संघीय व्यवस्था में सरकार के कई स्तर होते हैं, इसलिए उनके बीच टकराव होना स्वाभाविक है. केंद्र और राज्यों के बीच विवादों का समाधान इस बात पर निर्भर करता है कि निर्णय लेने के अधिकारों और संसाधनों के बंटवारे को लेकर कितनी सहमति बन पाती है. भारत में यह सहमति काफी कमजोर रही है और संघीय संस्थाएं भी राज्यों की जायज मांगों को पूरा नहीं कर पाई हैं. नतीजतन, केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव बढ़ा है. भारतीय संघवाद की संरचना में बदलाव की मांग उठ रही है, खासकर केंद्र और राज्यों के वित्तीय संबंधों में सुधार की मांग.
संवैधानिक ढांचा
भारत में केंद्र और राज्यों के वित्तीय संबंधों का ढांचा काफी हद तक भारत सरकार अधिनियम, 1935 जैसा है. संविधान ने केंद्र और राज्य सरकारों के कर लगाने के अधिकारों को स्पष्ट किया है. कृषि आय को छोड़कर अन्य आय पर कर, कॉरपोरेट कर, सीमा शुल्क और उत्पाद शुल्क केंद्र के प्रमुख कर हैं. कृषि आय और बिक्री कर राज्यों के राजस्व के महत्वपूर्ण स्रोत हैं. जिन करों का स्पष्ट उल्लेख नहीं है, उन पर अधिकार केंद्र को दिया गया है.
प्रशासनिक, वित्तीय और विकास संबंधी जरूरतों के कारण अधिक राजस्व देने वाले करों को केंद्र के पास रखा गया. इससे केंद्र के पास अपने खर्च की तुलना में अधिक राजस्व उपलब्ध हुआ और वह विभिन्न क्षेत्रों के बीच आर्थिक असमानता कम करने में भूमिका निभा सका. लेकिन अधिक राजस्व देने वाले करों के केंद्रीकरण से केंद्र और राज्यों के संसाधनों के बीच असंतुलन भी पैदा हुआ.
इस समस्या से निपटने के लिए संविधान निर्माताओं ने आयकर और, संसद द्वारा कानून बनाए जाने पर, केंद्रीय उत्पाद शुल्क से होने वाली आय को केंद्र और राज्यों के बीच बांटने की व्यवस्था की. राज्यों को कितना हिस्सा मिलेगा और वह उनके बीच कैसे बांटा जाएगा, यह राष्ट्रपति वित्त आयोग की सिफारिशों पर विचार करने के बाद तय करते हैं.
अनुच्छेद 275 के तहत सहायता की जरूरत वाले राज्यों को अनुदान देने की व्यवस्था है, जिसमें वित्त आयोग की सिफारिशों पर विचार करना जरूरी है. अनुच्छेद 282 केंद्र और राज्य सरकारों को विशेष उद्देश्यों के लिए अनुदान देने की अनुमति देता है. संवैधानिक दृष्टि से अनुच्छेद 275 एक उपयुक्त व्यवस्था है, जबकि अनुच्छेद 282 एक अतिरिक्त प्रावधान है.
राजकोषीय संघवाद
भारत की वित्तीय संघीय व्यवस्था में कई कमजोरियां और विसंगतियां सामने आई हैं. इनमें से कुछ संविधान की संरचना में ही मौजूद थीं, जबकि कुछ समय के साथ केंद्र सरकार द्वारा किए गए बदलावों से पैदा हुईं. इसका नतीजा राज्यों में असंतोष और संवैधानिक मर्यादाओं का उल्लंघन रहा है.
राज्यों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि मौजूदा वित्तीय और नियोजन व्यवस्था के तहत वे कृषि, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे अपने अधिकार-क्षेत्र के विषयों में स्वतंत्र विकास योजनाएं बनाने में सक्षम नहीं हैं. इसका एक प्रमुख कारण संसाधनों की कमी और केंद्र पर उनकी अत्यधिक वित्तीय निर्भरता है. राज्यों के कुल खर्च में केंद्र से मिलने वाले संसाधनों का हिस्सा 1951-56 में 37.8 प्रतिशत था, जो 1979-84 में बढ़कर 41.6 प्रतिशत हो गया.
