बेंगलुरु: कर्नाटक में ईसाई और मुस्लिम समुदायों के आध्यात्मिक और सामुदायिक नेताओं ने शुक्रवार को कांग्रेस सरकार से अपने उन वादों को पूरा करने की मांग की, जिनमें विवादित कानूनों को रद्द करना शामिल है. इन कानूनों में धर्मांतरण विरोधी कानून और गोहत्या रोकने वाला कानून भी शामिल हैं, जिन्हें खास तौर पर अल्पसंख्यक और वंचित समुदायों को निशाना बनाने वाला बताया गया है.
भारतीय जनता पार्टी (BJP) के शासनकाल में बनाए गए कानूनों को रद्द करने में हो रही देरी से अल्पसंख्यक समुदायों में निराशा बढ़ी है. माना जाता है कि कर्नाटक और देश के दूसरे हिस्सों में ये समुदाय कांग्रेस पार्टी के मजबूत समर्थक हैं.
मीडिया को दिए एक बयान में बेंगलुरु के आर्कबिशप पीटर मचाडो और कर्नाटक राज्य जमीयत मुस्लिम ओक्कूटा (KRMO) के संयोजक मोहम्मद याह्या दामुडी ने कहा कि कांग्रेस को चुनाव से पहले किए गए अपने वादों पर अमल करना चाहिए.
मचाडो ने शुक्रवार को बेंगलुरु में पत्रकारों से कहा, “उस समय सत्ता में आने की कोशिश कर रही इस (कांग्रेस) सरकार ने अपने घोषणापत्र में कहा था कि अगर वह सत्ता में आई तो इन कानूनों को तुरंत वापस ले लेगी.”
उन्होंने कहा कि सत्तारूढ़ कांग्रेस ने कानूनों को रद्द करने में देरी की वजह राज्य विधान परिषद में पर्याप्त संख्या नहीं होने को बताया था. इससे विधेयकों को पारित कराने या वापस लेने की प्रक्रिया प्रभावित हुई.
बयान में दो विधेयकों को रद्द करने की मांग की गई है. इनमें कर्नाटक धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार का संरक्षण अधिनियम, 2022 और कर्नाटक गोहत्या रोकथाम और मवेशियों के संरक्षण अधिनियम, 2020 शामिल हैं. इसके साथ ही प्रस्तावित कर्नाटक घृणास्पद भाषण और घृणा अपराध (रोकथाम) विधेयक, 2025 को तुरंत लागू करने की मांग भी की गई है.
घृणास्पद भाषण से जुड़ा यह विधेयक कर्नाटक के लोक भवन से राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के विचार के लिए भेजा गया था. इसके पीछे वजह बताई गई थी कि विधेयक में खामियां हैं.
तीनों विधेयक 2019 से 2022 के बीच पिछली BJP सरकार ने पारित किए थे.
23 अक्टूबर को हुए विधान परिषद चुनाव से पहले कांग्रेस के पास 75 सदस्यों वाली विधान परिषद में 38 सदस्य थे, जबकि BJP और उसके सहयोगी दल जनता दल (सेक्युलर) के पास क्रमशः 24 और छह सीटें थीं.
सदन में एक निर्दलीय सदस्य और पांच खाली सीटें हैं, जिससे कांग्रेस के लिए विधेयकों को आसानी से पारित कराना संभव हो गया है.
हालांकि, दोनों सदनों में बहुमत होने के बावजूद घटनाक्रम से परिचित लोगों के मुताबिक, कांग्रेस अपने पिछले कार्यकाल में पारित सभी विवादित कानूनों को रद्द करने के लिए बहुत उत्सुक दिखने से बच रही है. उसे आशंका है कि इससे बहुसंख्यक हिंदू वोट बैंक नाराज हो सकता है.
‘कमरे में सांप’
सत्ता में आने के तीन साल बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने स्कूलों और कॉलेजों में हिजाब जैसे धार्मिक प्रतीकों पर लगी रोक का आदेश वापस ले लिया. यह रोक फरवरी 2022 में बसवराज बोम्मई के नेतृत्व वाली BJP सरकार ने लगाई थी.
लेकिन BJP सरकार के समय बनाए गए दो अन्य कानूनों को रद्द करने में देरी से कांग्रेस के अपने पारंपरिक समर्थक समुदायों में निराशा बढ़ी है.
इसमें दावणगेरे उपचुनाव में मुस्लिम समुदाय के नेताओं को टिकट नहीं दिए जाने और समुदाय के दो प्रमुख नेताओं के खिलाफ बाद में की गई कार्रवाई को लेकर नाराजगी भी शामिल है. इनमें मुख्यमंत्री के राजनीतिक सचिव के पद से नासिर अहमद को हटाया जाना भी शामिल है.
2015 से अब तक दो बार सामाजिक-आर्थिक और शैक्षणिक सर्वेक्षण या ‘जाति जनगणना’ कराने के बावजूद उसकी रिपोर्ट जारी करने में हो रही देरी ने भी वंचित समुदायों में नाराजगी बढ़ाई है. इन समुदायों का आरोप है कि सरकार अब भी प्रभावशाली समुदायों को बढ़ावा दे रही है.
मचाडो ने कहा कि कांग्रेस सरकार ने भरोसा दिया है कि वह इस दिसंबर में बेलगावी में होने वाले राज्य विधानसभा के आगामी शीतकालीन सत्र में इन विधेयकों को पेश करेगी.
उन्होंने कहा कि अल्पसंख्यक समुदाय BJP सरकार के समय बनाए गए कानूनों के कमजोर किए गए रूपों के पक्ष में नहीं हैं. वे केवल इन कानूनों को पूरी तरह वापस लिए जाने को स्वीकार करेंगे.
मचाडो ने कहा कि सरकार के साथ पिछली बातचीत के दौरान समुदाय को यह महसूस हुआ था कि सत्तारूढ़ पार्टी गोहत्या रोकने वाले विधेयक को रद्द नहीं करना चाहती.
उन्होंने कहा, “उन्होंने कहा कि वे इसमें थोड़े बदलाव करेंगे, ताकि आप (अल्पसंख्यक और दूसरे संबंधित पक्ष) ज्यादा प्रभावित न हों. मैंने कहा कि मुझे खेद है, लेकिन मैं इससे संतुष्ट नहीं हूं.”
उन्होंने गोहत्या रोकने वाले विधेयक को कमजोर करने की तुलना ऐसे सांप से की, जिसके जहर के दांत निकालकर उसे कमरे में छोड़ दिया गया हो.
उन्होंने कहा, “लेकिन वह सांप अब भी हमारे लिए डरावना है.”
उन्होंने कहा कि कांग्रेस को इन कानूनों की मरम्मत करके उन्हें बाद में अपने फायदे के लिए इस्तेमाल नहीं करना चाहिए.
कर्नाटक के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री यू. टी. खादर से इस बारे में टिप्पणी के लिए संपर्क नहीं हो सका.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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