नई दिल्ली: राजनीतिक तौर पर पहले से ही किनारे पर पहुंच चुकी कांग्रेस, लेफ्ट और इंडियन सेक्युलर फ्रंट पश्चिम बंगाल में अपनी खोई ज़मीन वापस पाने में ज्यादा सफल नहीं हो पाईं. इस चुनाव में तीनों मिलकर सिर्फ 4 सीटें ही जीत पाईं, जबकि इस चुनाव ने राज्य की राजनीति की तस्वीर बदल दी.
कांग्रेस ने फरक्का और रानीनगर सीट जीती. कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) ने डोमकल सीट जीती, जहां उसके उम्मीदवार मोस्ताफिजुर रहमान को सबसे ज्यादा वोट मिले. वहीं आईएसएफ के नवसाद सिद्दीकी ने अपनी सीट भांगर से जीत दर्ज की.
2021 के पिछले विधानसभा चुनाव में ये तीनों पार्टियां साथ लड़ी थीं, तब सिर्फ आईएसएफ ही एक सीट जीत पाई थी, जबकि कांग्रेस और लेफ्ट को एक भी सीट नहीं मिली थी. इस बार तीनों पार्टियां अलग-अलग चुनाव लड़ीं.
पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी बहारामपुर सीट पर बीजेपी के सुब्रत मैत्रा से 17,548 वोटों से हार गए. मालतीपुर सीट पर कांग्रेस की मौसुम नूर, टीएमसी के अब्दुर रहीम बॉक्सी से 59,747 वोटों से हार गईं.
लेफ्ट को अपनी पनिहाटी सीट के उम्मीदवार कलातन दासगुप्ता से काफी उम्मीदें थीं, जो आरजी कर अस्पताल रेप और मर्डर मामले के बाद हुए विरोध प्रदर्शनों से जुड़े थे. बीजेपी ने इस सीट पर पीड़िता की मां रत्ना देबनाथ को उम्मीदवार बनाया, जो जीत गईं.
कलातन दासगुप्ता को सिर्फ 15,004 वोट मिले और वे तीसरे नंबर पर रहे. रत्ना देबनाथ को 56,865 वोट मिले, जबकि टीएमसी के तिर्थंकर घोष को 36,066 वोट मिले.
इस राज्य में मुकाबला ज्यादातर सत्तारूढ़ टीएमसी और बीजेपी के बीच रहा. कांग्रेस ने सभी 294 सीटों पर चुनाव लड़ा, जबकि लेफ्ट ने 252 सीटों पर उम्मीदवार उतारे.
कांग्रेस, जिसने 2011 के विधानसभा चुनाव में टीएमसी के साथ गठबंधन किया था, 2016 में सीपीआई(एम) के नेतृत्व वाले लेफ्ट के साथ आ गई. 2016 में दोनों ने मिलकर 77 सीटें जीती थीं (लेफ्ट 44, कांग्रेस 33).
2021 में यह गठबंधन फिर से बना, जिसे संयुक्त मोर्चा कहा गया और इसमें इंडियन सेक्युलर फ्रंट भी शामिल था, लेकिन तब तीनों मिलकर एक भी सीट नहीं जीत पाए, जिससे टीएमसी की पकड़ और मजबूत हो गई.
इस बार लेफ्ट ने अकेले चुनाव लड़कर अपनी विचारधारा को फिर से मजबूत करने और खोई जमीन वापस पाने की कोशिश की, लेकिन इससे उसकी किस्मत नहीं बदली.
कांग्रेस, जिसने 1997 में ममता बनर्जी के पार्टी छोड़ने के बाद अपना बड़ा वोट बैंक खो दिया था, इस चुनाव में टीएमसी और बीजेपी दोनों पर हमला करती रही. चुनाव से पहले राहुल गांधी के टीएमसी सरकार पर हमलों से इंडिया गठबंधन के अंदर बढ़ते मतभेद भी सामने आए.
लेफ्ट
पहले से गिरावट में चल रही सीपीआई(एम) के नेतृत्व वाली लेफ्ट अब मजबूत गढ़ों के बजाय यहां-वहां बिखरे हुए इलाकों में ही थोड़ा मुकाबला कर पा रही है. इनमें उत्तर बंगाल के कुछ हिस्से और अलीपुरद्वार शामिल हैं, जहां चाय बागान के मजदूर और पुराने यूनियन नेटवर्क अब भी थोड़ा समर्थन देते हैं. पश्चिमी जिले जैसे पुरुलिया और बांकुरा में उसके पुराने ग्रामीण आधार के कुछ निशान बचे हैं, जबकि हावड़ा–हुगली के औद्योगिक इलाके की कुछ सीटों पर उसके पुराने ट्रेड यूनियन प्रभाव के हल्के असर अब भी दिखते हैं.
लेकिन जो पार्टी कभी बंगाल की राजनीति के हर स्तर पर हावी थी, वह अब धीरे-धीरे किनारे होती जा रही है और उसके पुराने गढ़ों में भी उसका वोट बिखर गया है.
पश्चिम बंगाल में सीपीआई(एम) के नेतृत्व वाले लेफ्ट फ्रंट की गिरावट अचानक नहीं हुई, बल्कि लंबे समय तक सत्ता में रहने के बाद धीरे-धीरे कमजोर होती गई. इसने 1977 से 2011 तक लगातार राज्य पर शासन किया—यह दुनिया की सबसे लंबे समय तक चुनी गई कम्युनिस्ट सरकारों में से एक था. लेकिन आखिरी वर्षों में उसकी पकड़ कमजोर होने लगी, जिसका फायदा ममता बनर्जी ने उठाया और खुद को एक मजबूत विकल्प के रूप में पेश किया. आलोचकों का कहना है कि लंबे समय तक सत्ता में रहने से जनता में नाराज़गी बढ़ी और नेतृत्व ज़मीनी हकीकत से कटा हुआ दिखने लगा.
