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Thursday, 5 November, 2026
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यूपी चुनाव: अखिलेश नहीं लड़ेंगे चुनाव, बीजेपी योगी और दोनों डिप्टी सीएम को उतारने की तैयारी में

उत्तर प्रदेश की राजनीति में ऐसे कई मुख्यमंत्री रहे हैं, जिन्होंने शपथ लेते समय राज्य विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य नहीं होने के बावजूद मुख्यमंत्री पद संभाला. इनमें मायावती से लेकर राजनाथ सिंह तक शामिल हैं.

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लखनऊ: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियां तेज़ हो रही हैं. इस बीच समाजवादी पार्टी (सपा) के प्रमुख अखिलेश यादव ने ऐलान किया है कि वह चुनाव नहीं लड़ेंगे. इसके बजाय वह पूरे राज्य में प्रचार करने और सभी 403 विधानसभा सीटों पर उम्मीदवार उतारने पर ध्यान देंगे.

अपने इस फैसले के बारे में बताते हुए अखिलेश ने कहा कि वह ‘शुभ’ और ‘अशुभ’ संकेतों में विश्वास करते हैं और पहले जो तरीका उनके लिए फायदेमंद रहा है, वह उसी को अपनाएंगे.

अखिलेश ने 2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को याद किया. उस समय सपा को बहुमत मिला था और वह मुख्यमंत्री बने थे. उन्होंने बताया कि उस समय वह कन्नौज से लोकसभा सांसद थे. इसके उलट, 2022 के चुनाव में उन्होंने करहल से चुनाव लड़ा और जीता, लेकिन उनकी पार्टी सरकार नहीं बना पाई.

सपा के सूत्रों के मुताबिक, यह फैसला पार्टी की बड़ी चुनावी रणनीति का भी हिस्सा है. अगर अखिलेश चुनाव लड़ते हैं, तो उनके प्रचार का काफी समय उनकी अपनी सीट पर ही खर्च हो सकता है. वहां बीजेपी उनके खिलाफ अपनी पूरी संगठनात्मक ताकत लगा सकती है.

इसके बजाय सपा प्रमुख पूरे उत्तर प्रदेश में घूमना चाहते हैं और सभी 403 विधानसभा सीटों पर प्रचार करना चाहते हैं. इससे वह राज्यभर में पार्टी के उम्मीदवारों के लिए उपलब्ध रह सकेंगे.

बीजेपी ने उन्हें ‘रणछोड़ अखिलेश’ कहा

उत्तर प्रदेश बीजेपी ने चुनाव नहीं लड़ने के अखिलेश के फैसले को लेकर उन पर निशाना साधा है. पार्टी की प्रदेश इकाई के अध्यक्ष पंकज चौधरी ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में उन्हें ‘रणछोड़ अखिलेश’ कहा और आरोप लगाया कि वह चुनावी मैदान से भाग रहे हैं.

चौधरी ने एक्स पर लिखा, “पहले उन्होंने (अखिलेश) चुनौती दी और अब वह भाग गए हैं. क्या अब वह सीधे लोकसभा से ही मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे? यह बिना चुनाव के सत्ता बदलने जैसा है. समाजवादियों की यही सच्चाई है. जब वे सत्ता में थे, तब नोएडा जाने से डरते थे. अब वे चुनाव लड़ने से डर रहे हैं.”

वहीं, उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने कहा कि सपा को पहले से ही अपनी हार का अंदाजा हो गया है और अखिलेश जनता का सामना करने से बच रहे हैं.

सपा की प्रवक्ता पूजा शुक्ला ने बीजेपी के तानों को खारिज करते हुए दिप्रिंट से कहा कि अखिलेश पार्टी के सबसे बड़े स्टार प्रचारक हैं और उन्हें सभी 403 विधानसभा सीटों पर जाना जरूरी है.

उन्होंने कहा, “बीजेपी उन्हें एक ही सीट पर फंसाने की कोशिश कर सकती थी. उस जाल में फंसने के बजाय वह पूरे उत्तर प्रदेश में घूमकर प्रचार करेंगे. पिछले चुनाव में उन्होंने करहल से चुनाव लड़ा था. अगर इस बार वह चुनाव नहीं लड़ना चाहते, तो हम उनके फैसले के साथ हैं.”

उत्तर प्रदेश के कई मुख्यमंत्री चुनाव नहीं लड़े

उत्तर प्रदेश की राजनीति में ऐसे कई मुख्यमंत्री रहे हैं, जिन्होंने शपथ लेते समय राज्य विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य नहीं होने के बावजूद मुख्यमंत्री पद संभाला.

बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की प्रमुख मायावती दो बार विधानसभा चुनाव लड़े बिना मुख्यमंत्री बनीं. जून 1995 में लखनऊ के चर्चित गेस्ट हाउस कांड के बाद बीजेपी के समर्थन से वह मुख्यमंत्री बनी थीं. उस समय वह राज्यसभा की सदस्य थीं. हालांकि, उनकी सरकार करीब साढ़े चार महीने ही चल पाई.

2007 में जब बसपा को पूर्ण बहुमत मिला, तब भी मायावती विधायक नहीं थीं. मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते समय वह राज्यसभा की सदस्य थीं. इसके बाद वह विधान परिषद के जरिए राज्य विधानमंडल की सदस्य बनीं और विधान परिषद सदस्य (एमएलसी) के रूप में अपना पूरा पांच साल का कार्यकाल पूरा किया.

त्रिभुवन नारायण सिंह उत्तर प्रदेश के पहले ऐसे मुख्यमंत्री थे, जिन्होंने राज्य विधानमंडल के किसी भी सदन का सदस्य हुए बिना मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी. 18 अक्टूबर 1970 को मुख्यमंत्री पद संभालने के बाद उन्होंने संवैधानिक नियम पूरा करने के लिए गोरखपुर की मनीराम विधानसभा सीट से उपचुनाव लड़ा. हालांकि, वह कांग्रेस (आर) के राम कृष्ण द्विवेदी से हार गए. इसके बाद उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा.

नवंबर 1999 में जब बीजेपी ने कल्याण सिंह की जगह राम प्रकाश गुप्ता को मुख्यमंत्री बनाया, तब गुप्ता भी राज्य विधानमंडल के किसी सदन के सदस्य नहीं थे. बाद में वह विधान परिषद के सदस्य बने.

इसी तरह, जब राजनाथ सिंह अक्टूबर 2000 में मुख्यमंत्री बने, तब वह राज्यसभा सांसद और केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री थे. मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद उन्होंने बाराबंकी की हैदरगढ़ विधानसभा सीट से उपचुनाव लड़ा और जीत हासिल की.

2012 में विधानसभा चुनाव में सपा को पूर्ण बहुमत मिलने के बाद अखिलेश को मुख्यमंत्री चुना गया था. उस समय वह कन्नौज से लोकसभा सांसद थे. बाद में उन्होंने लोकसभा से इस्तीफा दे दिया और विधान परिषद के जरिए राज्य विधानमंडल के सदस्य बने.

2017 में विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत हासिल करने के बाद बीजेपी ने गोरखपुर के सांसद योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाया. शपथ लेते समय योगी राज्य विधानमंडल के किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे. बाद में वह विधान परिषद के सदस्य बने.

हालांकि, 2022 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने गोरखपुर शहरी सीट से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की. इसके बाद वह दूसरी बार मुख्यमंत्री बने.

बीजेपी 2027 में योगी और दोनों उपमुख्यमंत्रियों को चुनाव लड़ाना चाहती है

दिप्रिंट को पता चला है कि अखिलेश भले ही चुनावी मुकाबले से दूर रहने का फैसला कर रहे हों, लेकिन बीजेपी आगामी चुनाव में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और दोनों उपमुख्यमंत्रियों केशव प्रसाद मौर्य और ब्रजेश पाठक को मैदान में उतारने की तैयारी कर रही है.

योगी फिलहाल गोरखपुर शहरी सीट से विधायक हैं, जबकि ब्रजेश पाठक लखनऊ कैंट विधानसभा सीट का प्रतिनिधित्व करते हैं. वहीं, मौर्य फिलहाल विधान परिषद के सदस्य हैं. उन्होंने 2022 के विधानसभा चुनाव में कौशांबी की सिराथू सीट से चुनाव लड़ा था, लेकिन अपना दल (के) की नेता पल्लवी पटेल से हार गए थे.

बीजेपी के सूत्रों के मुताबिक, मौर्य 2027 का चुनाव लड़ने के इच्छुक हैं, लेकिन किसी दूसरी विधानसभा सीट के विकल्प तलाश रहे हैं. माना जा रहा है कि वह प्रयागराज उत्तर और फाफामऊ विधानसभा सीटों पर विचार कर रहे हैं. हालांकि, इन दोनों सीटों पर फिलहाल बीजेपी के विधायक हैं. इस वजह से यह तय नहीं है कि उन्हें किस सीट से उम्मीदवार बनाया जाएगा.

पार्टी चाहती है कि मौर्य विधानसभा चुनाव लड़ें, लेकिन उन्हें किस सीट से उतारा जाएगा, इस पर अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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