चेन्नई: सोमवार को काउंटिंग शुरू होने के एक घंटे के अंदर ही जब तमिलगा वेत्री कड़गम (टीवीके) के विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत की खबर फैली, तो तमिलनाडु के पनैयूर में पार्टी ऑफिस के बाहर भीड़ जुटनी शुरू हो गई. यह भीड़ लगातार बढ़ती गई और जल्द ही चेन्नई की सड़कों तक फैल गई.
‘टीवीके’ के नारे गूंजने लगे और साफ हो गया कि विजय ने वो कर दिखाया जो पिछले कई दशकों में कोई फिल्म स्टार नहीं कर पाया था—एक नए राजनीतिक चेहरे के तौर पर तमिलनाडु का मुख्यमंत्री बनना. यह काम आखिरी बार 1977 में एम.जी. रामचंद्रन (एमजीआर) ने किया था.
यह एक बड़ा बदलाव था—वह दिन जब ‘थलापति’ सिर्फ एक अभिनेता नहीं रहे, बल्कि मुख्यमंत्री बनने जा रहे नेता बन गए. एक झटके में, विजय ने अपने कई सालों के फिल्मी करिश्मे को मजबूत वोट बैंक में बदल दिया, जिसने डीएमके और एआईएडीएमके की पुरानी राजनीति को चुनौती दे दी.
तमिलनाडु की राजनीति में विजय को एमजीआर के बाद सबसे बड़ा बदलाव लाने वाला माना जा रहा है. जहां एमजीआर ने डीएमके में लंबे समय तक राजनीति करने के बाद एआईएडीएमके बनाई और अपने फिल्मी इमेज का इस्तेमाल किया, वहीं विजय का रास्ता अलग रहा.
एक्टर से नेता बने विजय के पास पहले कोई प्रशासनिक अनुभव नहीं था, जब उन्होंने 2024 में टीवीके शुरू की. उन्होंने सीधे युवाओं और महिलाओं को टारगेट किया—वेलफेयर, सामाजिक न्याय और भ्रष्टाचार के मुद्दों पर बात करते हुए. उन्होंने सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर नए वोटर्स को जोड़ा और अपने फैन बेस को वोट में बदल दिया.
विजय का राजनीतिक करियर धीरे-धीरे बना है और उनका मैसेज भी उसी हिसाब से तैयार होता रहा.
रील लाइफ की कहानी
विजय का जन्म फिल्मी दुनिया में हुआ. उनके पिता एस.ए. चंद्रशेखर एक जाने-माने डायरेक्टर और प्रोड्यूसर हैं. विजय ने 1984 में ‘वेत्री’ फिल्म में बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट काम किया.
18 साल की उम्र में उन्होंने ‘नालैय्या थीरपू’ फिल्म से लीड रोल में डेब्यू किया. 1990 के दशक में वह रोमांटिक हीरो के तौर पर सुपरस्टार बने—एक साधारण लड़के की छवि के साथ, जो हर घर में लोगों से जुड़ती थी. बाद में देखा जाए तो यह उनकी राजनीति की तैयारी जैसा ही लगता है.
विजय की फिल्में सिर्फ मनोरंजन नहीं थीं, बल्कि धीरे-धीरे लोगों के बीच न्याय, भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई, युवाओं की ताकत और सामाजिक मुद्दों को लेकर सोच भी बनाती गईं.
2002 में आई ‘थमिझन’ में विजय एक युवा वकील के रूप में दिखे, जो सिस्टम के भ्रष्टाचार और अन्याय से लड़ता है. 2012 की ‘थुपक्की’ में उनका रोल और मजबूत हुआ, जिसमें देशभक्ति और जिम्मेदारी का मैसेज था.
पॉलिटिकल एनालिस्ट सुनील कुमार ने कहा, “विजय की फिल्में पहले युवाओं की राजनीति के आसपास थीं, फिर धीरे-धीरे वह ऐसे किरदार करने लगे जो जिम्मेदारी और बदलाव की बात करते थे. ‘भगवती’ जैसी फिल्मों से उन्होंने महिलाओं और युवाओं का सपोर्ट हासिल किया, जहां उन्होंने भ्रष्टाचार की बात की.”