सिंगूर (2006–08) और नंदीग्राम (2007) में विरोध तब शुरू हुआ, जब लेफ्ट सरकार ने इंडस्ट्रियल प्रोजेक्ट्स, जिसमें एक कार फैक्ट्री भी शामिल थी, के लिए किसानों की जमीन लेने की कोशिश की. कई किसानों का कहना था कि उनसे ठीक से बात नहीं की गई और उन्हें सही मुआवजा नहीं मिला. पुलिस से झड़पों में लोग घायल हुए और मौतें भी हुईं. इन घटनाओं से लेफ्ट की किसान और गरीब समर्थक छवि को नुकसान पहुंचा और टीएमसी को समर्थन जुटाने का बड़ा मौका मिला. 2011 के बाद से लेफ्ट वापसी के लिए संघर्ष कर रही है और धीरे-धीरे उसका संगठन और वोट बैंक दोनों कमजोर हुए हैं, जबकि राजनीति टीएमसी बनाम बीजेपी की तरफ शिफ्ट हो गई है.
कांग्रेस
कांग्रेस अब भी मध्य और उत्तर बंगाल के एक छोटे इलाके में असर रखती है, खासकर अल्पसंख्यक बहुल और पुराने गढ़ों में.
मुर्शिदाबाद जैसे जिले अब भी पार्टी का मुख्य आधार बने हुए हैं.
पड़ोसी मालदा में भी कुछ सीटों पर पार्टी मुकाबले में रहती है, मुख्य रूप से मजबूत स्थानीय नेटवर्क और पुराने नेताओं के प्रभाव की वजह से.
लेकिन इस इलाके से बाहर पार्टी की मौजूदगी काफी कम हो जाती है और बाकी राज्य में उसका असर सीमित है.
लेफ्ट का चुनाव अभियान
लेफ्ट फ्रंट ने कई मुद्दों पर एक साथ अभियान चलाया, जिसमें युवाओं को जोड़ना, रोजगार के मुद्दे और भ्रष्टाचार के खिलाफ संदेश शामिल था. पार्टी ने नई पीढ़ी के नेताओं को आगे किया, जैसे मीनाक्षी मुखर्जी और स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) से जुड़े अन्य कार्यकर्ता, ताकि युवा वोटर्स से जुड़ सकें और अपनी पुरानी छवि बदल सकें, लेकिन इससे ज्यादा फायदा नहीं हुआ.
लेफ्ट के घोषणा पत्र में रोजगार, मजदूरों के अधिकार और महिलाओं की सुरक्षा पर जोर दिया गया, साथ ही “भ्रष्टाचार मुक्त” मॉडल की बात की गई.
साथ ही, अभियान में बीजेपी के खिलाफ एक सेक्युलर विकल्प पेश करने की कोशिश भी की गई, जिसे “ना मंदिर-ना मस्जिद, बंगाल को रोजगार चाहिए” जैसे नारों में दिखाया गया.
लेकिन ज़मीन पर सक्रियता, नए उम्मीदवार और मुद्दों पर फोकस के बावजूद, लेफ्ट चुनाव में ज्यादा प्रभाव नहीं दिखा पाई.
कांग्रेस का चुनाव अभियान
राहुल गांधी का अभियान, जिसमें मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर सीधे हमले किए गए—को इस रूप में देखा गया कि वह एक ऐसे राज्य में अपनी अलग राजनीतिक जगह बनाने की कोशिश कर रहे थे, जहां कांग्रेस 1977 के बाद से अपने दम पर सत्ता में नहीं आई है.
विशेषज्ञों ने राहुल गांधी के तरीके को “अनुभवहीन” और “गलत समय पर” बताया, लेकिन कांग्रेस नेताओं ने उनका बचाव करते हुए कहा कि उन्हें राज्य की राजनीति की पूरी समझ है. हालांकि, यह बात असरदार नहीं दिखी.
कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल की सभी 294 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन सिर्फ 2 सीटें ही जीत पाई, जिससे साफ होता है कि ज़मीन पर उसका असर सीमित है. खास बात यह है कि मुस्लिम बहुल इलाकों में भी, जहां पार्टी पारंपरिक रूप से समर्थन जुटाने की कोशिश करती रही है, कांग्रेस अपनी मौजूदगी को मजबूत गढ़ में नहीं बदल पाई.
पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की रणनीति लगातार बदलती रही है—2011 में टीएमसी के साथ मिलकर लेफ्ट को हटाया, फिर 2016 और 2021 में सीपीआई(एम) के साथ गठबंधन किया, और कई बार अकेले चुनाव लड़ा. अलग-अलग विचारधारा वाली पार्टियों के साथ ऐसे बदलते गठबंधन ने राज्य में कांग्रेस की पहचान को कमजोर किया है और उसे अवसरवादी दिखाया है.
विशेषज्ञों का मानना है कि एक साफ राजनीतिक लाइन की कमी ने उसके संगठन को कमजोर किया है और वोटर्स के लिए यह समझना मुश्किल बना दिया है कि कांग्रेस किस पक्ष में खड़ी है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)