हैदराबाद: इस साल की शुरुआत में पूरे राज्य में हुए नगर निकाय चुनावों में बड़ी जीत हासिल करने के बाद भी कांग्रेस सरकार ने ग्रेटर हैदराबाद म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन यानी जीएचएमसी के चुनाव कराने में बहुत ज्यादा देरी की है. इससे मंत्रिमंडल, पार्टी के सदस्यों और आम लोगों में चिंता बढ़ी है. शहर में पानी और ऊर्जा की मांग भी लगातार बढ़ रही है.
जनवरी 2027 के अंत तक हैदराबाद के सबसे अहम नगर निकाय जीएचएमसी के चुनावों को हुए दो साल से ज्यादा समय हो जाएगा. पार्षदों और मेयर का कार्यकाल 2025 की शुरुआत में ही खत्म हो गया था.
फरवरी से ही चुनाव जल्द होने की अटकलें तेज हैं. उस समय कांग्रेस सरकार ने जीएचएमसी और आउटर रिंग रोड (ओआरआर) के अंदर आने वाली 27 नगरपालिकाओं को तीन नगर निगमों में बांट दिया था: जीएचएमसी, साइबराबाद म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन (सीएमसी) और मल्काजगिरी म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन (एमएमसी). तीनों निगम अभी कोर अर्बन रीजन (इंटीग्रेटेड गवर्नेंस) एक्ट, 2026 के तहत चल रहे हैं. नए तरीके से बनाए गए जीएचएमसी का क्षेत्र करीब 689 वर्ग किलोमीटर है.
चुने हुए सदस्यों का कार्यकाल खत्म होने के बाद राज्य सरकार ने नगर निकाय चलाने के लिए जल्दी से कमिश्नर और विशेष अधिकारी नियुक्त कर दिए थे. लेकिन उसने असली चुनाव अधिसूचना को बार-बार टाला है.
हालांकि दिसंबर में इन्वेस्ट तेलंगाना समिट होने वाली है. इसके बावजूद कांग्रेस नेताओं ने दिप्रिंट को बताया कि यह तय नहीं है कि इन तीनों हैदराबाद नगर निगमों के चुनाव इस साल हो पाएंगे या नहीं. इसके साथ ही खम्मम और वारंगल के चुनाव भी होने हैं.
तेलंगाना कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष जग्गा रेड्डी ने दिप्रिंट से कहा, “जीएचएमसी चुनाव के लिए कौन तैयार है? न तो पार्टी का कैडर तैयार है और न ही सरकार निगम चुनाव कराने के लिए तैयार है. भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) कड़ी टक्कर देने की तैयारी में हैं. ऐसे में कांग्रेस को विपक्ष को हटाने के लिए अपने वादे पूरे करने होंगे. पिछले चुनावों में विपक्ष ने बड़ी जीत हासिल की थी.”
पिछली बार कांग्रेस पार्टी का कोई प्रतिनिधि मेयर तब बना था, जब 2009 से 2012 के बीच आंध्र प्रदेश का बंटवारा नहीं हुआ था. उस समय इस सबसे पुरानी पार्टी ने यह पद ऑल-इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के साथ साझा किया था. तेलंगाना बनने के बाद हुए चुनावों में कांग्रेस लगभग पूरी तरह हार गई. 2016 और 2020 के निगम चुनावों में उसे हर बार सिर्फ दो सीटें मिलीं.
‘ओजी कांग्रेस’ गुट के कुछ विधायक जग्गा रेड्डी से ज्यादा आशावादी हैं.
कांग्रेस विधान परिषद सदस्य वेंकट बालमूर ने दिप्रिंट से कहा, “हमें आने वाले चुनावों में सिर्फ जीएचएमसी ही नहीं, बल्कि वारंगल और खम्मम में भी बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद है. ये दोनों कांग्रेस के पारंपरिक मजबूत इलाके हैं. हमने राज्य में 70,000 युवाओं को नौकरी दी है और जनवरी 2027 में होने वाले ग्रेजुएट निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव भी हमारे लिए अच्छे रहेंगे. मैं यह अनुमान नहीं लगा सकता कि जीएचएमसी चुनाव कब घोषित होंगे, लेकिन हमें उम्मीद है कि ये देर के बजाय जल्द होंगे.”
