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Tuesday, 22 September, 2026
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राहुल के Gen Z अभियान के बीच DUSU में NSUI की हार, छात्रों तक पहुंच पर उठे सवाल

NSUI की हार से उम्मीदवारों के चयन, आपसी खींचतान और छात्र संपर्क को जमीन पर समर्थन में बदलने की कांग्रेस की क्षमता पर सवाल उठे हैं.

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नई दिल्ली: जिस दिन राहुल गांधी ने इंदौर में अपने ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में बड़ी भीड़ जुटाई, उसी दिन कांग्रेस की छात्र इकाई नेशनल स्टूडेंट यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI) दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (DUSU) चुनाव में पूरी तरह हार गई. इस विरोधाभास से राहुल के मुख्य कार्यक्रम पर सवाल उठे हैं. इस कार्यक्रम का मकसद छात्रों और जेन ज़ी को पार्टी से फिर जोड़ना है.

सूत्रों ने दिप्रिंट को बताया कि राहुल के कार्यालय ने कांग्रेस महासचिव (संगठन) के.सी. वेणुगोपाल से इस बात पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है कि नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI) DUSU की चार सदस्यीय केंद्रीय समिति की एक भी सीट क्यों नहीं जीत पाई.

इस नतीजे से कन्हैया कुमार के नेतृत्व पर भी सवाल उठे हैं. दो उम्मीदवारों ने बगावत की और निर्दलीय चुनाव लड़ा. इनमें से एक निर्दलीय उम्मीदवार दीपांशु शोकीन ने 13,000 से ज्यादा वोटों के अंतर से उपाध्यक्ष पद जीत लिया.

सूत्रों ने बताया कि राहुल के कार्यालय ने उम्मीदवारों के चयन और टिकट देने के लिए इस्तेमाल किए गए मानकों की जानकारी मांगी है. उसने यह भी पूछा है कि कांग्रेस नेता और AICC प्रभारी मनीष छत्रथ के बेटे वीर छत्रथ को उपाध्यक्ष पद के लिए उम्मीदवार क्यों बनाया गया. वीर छत्रथ तीसरे स्थान पर रहे.

दिप्रिंट को जानकारी मिली है कि DUSU के एक पूर्व अध्यक्ष और NSUI सदस्य ने भी संगठन में कन्हैया कुमार के नेतृत्व को लेकर राहुल और उनकी बहन प्रियंका गांधी वाड्रा से शिकायत की है.

शिकायत में उम्मीदवारों के चयन, चुनाव लड़ने के इच्छुक लोगों से निपटने और कैंपस चुनावों में नेतृत्व की कम भागीदारी पर सवाल उठाए गए हैं. DUSU के पूर्व अध्यक्ष ने आरोप लगाया कि कुमार जमीन पर पर्याप्त रूप से सक्रिय नहीं थे और उन्होंने छात्र नेताओं से सलाह किए बिना फैसले लिए.

DUSU के पूर्व अध्यक्ष ने आरोप लगाया, “कन्हैया कैंपस में नहीं थे—उन्हें कैसे पता चलता कि क्या हो रहा है? उन्होंने किसी की सलाह नहीं ली, बस गए और अपने हिसाब से फैसले लेते रहे. उन्होंने शोकीन के साथ जो किया, वह सिर्फ एक उदाहरण था. ऐसा पिछले कई सालों से हो रहा है. वह चुनाव के दौरान हमेशा निष्क्रिय रहे.”

एक भी सीट नहीं मिली

2015 के बाद पहली बार NSUI को एक भी सीट नहीं मिली. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने चार में से तीन पद जीते, जबकि NSUI के पूर्व सदस्य शोकीन ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़कर उपाध्यक्ष पद जीत लिया.

कांग्रेस नेतृत्व अभियान और चुनाव प्रबंधन को भी देख रहा है. सूत्रों ने NSUI के अंदर की आपसी खींचतान को एक अहम कारण बताया है, लेकिन DUSU का नतीजा अकेला ऐसा मामला नहीं है, जिसने छात्र राजनीति को लेकर राहुल के तरीके पर सवाल उठाए हैं.

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के विरोध प्रदर्शनों के दौरान राहुल ने मार्च में घायल हुए छात्रों के समर्थन में बात की थी और उनकी चिंताओं का समर्थन किया था. हालांकि, वह छात्रों के साथ नहीं गए और न ही जंतर-मंतर पर CJP का समर्थन किया.

इसी समय राहुल ने जून में छात्रों और Gen Z से जुड़ने के लिए देशभर में छात्र संपर्क कार्यक्रम के तौर पर ‘छात्रों की गूंज’ शुरू किया.

कांग्रेस ने अलग-अलग राज्यों में इस कार्यक्रम के कई संस्करण आयोजित करने की योजना बनाई है. कांग्रेस कार्य समिति (CWC) के एक प्रस्ताव में यह भी कहा गया था कि यह कार्यक्रम 800 से ज्यादा शहरों में आयोजित किया जाएगा.

इंदौर का कार्यक्रम इस कार्यक्रम का पांचवां संस्करण था. वहां राहुल का जोरदार स्वागत लगभग उसी समय हुआ, जब दिल्ली विश्वविद्यालय के चुनाव के नतीजे आए.

इस समय ने हार के राजनीतिक महत्व को और बढ़ा दिया है और कांग्रेस के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा किया है: क्या युवाओं के बीच गुस्से और असंतोष को, जिसे राहुल अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं, वास्तव में वोटों और जमीन पर संगठन में बदला जा सकता है.

राजनीतिक विश्लेषक और दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर चंद्रचूड़ सिंह ने कहा कि बड़ी भीड़ काफी नहीं है और जमीन से जुड़ाव की कमी है.

सिंह ने कहा, “आप देख सकते हैं कि भीड़ बढ़ रही है और लोग ऐसी सभाओं का हिस्सा बन रहे हैं, लेकिन इसे असली वोटों में बदलने के लिए जमीन पर असली, बहुत सारे लोगों का काम करना जरूरी है. युवा लोग, Gen Z, क्रांतिकारी विचारों की तरफ ज्यादा झुकते हैं.”

सिंह ने आगे कहा, “राहुल गांधी कन्हैया कुमार पर बहुत जोर दे रहे थे. कन्हैया कुमार वामपंथी विचारों वाले नेता हैं और वामपंथी राजनीति का तरीका है ‘डफली बजाओ, आवाज करो’… वे आवाज इसलिए करते हैं क्योंकि उनकी मौजूदगी नहीं है. और वह आवाज ही ऐसी चीज है, जिसके बारे में वे बात कर सकते हैं, इसके अलावा कुछ नहीं.”

उन्होंने समझाया, “छात्रों की गूंज मूल रूप से किसी तरह के वामपंथी विचारों वाले विरोध को पैदा करने पर जोर दे रहा है, जिसे वह भारत में पैदा करने की कोशिश कर रहा है. ऐसा नहीं होने वाला. इससे उनके लिए किसी भी तरह का बड़ा बदलाव नहीं आएगा.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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