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Friday, 19 June, 2026
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ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष मान्यता देने के फैसले पर रोक से हाई कोर्ट का इनकार

हालांकि, टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी द्वारा इस पद के लिए नामित किए गए शोभनदेब चट्टोपाध्याय की याचिका पर सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने स्पीकर के फैसले पर सवाल उठाए.

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नई दिल्ली: कलकत्ता हाई कोर्ट ने गुरुवार को पश्चिम बंगाल विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) से निष्कासित नेता ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता मान्यता देने के विधानसभा अध्यक्ष के फैसले पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया.

जस्टिस कृष्णा राव टीएमसी नेता शोभनदेव चट्टोपाध्याय द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रहे थे, जिसमें इस नियुक्ति को चुनौती दी गई थी. अदालत ने अब मामले की अगली सुनवाई तीन सप्ताह बाद तय की है और सभी पक्षों को हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है.

ऋतब्रत ने पश्चिम बंगाल विधानसभा अध्यक्ष रथिंद्र बोस को पत्र लिखकर विपक्ष के नेता पद पर दावा किया था और कहा था कि उन्हें टीएमसी के 58 विधायकों का समर्थन प्राप्त है.

यह घटनाक्रम उस समय सामने आया जब कुछ दिन पहले टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने अध्यक्ष को पत्र लिखकर “परंपरा, प्रक्रिया और पूर्व उदाहरणों” का हवाला देते हुए शोभनदेव चट्टोपाध्याय को विपक्ष का नेता मान्यता देने की मांग की थी.

अध्यक्ष से मुलाकात के बाद आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में ऋतब्रत ने कहा कि टीएमसी के चुनाव चिन्ह पर चुने गए दो-तिहाई से अधिक विधायकों ने अध्यक्ष के सामने अपना दावा पेश किया था, “और उस दावे को स्वीकार कर लिया गया है.”

उन्होंने पत्रकारों से कहा, “18वीं पश्चिम बंगाल विधानसभा के अंदर तृणमूल कांग्रेस की यह दो-तिहाई बहुमत वाली विधायी टीम ‘मैं’ में नहीं, बल्कि ‘हम’ में विश्वास करती है. जो भी नियम बनाए गए हैं, हमने हर नियम का पालन किया है और इसी वजह से हमें 18वीं पश्चिम बंगाल विधानसभा में मुख्य विपक्ष के रूप में मान्यता मिली है.”

खुद को असली टीएमसी बताए बिना उन्होंने पार्टी अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से अपील की कि वे उनके “मुख्य सलाहकार” बनें और उन्हें ऐसी “सलाह दें जो विपक्ष के रूप में हमारी स्थिति को मजबूत करने में मदद करे.”

इसके बाद चट्टोपाध्याय ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर अध्यक्ष के फैसले को चुनौती दी. उन्होंने आरोप लगाया कि अध्यक्ष ने “राजनीतिक पार्टी” के फैसले को नजरअंदाज किया और इसके बजाय विधायी दल के एक गुट से विपक्ष का नेता चुन लिया.

पिछले महीने अभिषेक बनर्जी ने अध्यक्ष को पत्र देकर टीएमसी के फैसले की जानकारी दी थी कि शोभनदेव चट्टोपाध्याय को विपक्ष का नेता नियुक्त किया जाए. लेकिन पार्टी के दो विधायकों ऋतब्रत और संदीपन साहा ने अध्यक्ष से शिकायत की कि टीएमसी महासचिव ने पत्र में कई हस्ताक्षरों की जालसाजी की है.

इसके बाद अभिषेक बनर्जी के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई और पश्चिम बंगाल सीआईडी ने जांच शुरू की. इसके बाद दोनों विधायकों को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में पार्टी से निकाल दिया गया.

कुछ ही दिनों में टीएमसी के कम से कम 58 विधायकों ने खुद को मुख्य विपक्ष घोषित कर दिया, जबकि पार्टी के अन्य सदस्य सोशल मीडिया पर सक्रिय होकर अध्यक्ष को भेजे गए वे पत्र साझा कर रहे हैं जिनमें चट्टोपाध्याय को विपक्ष का नेता बनाने की मांग की गई थी.

मंगलवार और बुधवार की सुनवाई के दौरान अदालत ने अध्यक्ष के उस फैसले पर सवाल उठाया जिसमें उन्होंने टीएमसी द्वारा भेजे गए पहले प्रस्ताव पर निर्णय नहीं लिया. अदालत ने घटनाक्रम का उल्लेख करते हुए कहा कि पहला प्रस्ताव राजनीतिक पार्टी की ओर से आया था, जबकि बाद में आया दूसरा प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया.

अपनी सफाई में अध्यक्ष ने अदालत से कहा कि उनके सामने “अभूतपूर्व” स्थिति थी और ऋतब्रत के दावे का समर्थन करने वाले 80 में से 58 विधायक व्यक्तिगत रूप से उनके सामने उपस्थित हुए थे. इसलिए अध्यक्ष ने कहा कि संख्या बल उनके फैसले के पक्ष में था.

इसके जवाब में चट्टोपाध्याय ने आरोप लगाया कि अध्यक्ष ने “राजनीतिक पार्टी” की राय के बजाय विधायी दल की राय को प्राथमिकता देकर गलती की है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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