केंद्र कुल कर राजस्व में राज्यों की तुलना में कहीं अधिक योगदान देता है, लेकिन कुल खर्च में उसका हिस्सा अपेक्षाकृत कम है. कुल कर राजस्व में केंद्र का योगदान लगभग 67 से 71 प्रतिशत है, जबकि उसके खर्च का हिस्सा लगभग 43 से 49 प्रतिशत के बीच रहता है. दूसरी ओर, राज्यों के खर्च का हिस्सा 51 से 57 प्रतिशत के बीच है. यानी राजस्व जुटाने का काम केंद्र के पास अधिक केंद्रित है, जबकि खर्च की जिम्मेदारी बड़े पैमाने पर राज्यों पर है.
इसके कई कारण हैं. पहला, अधिक राजस्व देने वाले और तेजी से बढ़ने वाले कर केंद्र के अधिकार-क्षेत्र में हैं, जबकि आर्थिक और सामाजिक सेवाओं पर होने वाला अधिकांश खर्च राज्यों को उठाना पड़ता है. इससे उनके संसाधनों और जिम्मेदारियों के बीच असंतुलन बना रहता है.
दूसरा, केंद्र ने राज्यों के कर राजस्व में हिस्सेदारी के अधिकार को सीमित किया है. आयकर अधिनियम में संशोधन करके कंपनियों द्वारा चुकाए गए करों को आयकर की परिभाषा से बाहर किया गया और आयकर पर अधिभार लगाया गया. इससे राज्यों को उस अतिरिक्त राजस्व में उनका जायज हिस्सा नहीं मिल पाया.
तीसरा, केंद्र ने राज्यों के संसाधन बढ़ाने के लिए अनुच्छेद 269 के तहत उपलब्ध कर लगाने की संभावनाओं का पूरा उपयोग नहीं किया. 1957 में रेलवे किराए पर कर लगाया गया था, लेकिन जल्द ही उसे रेलवे किराए में मिला दिया गया और राज्यों को एकमुश्त मुआवजा दिया गया. इसके बाद रेलवे किराए समय-समय पर बढ़ते रहे, लेकिन राज्यों को उससे कोई हिस्सा नहीं मिला.
अंत में, चुनावी राजनीति के कारण सामाजिक और आर्थिक सेवाओं की मांग बढ़ी है. राज्य सरकारें जनता और विभिन्न दबाव समूहों के अधिक करीब होती हैं, इसलिए उनके लिए ऐसी मांगों को नजरअंदाज करना कठिन होता है. इससे उनकी वित्तीय स्थिति और कमजोर होती है.
संवैधानिक विकृतियां
केंद्र ने आर्थिक और सामाजिक सेवाओं के राज्य-क्षेत्र में बड़े पैमाने पर हस्तक्षेप किया है और इन पर होने वाले खर्च का बड़ा हिस्सा केंद्रीय खजाने पर डाल दिया है. लेकिन कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा और लघु एवं कुटीर उद्योग जैसे मुख्य रूप से राज्यों के विषयों पर फैसले और योजनाओं की दिशा अब दिल्ली से तय होने लगी है. इससे केंद्र और राज्यों के संवैधानिक अधिकार-क्षेत्रों के बीच का अंतर धुंधला हुआ है और राज्यों में जवाबदेह सरकार की अवधारणा कमजोर पड़ी है. वित्तीय मजबूरी के कारण राज्य सरकारों को केंद्र के ऐसे हस्तक्षेप स्वीकार करने पड़ते हैं.
संविधान की मूल भावना से एक और विचलन केंद्र से मिलने वाले विवेकाधीन हस्तांतरणों पर बढ़ती निर्भरता है. संविधान निर्माताओं ने केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय असंतुलन कम करने के लिए विवेकाधीन हस्तांतरणों की तुलना में साझा करों और कानून के तहत होने वाले हस्तांतरणों को अधिक महत्व दिया था. लेकिन 1951 से 1984 के बीच केंद्र से राज्यों को मिले कुल संसाधनों में लगभग 59.6 प्रतिशत गैर-सांविधिक हस्तांतरण थे, जबकि केवल 40.4 प्रतिशत सांविधिक हस्तांतरण थे.
