरु रविदास की अपनी वाणी में ‘चमार’ शब्द आता है. उन्होंने इसकी पंक्ति ‘कहे रविदास चमारा’ का जिक्र करते हुए कहा कि यह शब्द धार्मिक ग्रंथों में इस्तेमाल हुआ है, इसलिए इसे गाली या अपमानजनक शब्द नहीं माना जाना चाहिए.
मुख्यमंत्री के मीडिया समन्वयक अशोक छाबड़ा ने दिप्रिंट को बताया कि पंवार पहले ही साफ कर चुके हैं कि सरकार की मेघवाल नाम को अपनाने की सिफारिश करने की कोई योजना नहीं है.
पंवार ने दिप्रिंट के फोन कॉल का जवाब नहीं दिया.
हालांकि, चंडीगढ़ में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने बताया था कि बावल कार्यक्रम में आयोजकों ने सैनी के सामने मांगों की एक सूची रखी थी. इसमें पहली मांग जाति प्रमाणपत्रों पर मेघवाल लिखने की थी. पंवार ने कहा कि मुख्यमंत्री ने इस पर कोई वादा नहीं किया था. उन्होंने राज्य में चमार समुदाय की आबादी 30 लाख बताई, जिसमें करीब 80,000 मेघवाल हैं.
राजनीतिक विशेषज्ञ इस बदलाव को कानून से ज्यादा अगले साल होने वाले दो अहम चुनावों के गणित से जोड़कर देख रहे हैं. अमिटी यूनिवर्सिटी, मोहाली में राजनीति विज्ञान पढ़ाने वाली ज्योति मिश्रा ने कहा कि बावल में की गई घोषणा जल्दबाजी में की गई लगती है और इसमें इसके चुनावी नुकसान को ध्यान में नहीं रखा गया.
उन्होंने कहा, “अगले साल पंजाब और उत्तर प्रदेश में चुनाव हैं. दोनों राज्य BJP के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं. पंजाब में देश में SC की आबादी का सबसे ज्यादा प्रतिशत, 32 प्रतिशत है. इसमें एक-तिहाई रविदासिया हैं.”
उन्होंने आगे कहा, “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद रविदासिया समुदाय को अपने साथ जोड़ने के लिए सचखंड डेरा गए थे. उन्होंने संत रविदास की 650वीं जयंती मनाने की भी घोषणा की है. इसी तरह उत्तर प्रदेश में जाटवों की संख्या अच्छी है, जबकि मेघवाल मुख्य रूप से राजस्थान में हैं. मेघवालों के लिए रविदासियाऔर जाटवों को नाराज करना BJP के लिए राजनीतिक रूप से आत्मघाती कदम होता.”
मिश्रा की बात को इस साल BJP की ओर से किए गए बड़े स्तर के संपर्क अभियान से भी समझा जा सकता है. मोदी सरकार ने 17 जुलाई को लंबे समय से चली आ रही रविदासिया समुदाय की एक मांग को पूरा करने की दिशा में कदम उठाया था. उस दिन प्रधानमंत्री ने जालंधर कैंट से संत रविदास एक्सप्रेस को हरी झंडी दिखाई थी. यह भारत की दूसरी वंदे भारत स्लीपर सेवा है. इससे पंजाब के दोआबा क्षेत्र को संत रविदास की जन्मस्थली वाराणसी के लिए पहली सीधी ट्रेन मिली.
इसके 12 दिन बाद, 29 जुलाई को BJP ने वाराणसी से ही अपना सात महीने का ‘समरसता संकल्प अभियान’ औपचारिक रूप से शुरू किया. वाराणसी प्रधानमंत्री का अपना लोकसभा क्षेत्र भी है. यह अभियान गुरु रविदास की 650वीं जयंती के मौके पर शुरू किया गया.
BJP के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और सचखंड बल्लां डेरा के प्रमुख के साथ मिलकर इस अभियान की शुरुआत की. इस दौरान संत रविदास की जन्मस्थली की पवित्र मिट्टी देशभर के 21,000 स्थानों पर भेजी गई.
पंजाब की रविदासिया आबादी और उत्तर प्रदेश के जाटव मतदाता दोनों ही इस संपर्क अभियान के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं. यही वजह है कि हरियाणा में मेघवाल को लेकर हुई यह गलती राजनीतिक रूप से BJP के लिए महंगी पड़ सकती है. खासकर इसलिए क्योंकि पार्टी बड़े स्तर पर रविदास को मानने वाले पूरे समुदाय को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है. इसी कारण सरकार को इस घोषणा से जल्द पीछे हटना पड़ा.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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