नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की यह जीत अचानक नहीं आई. इस बदलाव की शुरुआत अगस्त 2022 में हुई, जब पार्टी ने महासचिव सुनील बंसल को बंगाल, ओडिशा और तेलंगाना का प्रभारी बनाया.
बंसल, जब अमित शाह 2014 से 2020 तक पार्टी अध्यक्ष थे, तब बीजेपी के यूपी के संगठन महासचिव थे. उन्हें उत्तर प्रदेश में बीजेपी की वापसी का श्रेय दिया जाता है, जहां 15 साल बाद 2017 में पार्टी सत्ता में आई.
ममता बनर्जी जैसी मजबूत चुनौती का सामना करने के लिए अमित शाह के भरोसेमंद सहयोगी बंसल और पश्चिम बंगाल के चुनाव प्रभारी भूपेंद्र यादव ने मिलकर शाह के नेतृत्व में पार्टी की “जीत की रणनीति” को लागू किया.
बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, “उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वाराणसी लोकसभा चुनाव को भी बारीकी से संभाला था. उन्होंने चुपचाप गेम चेंजर की भूमिका निभाई और जमीन पर रणनीति को सही तरीके से लागू किया. छोटे-छोटे कोने की मीटिंग, सड़क पर लोगों से बातचीत और बूथ स्तर के काम—सब कुछ उन्होंने माइक्रो लेवल पर किया.”
एक अन्य वरिष्ठ नेता ने बताया कि केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव पार्टी की पूरी चुनाव रणनीति के केंद्र में थे. पिछले साल सितंबर में उन्हें पश्चिम बंगाल की जिम्मेदारी दी गई, उनके साथ पूर्व त्रिपुरा मुख्यमंत्री बिप्लब देब को सह-प्रभारी बनाया गया.

यादव-बंसल की टीम ने कैंपेन डिजाइन, मुद्दे तैयार करना, रणनीति बनाना और माइक्रो मैनेजमेंट संभाला, जो बीजेपी के लिए फायदेमंद रहा.
जहां यादव ने बूथ मैनेजमेंट को मजबूत किया और “पन्ना प्रमुख” मॉडल को बंगाल के हिसाब से लागू किया, वहीं अंदरूनी मतभेद भी दूर करने में लगातार काम किया. दूसरी तरफ बंसल ने उन 140 से ज्यादा सीटों पर ध्यान दिया, जहां सर्वे के अनुसार टीएमसी मजबूत मानी जाती थी और वहां जाकर लोगों से संपर्क किया और केंद्र सरकार की योजनाओं के बारे में बताया.
पार्टी के एक कार्यकर्ता ने कहा, “उनका काम साफ था—हर स्तर पर दखल देना, चाहे बूथ मैनेजमेंट हो या उम्मीदवार चयन. आज बीजेपी की जीत किसी एक चेहरे की नहीं, बल्कि यादव की सुनियोजित रणनीति का नतीजा है. उन्होंने करीब 30,000–40,000 बूथों पर पन्ना प्रमुख मॉडल लागू किया, जिससे पार्टी का वोट शेयर बढ़ा और कई सीटों पर फायदा मिला.”
सक्रिय नेटवर्क और लगातार फीडबैक
उन्होंने कहा, “यादव और बंसल ने मिलकर काम किया. इस बार आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों के साथ भी बेहतर तालमेल रहा. सिर्फ रैलियों और नारों तक सीमित रहने के बजाय, पार्टी ने डेटा, जमीन से जुड़ाव और संगठन की ताकत पर ध्यान दिया. हर बूथ पर एक सक्रिय नेटवर्क था, जो स्थानीय मुद्दों पर काम करता था, लगातार फीडबैक लेता था और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी तय करता था—यह सब यादव और बंसल ने संभाला.”
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह “मुख्य चुनाव रणनीतिकार” की भूमिका में थे और पूरे चुनाव पर नजर रखे हुए थे. हाल के महीनों में शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दोनों ने कई बार बंगाल का दौरा किया, लेकिन शाह का करीब दो हफ्ते बंगाल में रहना दिखाता है कि पार्टी इस चुनाव को कितनी गंभीरता से ले रही थी.