मौजूदा देरी पूर्व मुख्यमंत्री और बीआरएस के संस्थापक के. चंद्रशेखर राव के उस तेज और आक्रामक तरीके से बिल्कुल अलग है, जिसमें उन्होंने 2014 और 2018 में सरकार बनाने के तुरंत बाद चुनाव करा दिए थे.
देरी की वजह
वेंकट बालमूर और कांग्रेस के दूसरे वरिष्ठ नेताओं ने इस रणनीतिक देरी को सोच-समझकर लिया गया राजनीतिक ब्रेक बताया है. उनका कहना है कि ग्रामीण और अर्ध-शहरी तेलंगाना में मजबूत कांग्रेस पार्टी राजधानी शहर में बंटे हुए और आक्रामक मतदाताओं का सामना करने से पहले अपनी संगठनात्मक, आर्थिक और कानूनी कमजोरियों को मजबूत करने की कोशिश कर रही है.
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि नगर प्रशासन और शहरी विकास विभाग संभाल रहे रेवंत रेड्डी यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि नगर निकाय को बांटने से कांग्रेस को फायदा मिले. इसके जरिए उन इलाकों में बीआरएस और बीजेपी के लंबे समय से बने वोट बैंक को तोड़ा जा सकता है, जहां ये वोट बैंक काफी मजबूत हैं. नेताओं के मुताबिक, वार्डों की संख्या 150 से बढ़ाकर 300 करने से नए छोटे चुनावी मुकाबले पैदा होंगे. इनमें सत्ताधारी पार्टी राज्य की सरकारी मशीनरी और विकास के पैसों का फायदा उठा सकती है.
हालांकि, तीन नगर निगम बनाने के बावजूद एचवाईडीआरएए (हैदराबाद डिजास्टर रिस्पॉन्स एंड एसेट प्रोटेक्शन एजेंसी) से बनी नकारात्मक छवि और लोगों की ओर से दायर सैकड़ों अदालती मामलों ने तीन हिस्सों में बांटने से मिलने वाले संभावित फायदे को कम कर दिया है, विश्लेषकों ने चेतावनी दी है. राजनीतिक मामलों पर नजर रखने वाले नंदुरी वारा प्रसाद का कहना है कि शहरी मतदाता बुनियादी सुविधाओं से जुड़े मुद्दों पर बहुत जल्दी प्रतिक्रिया देता है. शहर में बड़ी परियोजनाओं में स्थानीय स्तर पर हो रही देरी और नगर प्रशासन को लेकर बढ़ता लोगों का असंतोष मुख्यमंत्री को चुनाव टालने की ओर ले गया है.
कांग्रेस के अंदर के नेता भी इस असंतोष को स्वीकार करते हैं. नेताओं का कहना है कि हाल के अल नीनो जैसे कारणों से खेत, बोरवेल और जलाशय सूख गए हैं, जिससे शहर की बुनियादी सुविधाओं पर दबाव बढ़ा है. शहरी इलाकों में इंदिरम्मा घरों की योजना भी धीमी गति से आगे बढ़ी है. इससे शहर में कांग्रेस के वोट बैंक का रुख और अस्थिर हो गया है.
इस वजह से कांग्रेस नेताओं के आक्रामक प्रचार अभियान पर भी रोक लग गई है. नेता अपने विधानसभा क्षेत्रों में जाने से बच रहे हैं और सिर्फ कुछ खास इलाकों तक ही अपनी पहुंच सीमित कर रहे हैं.
इसके बावजूद जीएचएमसी में मुकाबला कई पार्टियों के बीच कड़ा है. आंध्र प्रदेश के उपमुख्यमंत्री के. पवन कल्याण की जन सेना पार्टी (जेएसपी) के भी चुनाव मैदान में उतरने से आंध्र से आए लोगों के वोट का एक और पहलू जुड़ गया है.