#Ilayathalapathy #Vijay #Bhagavathi #UHD No Watermarks! pic.twitter.com/hhDbbuU0kR
— KING OF KOLLYWOOD (@m_gajan) September 6, 2016
2014 की ‘काठी’ में किसानों की समस्याओं को दिखाया गया. 2017 में आई ‘मेर्सल’ में उन्होंने हेल्थकेयर सिस्टम और भ्रष्टाचार पर सवाल उठाए और जीएसटी जैसे मुद्दों की आलोचना की, जिससे विवाद भी हुआ और उनकी राजनीतिक छवि और मजबूत हुई.
2018 की ‘सरकार’ में चुनावी गड़बड़ियों और सत्ता के गलत इस्तेमाल की बात की गई, जबकि 2019 की ‘बिगिल’ में महिलाओं को खेल के जरिए सशक्त बनाने की कहानी दिखाई गई, जो महिलाओं और युवाओं को काफी पसंद आई.
फैन क्लब से राजनीतिक पार्टी तक
विजय के फैन क्लब, जिन्हें दोबारा संगठित करके विजय मक्कल इयक्कम (वीएमआई) बनाया गया, करीब 2009 के आसपास बने. ये फैन ग्रुप जल्द ही वेलफेयर कामों की तरफ मुड़ गए, जैसे बाढ़ राहत, पढ़ाई में मदद और सामाजिक सेवा.
इस ग्रासरूट नेटवर्क ने टीवीके की नींव रखी और सिर्फ फैंस को एक्टिव कार्यकर्ताओं में बदल दिया. 2011 में वीएमआई ने एआईएडीएमके को सपोर्ट दिया, लेकिन विजय खुद सीधे राजनीति में नहीं आए. 2021 में विजय के फैंस ने डीएमके को सपोर्ट किया और डीएमके नेता एम.के. स्टालिन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, साथ ही पड़ोसी राज्यों के नेताओं—जैसे तेलंगाना के के. चंद्रशेखर राव और पुडुचेरी के मुख्यमंत्री एन. रंगास्वामी—के साथ अच्छे संबंध बनाए रखे.
विजय का राजनीति में आना अचानक नहीं था, बल्कि सोचा-समझा फैसला था. 2 फरवरी 2024 को टीवीके लॉन्च करते हुए विजय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, “तमिलनाडु के लोगों ने मुझे नाम, शोहरत और सब कुछ दिया है, अब मैं उनकी मदद करना चाहता हूं.”
उन्होंने अपनी राजनीति को “तमिल लोगों का कर्ज़ चुकाना” बताया और कहा कि यह उनके लिए कोई शौक नहीं है.
पिछले साल दिसंबर में विजय ने फिल्मों से रिटायर होने का ऐलान कर दिया ताकि वह पूरी तरह राजनीति पर ध्यान दे सकें—यह उनके कमिटमेंट का साफ संकेत था. टीवीके ने चुनाव से पहले किसी गठबंधन को ठुकरा दिया और “साफ और ईमानदार विकल्प” देने की बात कही, जो परिवारवाद और भ्रष्ट राजनीति से अलग हो.
मार्च में दिए एक इंटरव्यू में टीवीके के कोषाध्यक्ष पी. वेंकटरमणन ने कहा, “हमारे नेता सेक्युलरिज्म और सामाजिक न्याय पर आधारित पार्टी बनाना चाहते हैं, जिसकी सोच पेरियार, अंबेडकर, वेलु नाचियार, कामराज, एमजीआर और अन्नादुरई से प्रेरित है. पार्टी लोगों की सेवा पर ध्यान देती है और द्रविड़ सोच से प्रेरणा लेती है…हम सिर्फ एक और द्रविड़ पार्टी नहीं बनना चाहते.”
हमलावर अंदाज़
विजय का एक चैलेंजर से सत्ता के दावेदार बनने का सफर उनकी रैलियों में साफ दिखा. अक्टूबर 2024 में विक्रवंडी कॉन्फ्रेंस—जो टीवीके का पहला बड़ा राज्य स्तरीय कार्यक्रम था, ने उनकी राजनीति की सोच को सामने रखा, जबकि अगस्त 2025 में मदुरै में हुए दूसरे कार्यक्रम में उन्होंने ताकत दिखाई और डीएमके और बीजेपी को अपना विरोधी बताया, साथ ही 2026 में अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान किया.
एमजीआर और अन्नादुरई के कटआउट के बीच खड़े होकर विजय ने कहा कि इतिहास दोहराया जाएगा.