पूरे चुनाव के दौरान, 2021 के मुकाबले, बीजेपी ने ममता बनर्जी पर व्यक्तिगत हमले नहीं किए. इसके बजाय उसने उनकी सरकार की नीतियों और कामकाज पर सवाल उठाए और भ्रष्टाचार के आरोप लगाए.

पार्टी ने अपना विजन भी सामने रखा—‘सोनार बांग्ला’ (समृद्ध बंगाल), जिसमें महिलाओं, युवाओं और बेरोजगारों के लिए कई योजनाएं और उद्योग को फिर से मजबूत करने की बात शामिल थी.
बीजेपी की जीत का एक बड़ा कारण उसकी मजबूत संगठन रणनीति और चुनाव प्रबंधन को भी माना जा रहा है. एक नेता ने कहा, “बंसल का लंबे समय तक बंगाल में रहना रणनीति का अहम हिस्सा था. उन्होंने जमीनी स्तर पर संगठन को मजबूत किया. पिछली बार जहां पार्टी में आपसी झगड़े थे, इस बार शीर्ष नेतृत्व महीनों तक सक्रिय रहा और बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने पर ध्यान दिया गया.”
दिप्रिंट से बात करते हुए बिहार के एमएलसी देवेश कुमार, जो पश्चिम बंगाल टीम का हिस्सा थे, ने कहा कि इसकी तैयारी 2021 से ही शुरू हो गई थी.
उन्होंने कहा, “पिछली गलतियों को पहचाना गया और सुधारा गया. पीएम मोदी, नितिन नबीन और अमित शाह ने सबसे बेहतर लोगों को चुना, जो जमीन पर रणनीति को लागू कर सकें. चाहे सुनील बंसल हों, भूपेंद्र यादव, मंगल पांडेय, बिप्लब देब या अमित मालवीय—सभी ने मिलकर लगातार मेहनत की.”
एक सूत्र ने बताया कि पूरे राज्य के करीब 52,000 बूथों पर बेहतर तालमेल के लिए तीन सदस्यों की कमेटी बनाई गई थी.
बीजेपी के अंदर कई लोग मानते हैं कि भूपेंद्र यादव एक अहम रणनीतिकार के रूप में उभरे, जिन्होंने अलग-अलग राज्यों में अपने अनुभव का इस्तेमाल किया.
एक नेता ने कहा, “बूथों को A और B कैटेगरी में बांटा गया था, जहां B का मतलब ज्यादा काम वाली सीटें थीं. वहां खास टीम लगाई गई. यादव रणनीति बनाने में माहिर हैं और इतिहास की भी अच्छी समझ रखते हैं. उन्होंने बंगाल की हर सीट का दौरा किया. PM और HM की टीम ने माइक्रो प्लानिंग की और बड़े लक्ष्य को ध्यान में रखा. अमित शाह ने दो हफ्ते से ज्यादा समय तक राज्य में रहकर यह भी सुनिश्चित किया कि चुनाव निष्पक्ष तरीके से हो.”

शाह ने कार्यकर्ताओं को कैसे प्रेरित किया
पार्टी के एक नेता ने कहा कि शाह का “4 मई के बाद कार्रवाई” का नारा बीजेपी कार्यकर्ताओं के लिए बहुत प्रेरणादायक रहा, जो पहले हिंसा के डर से सक्रिय नहीं हो पा रहे थे.
मंगल पांडेय, जो राज्य प्रभारी भी थे, उन्होंने भी जमीन पर संगठन को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई.
पार्टी के एक कार्यकर्ता ने कहा, “सह-प्रभारी बिप्लब देब और वरिष्ठ नेता दिलीप घोष भी कैंपेन के तालमेल और लोगों तक पहुंच बनाने में शामिल थे. इसके अलावा, स्थानीय स्तर पर सुवेंदु अधिकारी जैसे नेताओं ने समर्थन जुटाने में बड़ी भूमिका निभाई, खासकर उन इलाकों में जहां उनका मजबूत प्रभाव है.”