कांग्रेस राज्य के पिछड़े वर्गों यानी बीसी के मुद्दे को लेकर भी सावधान हो सकती है, नेताओं ने कहा. विश्लेषक नंदुरी वारा प्रसाद ने कहा, “पार्टी ने स्थानीय निकायों में बीसी के लिए आरक्षण तय करने से पहले पूरे राज्य में जाति जनगणना कराने का वादा किया था. उसने यह भी कहा था कि चुनाव घोषित करने से पहले बीसी समुदायों को ज्यादा सीटें दी जाएंगी. यह आंकड़ा पूरा किए बिना चुनाव आगे बढ़ाने से 54 प्रतिशत के बड़े वोट बैंक को नाराज करने का खतरा है.”
जीएचएमसी क्षेत्र में 24 विधानसभा सीटें आती हैं और यह तीन मुख्य लोकसभा सीटों तक फैला हुआ है. यह तेलंगाना के सत्ता संतुलन पर बड़ा असर डालता है. 2023 के चुनाव में बीआरएस ने 16 सीटें जीती थीं, एआईएमआईएम ने सात और बीजेपी ने गोशामहल सीट जीती थी. कांग्रेस के हाथ कुछ नहीं आया था. राजनीतिक मामलों के जानकारों का कहना है कि जीएचएमसी क्षेत्र की तीनों लोकसभा सीटें भी बीजेपी ने जीती थीं. ऐसे में कांग्रेस के लिए वादे के मुताबिक बुनियादी ढांचे की परियोजनाओं को सफलतापूर्वक पूरा करना जरूरी है, ताकि वह जीएचएमसी क्षेत्र के मौजूदा चुनावी समीकरण को बदल सके.
विधानसभा और नगरपालिका चुनावों की सफलता पूरी तरह कल्याणकारी योजनाओं की कहानी पर निर्भर होने के बीच कांग्रेस ने अभी तक ओआरआर क्षेत्र में कोई बड़ी परियोजना पूरी नहीं की है और उसे दिखाई देने वाले नगर बुनियादी ढांचे के प्रबंधन में नहीं बदल पाई है. मुख्यमंत्री ने मुसी नदी पुनर्जीवन परियोजना और फ्यूचर सिटी की योजनाओं के काम को खुद देखने की पेशकश की है. अगर इनका नागरिकों पर कोई बड़ा असर नहीं दिखता है, तो इससे उनकी छवि को नुकसान हो सकता है.
लेकिन विपक्षी नेताओं ने दिप्रिंट से कहा कि इससे भी ज्यादा बड़ी वजह राज्य की आर्थिक स्थिति है. राज्य पर केंद्र सरकार का काफी दबाव है, क्योंकि स्थानीय निकायों के चुनाव कराने में लगातार हो रही देरी से जरूरी वित्त आयोग के अनुदान जारी होने पर खतरा है. माना जा रहा है कि कांग्रेस की राज्य सरकार अपने खर्चों को बहुत सावधानी से चला रही है. दिल्ली के बार-बार दौरे के दौरान रेवंत रेड्डी ने केंद्र से मेट्रो रेल और बुलेट ट्रेन परियोजनाओं को मंजूरी देने की मांग की है, ताकि तुरंत होने वाले पूंजीगत खर्च की जरूरतें पूरी की जा सकें.
नंदुरी वारा प्रसाद ने कहा, “इसलिए देरी की वजह सिर्फ जीएचएमसी के प्रशासनिक ढांचे में बदलाव या राजनीति नहीं है. रेवंत रेड्डी की जीएचएमसी चुनाव कराने में हिचकिचाहट एक सोची-समझी और कई स्तरों वाली रणनीति है. इसमें राजनीतिक अस्तित्व बचाना, प्रशासनिक ढांचे में बदलाव, आर्थिक संतुलन और दोबारा मजबूत हो रही बीआरएस और महत्वाकांक्षी बीजेपी को लेकर गहरी चिंता शामिल है.”
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