उन्होंने कहा, “जैसे 1967 और 1977 में तमिलनाडु में राजनीतिक बदलाव हुआ था, वैसे ही 2026 में भी होगा. टीवीके को दिया हर वोट मुझे दिया गया वोट है. मैं तमिलनाडु के हर बच्चे का मामा हूं. मैं, आपका विजय, आपके लिए ईमानदारी से काम करने आया हूं.”
உங்க விஜய் உங்க விஜய்
உயிரென வர்றேன் நான்உங்க விஜய் உங்க விஜய்
எளியவன் குரல் நான்உங்க விஜய் உங்க விஜய்
தனி ஆள் இல்ல கடல் நான் pic.twitter.com/FRQcu4b8aq— Vijay (@actorvijay) August 22, 2025
कई मुद्दों पर सवाल उठाते हुए विजय ने डीएमके को राजनीतिक दुश्मन और बीजेपी को वैचारिक दुश्मन बताया. उनके भाषण ज़्यादातर डीएमके की आलोचना पर रहे और बेहतर शासन का वादा किया. महिलाओं की सुरक्षा, बेरोजगारी और कानून-व्यवस्था के अलावा उन्होंने इरोड में हल्दी की खेती, नमक्कल में अंग चोरी, त्रिची में इंडस्ट्री, और नागपट्टिनम व वेल्लोर में मछुआरों और किसानों की समस्याओं जैसे स्थानीय मुद्दे उठाए.
नमक्कल के एक पार्टी कार्यकर्ता सतीश ने कहा, “लोग सिर्फ पैसे लेकर रैली में नहीं आ रहे थे, बल्कि बदलाव चाहते थे. हमारे नेता विजय ने आम लोगों के मुद्दों पर आवाज़ उठाई—जैसे रोजगार, महिलाओं की सुरक्षा और स्थानीय समस्याएं. उन्होंने हमें कहा कि लोगों से जुड़े रहो और उनकी समस्याएं समझकर हल निकालो.”
पिछले साल सितंबर में नमक्कल रैली के अगले दिन करूर में एक कार्यक्रम के दौरान भगदड़ मच गई, जिसमें 41 लोगों की मौत हो गई. यह विजय के राजनीतिक करियर का बड़ा मोड़ था, लेकिन वह रुके नहीं. उन्होंने इस घटना के पीछे साजिश की बात करते हुए स्टालिन से कहा, “सीएम सर, अगर बदला लेना है तो मुझसे लो, लेकिन मेरे समर्थकों को मत छुओ. मैं घर पर या ऑफिस में मिल जाऊंगा.”
बाद में उन्होंने पीड़ित परिवारों से मुलाकात की और हर परिवार को 20 लाख रुपये की मदद दी. इस घटना की जांच अभी सीबीआई कर रही है, लेकिन इससे टीवीके की राजनीति पर ज्यादा असर नहीं पड़ा. डीएमके और टीवीके ने एक-दूसरे को दोष दिया, जबकि करूर के लोगों ने इसे भीड़ और खराब व्यवस्था से हुई घटना माना.
इसके बाद टीवीके के घोषणापत्र और महिला दिवस के ऐलान में कई वादे किए गए—जैसे परिवार की महिला मुखिया को हर महीने 2,500 रुपये, साल में 6 फ्री गैस सिलेंडर, महिलाओं के लिए फ्री बस यात्रा, गरीब परिवारों की दुल्हनों को सोना और सिल्क साड़ी, नवजात बच्चियों को सोने की अंगूठी और फ्री सैनिटरी नैपकिन.
बड़े स्तर पर पार्टी ने शिक्षा सुधार, रोजगार, भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई और संस्थाओं की जवाबदेही पर जोर दिया.
टीवीके की सबसे बड़ी आलोचना यह है कि उसके पास राजनीतिक अनुभव और ज़मीनी संगठन की कमी है. इसके जवाब में पार्टी के लोग कहते हैं कि उनका फोकस लोगों का भरोसा जीतने पर है.
विजय पर यह भी आरोप लगा कि उनकी ग्राउंड प्रेजेंस कम है—कई रैलियां रद्द हुईं, कार्यक्रम टले और कैंपेन सीमित रहे. टीवीके नेताओं ने इसके लिए डीएमके सरकार और पुलिस को जिम्मेदार ठहराया, यह कहते हुए कि उन्हें रैलियों और रोडशो की अनुमति नहीं दी गई.
