नई दिल्ली: पूर्व विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने नरेंद्र मोदी सरकार की विदेश नीति पर तीखा हमला बोला है. उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने कूटनीति को सिर्फ “लेन-देन” तक सीमित कर दिया है और उसमें वह प्रभाव और महत्व नहीं बचा है, जिसने कभी दुनिया में भारत की पहचान बनाई थी.
दिप्रिंट को दिए एक खास इंटरव्यू में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ने कहा कि बड़े अंतरराष्ट्रीय संकटों के दौरान भारत की आवाज कमजोर हुई है. उन्होंने अमेरिका और पाकिस्तान के साथ संबंधों को संभालने के सरकार के तरीके पर सवाल उठाए और कहा कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर अपने कूटनीतिक अनुभव को राजनीतिक नेतृत्व में बदलने में सफल नहीं रहे हैं.
उन्होंने यह भी कहा कि भारत और पाकिस्तान के रिश्ते पूरी तरह खराब होने के बावजूद, दोनों देशों को आखिरकार बातचीत की मेज पर लौटना ही पड़ेगा.
यह आलोचना ऐसे समय में आई है जब मोदी सरकार ने विदेश नीति को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक बताया है. सरकार भारत की G20 अध्यक्षता, बड़ी शक्तियों के साथ मजबूत रणनीतिक साझेदारी और विकासशील देशों में भारत की बढ़ती भूमिका को इसकी सफलता के रूप में पेश करती रही है.
हालांकि, खुर्शीद ने कहा कि ये उपलब्धियां पूरी कहानी नहीं बतातीं. उन्होंने कहा, “भारतीय विदेश नीति में हमेशा नैतिक और मूल्य आधारित पक्ष रहा है. लेकिन अब वह पूरी तरह गायब नजर आता है.”
खुर्शीद के अनुसार, आजादी के बाद से सरकारों ने यह सुनिश्चित किया कि भारत की विदेश नीति में नैतिक और राजनीतिक ताकत हो, जिससे भारत को अपनी आर्थिक या सैन्य ताकत से कहीं ज्यादा प्रभाव मिला. उन्होंने कहा कि आज वह विरासत कमजोर होती दिख रही है.
उन्होंने गाजा और यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत की सीमित प्रतिक्रिया और हाल में ईरान-इजरायल संघर्ष के समय भारत के रुख का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि नई दिल्ली उन बड़ी अंतरराष्ट्रीय घटनाओं के दौरान अपनी पुरानी भूमिका से पीछे हट गया है.
उन्होंने कहा, “लोग भारत की तरफ देखते थे और भारत की आवाज को गंभीरता से लेते थे. इसी वजह से भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के लिए एक गंभीर दावेदार माना गया.”
उन्होंने कहा कि आज की विदेश नीति लगभग पूरी तरह तुरंत मिलने वाले राष्ट्रीय हितों से चलती हुई दिखाई देती है. उन्होंने कहा, “अपने हितों को आगे बढ़ाने में कोई गलत बात नहीं है, लेकिन हित समझदारी वाले भी हो सकते हैं और बिना सोचे-समझे वाले भी.”
उन्होंने सरकार के तरीके को लगातार बढ़ती हुई “लेन-देन वाली कूटनीति” बताया.
उन्होंने कहा, “अगर आप सिर्फ लेन-देन के आधार पर काम करेंगे, तो दूसरे देश भी वैसा ही करेंगे. फिर कौन सा समझौता किस दिन सफल होगा, यह सिर्फ किस्मत की बात बन जाएगी.”
खुर्शीद ने सवाल उठाया कि क्या ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत कूटनीतिक रूप से ज्यादा मजबूत हुआ है.
उन्होंने माना कि राष्ट्रीय सुरक्षा सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए. लेकिन उन्होंने कहा कि संकट के दौरान कई देशों ने खुले तौर पर पाकिस्तान का समर्थन किया, जबकि भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साफ समर्थन जुटाने में मुश्किल हुई.
उन्होंने कहा, “लेकिन विदेश नीति सिर्फ इतनी नहीं होती.” उन्होंने सरकार के इस तर्क को खारिज किया कि कूटनीति सिर्फ भारत के हितों से चलनी चाहिए. उनके अनुसार, रणनीतिक हित और नैतिक नेतृत्व एक-दूसरे के खिलाफ नहीं होते.
‘बात किए बिना शांति नहीं हो सकती’
खुर्शीद ने पाकिस्तान को लेकर सरकार के रुख से भी असहमति जताई. उन्होंने कहा कि मौजूदा स्थिति में रिश्ते रुके हुए हैं, फिर भी बातचीत से बचा नहीं जा सकता.
ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच संबंध लगभग बंद हैं. सिंधु जल संधि भी रोक दी गई है और कूटनीतिक बातचीत लगभग खत्म है. फिर भी उन्होंने कहा कि इतिहास बताता है कि संघर्ष में फंसे देश आखिरकार बातचीत की मेज पर लौटते हैं.
उन्होंने कहा, “बात किए बिना शांति नहीं हो सकती. या तो आप किसी को पूरी तरह खत्म कर दें और फिर कब्रिस्तान जैसी शांति हो, या फिर उससे बात करें और कोई रास्ता निकालें.”
उन्होंने साफ किया कि वह तुरंत बातचीत शुरू करने की बात नहीं कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि भारत की पहले की बातचीत की कोशिशों को पाकिस्तान ने बार-बार नुकसान पहुंचाया है.
उन्होंने कहा, “अतीत में हमारी बातचीत की सभी कोशिशों के साथ धोखा हुआ है. दोनों तरफ से बातचीत की सच्ची इच्छा होनी चाहिए.”
खुर्शीद ने जयशंकर के उस कथित बयान पर भी सवाल उठाया, जिसमें उन्होंने सर्वदलीय बैठक में कहा था कि भारत “पाकिस्तान जैसा दलाल नहीं है.” खुर्शीद ने कहा, “अगर आप दलाल नहीं हैं, तो इसका मतलब यह नहीं है कि आप दुनिया में शांति के लिए अपने अच्छे संबंधों का इस्तेमाल नहीं कर सकते.”
कूटनीति और नेतृत्व
आलोचना के बावजूद खुर्शीद ने जयशंकर की कूटनीतिक क्षमता की तारीफ की. उन्होंने उन्हें “बहुत प्रतिभाशाली व्यक्ति” बताया और उनके लंबे कूटनीतिक अनुभव को माना, लेकिन कहा कि राजनीतिक नेतृत्व की जरूरतें अलग होती हैं.
उन्होंने कहा, “एक ऐसा राजनीतिक व्यक्ति बनने के लिए सिर्फ कूटनीतिक विशेषज्ञता काफी नहीं होती, जो राजनीतिक सोच के आधार पर विदेश नीति चला सके.”
उन्होंने कहा कि संभव है कि मंत्री खुद भी उस सरकार की राजनीतिक प्राथमिकताओं से बंधे हों, जिसमें वह काम कर रहे हैं. उन्होंने कहा, “अंतिम बात यह है कि विदेश नीति के मामले में भारत की छवि बहुत अच्छी नहीं दिख रही है.”
खुर्शीद ने यह भी सवाल उठाया कि क्या भारत अमेरिका के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर सही तरीके से बातचीत कर रहा है.
उनकी यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब सरकार लगातार प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं को भारत की बढ़ती वैश्विक स्थिति के सबूत के रूप में पेश करती रही है.
उन्होंने कहा, “समझौते हैं, अवसर हैं और उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. लेकिन दुनिया में भारत की स्थिति क्या है? दुनिया भारत को किस नजर से देखती है?”
उन्होंने वाशिंगटन के साथ भारत के संबंधों पर भी चिंता जताई. उन्होंने कहा कि प्रस्तावित व्यापार समझौते में अभी भी कुछ मुद्दे बाकी हैं, जो किसानों और MSME क्षेत्र को प्रभावित कर सकते हैं.
उन्होंने कहा, “कोई यह नहीं कहता कि भारत को अमेरिका, रूस या इजरायल के साथ रिश्ते खत्म कर देने चाहिए. लेकिन अगर वे हमारे दोस्त हैं, तो क्या हमारे अंदर इतनी हिम्मत है कि जब कुछ गलत हो रहा हो तो हम अपने दोस्तों को बता सकें?”
उन्होंने कहा कि यही बात गाजा के मानवीय संकट और यूक्रेन में जारी युद्ध पर भारत के संतुलित रुख पर भी लागू होती है.
अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के हालिया बयान पर, जिसमें उन्होंने ईरान युद्धविराम टूटने की संभावना जताई थी, खुर्शीद ने तुरंत प्रतिक्रिया देने से बचने की सलाह दी.
उन्होंने कहा, “मैं इतनी जल्दी प्रतिक्रिया नहीं दूंगा.” उन्होंने ट्रंप को एक अलग तरह के और जल्दी फैसले लेने वाले नेता के रूप में बताया, जिनके सार्वजनिक बयान कई बार अमेरिका के वास्तविक कदमों से अलग होते हैं.
उन्होंने कहा कि भारत जैसे देशों को वॉशिंगटन के हर बयान पर तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय धैर्य से काम लेना चाहिए.
दल-बदल कानून और परिसीमन
खुर्शीद ने दल-बदल विरोधी कानून पर भी हमला किया. उन्होंने कहा कि राजनीतिक खरीद-फरोख्त रोकने के लिए बनाया गया कानून गलत तरीके से इस्तेमाल हुआ है.