योजना अनुदानों में भी सांविधिक अनुदानों की तुलना में बहुत अधिक वृद्धि हुई. कुल अनुदान राज्यों के राजस्व का लगभग 19 से 20 प्रतिशत थे, जबकि सांविधिक अनुदान योजना अनुदानों के केवल एक-तिहाई के बराबर थे. इससे वित्त आयोग की भूमिका कमजोर हुई. योजना सहायता का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा कर्ज के रूप में होने के कारण स्थिति और चिंताजनक हो जाती है.
इस तरह, भारत की वित्तीय संघीय व्यवस्था में राज्यों की केंद्र पर निर्भरता बढ़ी है और संवैधानिक विकृतियां गहरी हुई हैं. 1950 के दशक के अंत से कई राज्य सरकारें इस स्थिति पर असंतोष जताती रही हैं, लेकिन केंद्र के नेताओं ने वित्तीय संबंधों में सुधार की जरूरत पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया. 1983 और 1985 के चुनावों के बाद क्षेत्रीय नेतृत्व के उभार और राजनीतिक शक्तियों के पुनर्गठन के साथ वित्तीय केंद्रीकरण को चुनौती देने की संगठित कोशिश सामने आई.
सुधार की जरूरत
भारत में क्षेत्रीय असमानताओं को कम करने में केंद्र की महत्वपूर्ण भूमिका को स्वीकार करने के बावजूद, केंद्र-राज्य वित्तीय संबंधों का पुनर्गठन जरूरी है, ताकि राज्यों की जायज मांगों को जगह मिल सके. राज्यों को अपने वित्तीय मामलों में अधिक स्थिरता और पर्याप्त संसाधन मिलने चाहिए, जिससे वे संविधान द्वारा सौंपी गई जिम्मेदारियां निभा सकें.
इसके लिए कई कदम उठाने होंगे. पहला, कॉरपोरेट कर जैसे और अधिक करों को साझा करों के दायरे में लाकर बांटे जाने वाले राजस्व का पूल बढ़ाया जाना चाहिए. दूसरा, केंद्रीय उत्पाद शुल्क का दायरा घटाया जाना चाहिए, ताकि अधिक वस्तुओं पर राज्य बिक्री कर लगा सकें. तीसरा, राज्यों के हित में अनुच्छेद 269 के तहत उपलब्ध कर लगाने के अधिकारों का अधिक व्यापक उपयोग किया जाना चाहिए.
चौथा, अधिकांश अनुदान वित्त आयोग के माध्यम से दिए जाने चाहिए. योजना आयोग और केंद्रीय मंत्रालयों के पास केवल उतने ही अनुदान रहने चाहिए, जितने कुछ विशेष केंद्रीय उद्देश्यों के लिए जरूरी हों. पांचवां, केंद्र से राज्यों को दिए जाने वाले कर्ज की लगातार बढ़ती मात्रा को देखते हुए ऋण नीति को तर्कसंगत बनाना और उसके लिए उपयुक्त मानदंड तय करना जरूरी है.
इसके साथ ही, योजना आयोग, वित्त आयोग और राष्ट्रीय विकास परिषद जैसी संघीय संस्थाओं की संरचना और कामकाज को लेकर सहमति बनाने की कोशिश होनी चाहिए. ऋण परिषद जैसी नई संस्थाएं बनाने की जरूरत पर भी विचार किया जाना चाहिए.
सारकारिया आयोग के सदस्यों से हाल में हुई मेरी चर्चा से मुझे लगा कि वे केंद्र-राज्य संबंधों से जुड़े मुद्दों को व्यापक नजरिए से देखने की जरूरत महसूस करते हैं. विकास, जवाबदेह सरकार और संघीय व्यवस्था के बीच संबंधों को लेकर हमारे अनुभव इस समीक्षा के लिए उपयुक्त आधार देते हैं. इस अनुभव को गहराई से समझने के लिए हमें अपनी संघीय व्यवस्था की सीमाओं से आगे देखना होगा और उन दूसरे संघीय देशों के अनुभवों से सीखना होगा, जहां हाल के वर्षों में इसी तरह के सवालों का सामना किया गया है.
यह लेख सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी की इंडियन लिबरल्स परियोजना नामक इंडियन लिबरल्स आर्काइव की सीरीज़ का हिस्सा है. इसे “फ़्रीडम फ़र्स्ट” किताब से लिया गया है जिसका शीर्षक “राजकोषीय संघवाद का क्षरण” था जो जुलाई 1985 में प्रकाशित हुई थी. मूल संस्करण को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.
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