नई दिल्ली: एक समय था जब भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को ‘ब्राह्मण बनिया’ पार्टी के रूप में जाना जाता था, लेकिन तब से पार्टी काफी आगे बढ़ी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जो खुद एक ओबीसी नेता हैं, उन्होंने बीजेपी को सभी वर्गों को साथ लेकर चलने वाली पार्टी बनाने में अहम भूमिका निभाई है. आज बीजेपी का पिछड़ी जातियों, दलितों, आदिवासियों और दूसरे समुदायों में भी प्रभाव है. हालांकि, पार्टी में और बीजेपी के नेतृत्व वाली राज्य सरकारों में ‘सवर्ण’ जातियों के नेता अब भी बड़े पदों पर बने हुए हैं.
दिप्रिंट के विश्लेषण के अनुसार, पिछले हफ्ते बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन, जो कायस्थ हैं, ने जिन नए पदाधिकारियों की नियुक्ति की, उनमें 50 प्रतिशत से ज्यादा ‘सवर्ण’ जातियों से हैं.
इसके अलावा, बीजेपी शासित राज्यों के 17 मुख्यमंत्रियों में से 10 ‘सवर्ण’ या अगड़ी जातियों से हैं, तीन अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) से, तीन अनुसूचित जनजाति (ST) से और एक मैतेई समुदाय से हैं.
हिमंत बिस्व सरमा (असम), रेखा गुप्ता (दिल्ली), प्रमोद सावंत (गोवा), भूपेंद्र पटेल (गुजरात), देवेंद्र फडणवीस (महाराष्ट्र), भजन लाल शर्मा (राजस्थान), माणिक साहा (त्रिपुरा), योगी आदित्यनाथ (उत्तर प्रदेश), पुष्कर सिंह धामी (उत्तराखंड) और शुभेंदु अधिकारी (पश्चिम बंगाल) ‘सवर्ण’ जाति समूहों से हैं. पेमा खांडू (अरुणाचल प्रदेश), विष्णु देव साय (छत्तीसगढ़) और मोहन चरण माझी (ओडिशा) एसटी वर्ग से हैं, जबकि सम्राट चौधरी (बिहार), नायब सिंह सैनी (हरियाणा) और मोहन यादव (मध्य प्रदेश) ओबीसी हैं. युमनाम खेमचंद सिंह (मणिपुर) मैतेई समुदाय से हैं.

बीजेपी के नए नियुक्त आठ राष्ट्रीय महासचिवों में से छह ‘सवर्ण’ जातियों से हैं. जून में राज्यसभा सांसद चुने गए सतीश पूनिया अकेले ओबीसी चेहरा हैं. मध्य प्रदेश की खरगोन लोकसभा सीट से सांसद गजेंद्र पटेल एसटी नेता हैं.
नए नियुक्त 13 राष्ट्रीय उपाध्यक्षों में से सात ‘सवर्ण’ जातियों से हैं, जिनमें जैन बनिया भी शामिल हैं. दो ओबीसी, एक एसटी, एक एससी, एक मुस्लिम और एक सिख हैं.

उत्तर प्रदेश की धौरहरा लोकसभा सीट से पूर्व सांसद रेखा वर्मा और कर्नाटक से राज्यसभा सांसद एम नागराजा ओबीसी समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं. नए उपाध्यक्षों में लाल सिंह आर्य भी हैं, जो पहले पार्टी के राष्ट्रीय एससी मोर्चा के प्रभारी थे और बीजेपी के वरिष्ठ दलित नेताओं में से एक हैं. वह मध्य प्रदेश की गोहद विधानसभा सीट से विधायक भी रह चुके हैं.
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति तारिक मंसूर अकेले मुस्लिम उपाध्यक्ष हैं, जबकि मनप्रीत सिंह बादल नितिन नबीन की नई टीम में एकमात्र सिख नाम हैं.
बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने दिप्रिंट को बताया कि पार्टी ने यह सुनिश्चित करने के लिए खास ध्यान रखा है कि नई टीम में समाज के सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व मिले.
नेता ने कहा, “करीब 40 प्रतिशत या उससे ज्यादा सदस्य समाज के वंचित वर्गों से हैं. विचार यह है कि सभी वर्गों और क्षेत्रों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया जाए. पीएम मोदी देश में ओबीसी का सबसे बड़ा चेहरा हैं और उनके नेतृत्व में समाज के सभी वर्गों, खासकर गरीब और सामाजिक रूप से पिछड़े माने जाने वाले लोगों तक पहुंचने का ध्यान रखा गया है.”
सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के फेलो राहुल वर्मा के मुताबिक, बीजेपी की नई टीम की संरचना दो अलग-अलग सच्चाइयों को दिखाती है.
वर्मा ने दिप्रिंट से कहा, “पदाधिकारियों के अपेक्षाकृत छोटे समूह की संरचना से बहुत मजबूत निष्कर्ष निकालना ठीक नहीं है. बीजेपी निश्चित रूप से अपने पारंपरिक ‘सवर्ण’, शहरी और मध्यम वर्ग के आधार से आगे बढ़ी है, लेकिन यह मूल आधार अब भी पार्टी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. नितिन नबीन की टीम की संरचना दोनों सच्चाइयों को दिखाती है: पारंपरिक आधार की मौजूदगी बनी हुई है और ओबीसी, दलितों और दूसरे समुदायों को भी जगह दी गई है, जिनके बीच बीजेपी का विस्तार हुआ है.”
उन्होंने आगे कहा, “यह केवल इसलिए संभव है क्योंकि राजनीतिक नेतृत्व और चुनाव जीतने वाले पदों पर धार्मिक अल्पसंख्यकों, खासकर मुसलमानों की मौजूदगी कम है. इससे बीजेपी को दूसरी बड़ी पार्टियों की तुलना में अलग-अलग हिंदू समुदायों, जिनमें ओबीसी और दूसरे ऐतिहासिक रूप से कम प्रतिनिधित्व वाले वर्ग शामिल हैं, के बीच राजनीतिक पद और नामांकन बांटने की ज्यादा गुंजाइश मिलती है.”
2024 में जब एनडीए सरकार ने तीसरी बार सत्ता संभाली, तब पीएम मोदी के साथ 71 केंद्रीय मंत्रियों ने शपथ ली थी. इस सूची में 10 दलित, 27 ओबीसी, 21 ‘सवर्ण’ जातियों से, पांच आदिवासी समुदायों से और पांच अलग-अलग धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों से थे.
दिप्रिंट ने पहले रिपोर्ट किया था कि 2019 के आम चुनाव के बाद 57 मंत्रियों ने शपथ ली थी. इनमें 32 ‘सवर्ण’ जातियों से, 13 ओबीसी, छह एससी और चार एसटी से थे. हालांकि, 2021 में मंत्रिपरिषद का विस्तार किया गया और इसमें 27 ओबीसी, 12 एससी, आठ एसटी और 30 ‘सवर्ण’ जातियों से थे. उत्तर प्रदेश में कई ‘सवर्ण’ उम्मीदवारों के चुनाव हारने के बाद मंत्रियों में ‘सवर्ण’ जातियों के प्रतिनिधियों का हिस्सा कम हो गया था.
एक अन्य नेता ने दिप्रिंट को बताया, “बीजेपी की राष्ट्रीय टीम ने पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और पूर्वोत्तर के आदिवासी प्रतिनिधियों को शामिल करके आदिवासी समुदाय की महत्वपूर्ण आवाजों को जगह दी है. इनमें से दो खास तौर पर महिलाएं हैं. इसी तरह, अनुसूचित जातियों का प्रतिनिधित्व उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश और बिहार के चार सदस्यों के जरिए किया गया है.”
हालांकि, बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता गोपाल कृष्ण अग्रवाल ने कहा कि जाति के अलावा कई दूसरे पहलुओं को भी ध्यान में रखा जाता है.
उन्होंने कहा, “पदाधिकारियों की नियुक्ति सिर्फ जाति के आधार पर नहीं होती. कई दूसरे पहलू भी हैं, जिनमें उनका पिछला योगदान और लोगों के साथ उनका जुड़ाव शामिल है. जाति का पहलू निश्चित रूप से ध्यान में रखा जाता है और पार्टी सभी को प्रतिनिधित्व देने का ध्यान रखती है, लेकिन संगठन को मजबूत करने की क्षमता और विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता भी बहुत महत्वपूर्ण हैं.”
इस बीच, पार्टी के एक अन्य पदाधिकारी ने बताया कि पार्टी ने “समाज के वास्तव में विविध वर्गों को प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की है. इसके लिए हिंदू नेताओं के साथ एक सिख सदस्य, दो ईसाई सदस्य, एक मुस्लिम सदस्य, एक जैन सदस्य और एक पारसी सदस्य को टीम में शामिल किया गया है.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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