बीजेपी एक अन्य नेता ने बताया कि 2 अप्रैल को शाह द्वारा 15 दिन पश्चिम बंगाल में रहने की सार्वजनिक घोषणा ने भी कार्यकर्ताओं को काफी प्रेरित किया. “उन्होंने खुद पूरे कैंपेन की रणनीति पर नजर रखी, लगातार समीक्षा बैठकें कीं और यह सुनिश्चित किया कि टीम एकजुट रहे.”
शाह के अलावा, बीजेपी ने कई बड़े नेताओं को बंगाल में सक्रिय किया, ताकि ममता बनर्जी सरकार को हटाया जा सके.
उन्होंने कहा, “तालमेल के लिए पार्टी ने पश्चिम बंगाल को 9 हिस्सों में बांटा और हर हिस्से की जिम्मेदारी वरिष्ठ नेताओं को दी गई, जिनमें धर्मेंद्र प्रधान, नित्यानंद राय, गजेंद्र सिंह शेखावत, संजय जायसवाल, निशिकांत दुबे जैसे मंत्री शामिल थे.”
पश्चिम बंगाल में धीरे-धीरे अपनी पकड़ मजबूत कर रही बीजेपी को 2024 लोकसभा चुनाव में झटका लगा था, जब उसकी सीटें 2019 के 18 से घटकर 12 रह गई थीं. 2021 में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने 215 सीटें जीती थीं, जबकि बीजेपी 77 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर रही और विपक्ष बनी.
इस बार बीजेपी का प्रचार ज्यादा आक्रामक नजर आया और उसने “सरकार के खिलाफ नाराजगी” का भी पूरा फायदा उठाया, ताकि 2011 से सत्ता में रही टीएमसी को हटाया जा सके, जिसने 34 साल तक शासन करने वाले लेफ्ट फ्रंट को हराया था.
केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने भी राज्य के कई दौरे किए, जिसमें वह नंदीग्राम से नामांकन भरते समय सुवेंदु अधिकारी के साथ भी गए. सूत्रों के अनुसार, उन्होंने औद्योगिक क्षेत्रों और ओडिशा से लगे इलाकों की जिम्मेदारी संभाली और टीएमसी के अंदरूनी मतभेदों का फायदा उठाया.
सुवेंदु अधिकारी को भी जमीन पर रणनीति लागू करने की जिम्मेदारी दी गई, खासकर ग्रामीण इलाकों में.
एक अन्य नेता ने कहा कि बीजेपी के एकजुट रहने की वजह से वे 1 लाख से ज्यादा छोटी मीटिंग (कॉर्नर मीटिंग) कर पाए और इस दौरान देशभर से 9,000 से ज्यादा कार्यकर्ता राज्य में आए.
पार्टी ने 220 विधानसभा क्षेत्रों में चार्जशीट आधारित जागरूकता अभियान भी चलाया, जिसमें से एक शाह ने खुद जारी किया. नेता ने कहा, “150 से ज्यादा नेता इसमें सक्रिय रहे और 80 से ज्यादा प्रेस कॉन्फ्रेंस की गईं, जिनमें राज्य सरकार की कथित विफलताओं और भ्रष्टाचार को उठाया गया.”
उन्होंने कहा, “बेहतर तालमेल के लिए हमने पश्चिम बंगाल को 9 हिस्सों में बांटा और हर हिस्से की जिम्मेदारी वरिष्ठ नेताओं को दी गई, जिनमें धर्मेंद्र प्रधान, नित्यानंद राय, गजेंद्र सिंह शेखावत, संजय जायसवाल, निशिकांत दुबे, हिमंता बिस्वा सरमा जैसे नेता शामिल थे. उनका फोकस खास तौर पर लोगों तक पहुंच बनाने और घुसपैठ व नागरिकता जैसे मुद्दों पर आक्रामक प्रचार करने पर था.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
यह भी पढ़ें: पहले से ही कमजोर, कांग्रेस और लेफ्ट को बंगाल में थोड़ी बढ़त, फिर भी अपनी पहचान के लिए जंग जारी