उन्होंने कहा, “कम से कम इतना तो कहा जा सकता है कि यह कानून पूरी तरह गड़बड़ स्थिति में है.”
खुर्शीद के अनुसार, यह कानून राजनीतिक वास्तविकताओं के साथ आगे नहीं बढ़ पाया और विधायकों को बिना राजनीतिक नुकसान के दल बदलने का मौका देता है.
उनके अनुसार सबसे बड़ी कमी यह है कि यह तय करने के लिए कोई साफ कानूनी तरीका नहीं है कि कब किसी “मूल राजनीतिक दल” का दूसरे दल में विलय माना जाए.
उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को मौजूदा मामलों के जरिए बार-बार होने वाले दल-बदल के बड़े संवैधानिक असर पर विचार करना चाहिए, सिर्फ तकनीकी सवालों तक सीमित नहीं रहना चाहिए.
उन्होंने कहा, “यह लगभग ऐसा कहने जैसा है कि लोगों को वोट देने की जरूरत ही नहीं है.”
उन्होंने परिसीमन को लेकर केंद्र सरकार के तरीके की भी आलोचना की. उन्होंने महिला आरक्षण कानून को प्रस्तावित परिसीमन से जोड़ने के फैसले पर सवाल उठाया. खुर्शीद ने कहा कि संसद से पास हो चुके कानून को लागू करने में देरी का कोई कारण नहीं है.
उन्होंने कहा, “आरक्षण अभी लागू कर दीजिए. किसी और चीज के होने का इंतजार क्यों कर रहे हैं?”
उन्होंने दक्षिणी राज्यों की उन चिंताओं का भी समर्थन किया, जिनमें परिसीमन के बाद लोकसभा सीटों के संभावित पुनर्वितरण को लेकर सवाल उठाए गए हैं. उन्होंने कहा कि भारत के संघीय ढांचे को प्रभावित करने वाला कोई भी कदम चर्चा और सहमति के बाद ही होना चाहिए.
खुर्शीद ने ऑपरेशन सिंदूर और अन्य राष्ट्रीय सुरक्षा मुद्दों पर राहुल गांधी के लगातार सवालों का भी बचाव किया. उन्होंने बीजेपी के इस आरोप को खारिज किया कि कांग्रेस नेता देश के हितों को नुकसान पहुंचा रहे हैं.
उन्होंने कहा, “वह इन मुद्दों को समझने में समय लगाते हैं. सवाल उठाने से पहले विशेषज्ञों से बात करते हैं और उन पर भरोसा किया जाना चाहिए.”
उन्होंने कहा कि सरकार इन सवालों का जवाब देने के बजाय अक्सर गांधी की देशभक्ति पर सवाल उठाती है.
उन्होंने कहा, “जब वह सवाल पूछते हैं, तो जवाब देने के बजाय उन्हें देश विरोधी कहा जाता है. देशभक्ति किसी एक पार्टी की संपत्ति नहीं है.”
विपक्ष के नेता के रूप में गांधी को सरकार से जवाब मांगने का पूरा अधिकार है. खुर्शीद ने कहा कि अगर राष्ट्रीय सुरक्षा कारणों से कोई जानकारी सार्वजनिक नहीं की जा सकती, तो उसे गोपनीय तरीके से साझा किया जा सकता है.
INDIA गठबंधन, थरूर और कांग्रेस
हाल के दिनों में गठबंधन के सहयोगियों के बीच मतभेद के बाद INDIA गठबंधन के भविष्य को लेकर उठ रही अटकलों पर खुर्शीद ने कहा कि इसके कमजोर होने की खबरें गलत हैं.
उन्होंने कहा, “INDIA गठबंधन मौजूद है. यह आगे भी बना रहेगा.”
उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय दलों की अपनी स्थानीय राजनीतिक मजबूरियां होती हैं, लेकिन इन मतभेदों को पूरे विपक्षी गठबंधन के खत्म होने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए.
उन्होंने कहा, “जैसे-जैसे साझा उद्देश्य मजबूत होगा, इनमें से कई स्थानीय मतभेदों को संभालना आसान हो जाएगा.”
राम मंदिर ट्रस्ट
खुर्शीद ने कहा कि करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़े संस्थानों को सबसे ऊंचे स्तर की जवाबदेही के मानकों पर रखा जाना चाहिए.
उन्होंने कहा, “जब इतनी महत्वपूर्ण संस्था में कोई अनैतिक घटना होती है, तो यह हर किसी के लिए चिंता का विषय बन जाता है.”
उन्होंने कहा कि यह मुद्दा राजनीति से बड़ा है, क्योंकि इसमें देश की एक महत्वपूर्ण धार्मिक संस्था के प्रति लोगों के विश्वास का सवाल जुड़ा है.
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