पिछले महीने दिप्रिंट से बात करते हुए टीवीके के जिला सचिव वी. शिवा ने कहा, “जब भी हम परमिशन के लिए अप्लाई करते हैं, कोई न कोई बहाना बना दिया जाता है. हम लोगों की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं, इसलिए नियम मानते हैं और कुछ गलत नहीं करना चाहते.”
जीत और चुनौतियां
त्रिची के एक टीवीके कार्यकर्ता पलानीस्वामी कहते हैं कि विजय की जीत सिर्फ उनके फिल्मी स्टार होने की वजह से नहीं है, बल्कि इसलिए है क्योंकि वह लोगों के साथ खड़े रहना चाहते हैं.
पलानीस्वामी ने कहा, “लोगों को यह नहीं सोचना चाहिए कि हम नई पार्टी हैं तो हमारे पास अनुभव नहीं है. हमारे नेता हमें कहते हैं कि राजनीति में जो नहीं जानते, उसे सीखो, क्योंकि हम यहां लोगों की सेवा करने आए हैं. उनके पास फिल्म इंडस्ट्री में बड़ा भविष्य था, लेकिन वह सिर्फ लोगों की आवाज़ बनने के लिए राजनीति में आए. यही बात वह हमें भी सिखाते हैं. वह चाहते हैं कि हम हर घर तक पहुंचें और लोगों के लिए काम करें.”
त्रिची ईस्ट में विजय के कैंपेन में काम कर चुके पलानीस्वामी कहते हैं कि विजय सिर्फ अपने फैन बेस तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि आम लोगों से जुड़ना चाहते हैं. “वह सिर्फ अपने करिश्मे पर भरोसा नहीं करना चाहते, बल्कि चाहते हैं कि लोग सीधे नेताओं तक पहुंच सकें और अपने अधिकार मांग सकें. पार्टी के अंदर भी वह बहुत सरल नेता हैं और आम लोगों की समस्याओं से खुद जुड़ते हैं.”
शासन से थकान, युवाओं में बेरोजगारी और परिवारवाद की राजनीति के बीच विजय खासकर युवाओं और महिलाओं के लिए बदलाव की उम्मीद बनकर सामने आए हैं. राजनीतिक विश्लेषक सुनील कुमार ने कहा कि टीवीके ने “युवाओं के राजनीति में आने का रास्ता खोला है”, लोगों की भावनाओं को वोट में बदला है और तमिलनाडु में युवाओं के बीच राजनीति पर चर्चा को फिर से ज़िंदा किया है.
हालांकि, पार्टी में अनुभवी लोगों की कमी एक बड़ी चुनौती है. अच्छे शासन, वेलफेयर योजनाओं को सही तरीके से लागू करना और नीतियों को जमीन पर उतारना अभी भी मुश्किल काम है.
राजनीतिक विश्लेषक अरुण कुमार ने कहा कि कानून-व्यवस्था, बेरोजगारी और महिलाओं की सुरक्षा जैसे पुराने मुद्दे अभी भी बने हुए हैं और डीएमके के समाधान काफी नहीं थे.
उन्होंने कहा, “विजय को अब इन चीज़ों को सही करना होगा, क्योंकि लोगों ने उन्हें सिर्फ वोट नहीं दिया, बल्कि इन समस्याओं के समाधान के लिए चुना है. उनके घोषणापत्र के वादे—जैसे महिलाओं को सोना देना, सभी महिलाओं को फ्री बस यात्रा देना—इन सबको लागू करना आने वाले महीनों में असली चुनौती होगी. लोगों ने विकल्प के तौर पर विजय को चुना है, लेकिन यह साबित करने के लिए कि उनका चुनाव सही था, विजय को समझदारी से काम करना होगा.”
इसी बात से सहमत राजनीतिक विश्लेषक रामू मणिवन्नन कहते हैं कि वोटर्स ने ज्यादा ध्यान वैचारिक रुख या राष्ट्रीय मुद्दों पर नहीं दिया. विजय भले ही जीत गए हों, लेकिन राष्ट्रीय मुद्दों—जैसे परिसीमन, विकेंद्रीकरण और संघवाद—पर उनका रुख साफ नहीं है.
उन्होंने कहा, “राज्य की राजनीति इन मुद्दों से अलग नहीं है, और राष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा फिर से सामने आएगी.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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